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जो
मनुष्य अपने जीते जी किसी लीजेंड में बदल जाता है,
किसी निजंधर चरित्र में, उस तक पहुँचने और
उसे जानने-बूझने के लिए हमेथा किसी न किसी किस्से से होकर ही गुजरना पड़ता है।
त्रिलोचन तक पहुचने की दुर्गम पगडंडी भी किस्सों-कहानियों के पर्वत-पठार,
खाई-खंदक, नदी-समुद्र से होकर जाती है।
तो आइये एक कहानी की पगडंडी पर चलें। इसके कथावाचक कोई
शिव-पार्वती,
काग-भुशुंडी नहीं,
हिंदी के अप्रतिम क्लासिक कवि शमशेर बहादुर सिंह थे। जाहिर है,
ये किस्से भी उन्होंने औरों से सुने होंगे और
फिर किसी दर्ज़ी की तरह उन्हें चुपचाप सिला होगा।
एक थे ठाकुर जगर सिंह। उत्तर प्रदेथ में सुल्तानपुर जिले के
चिरानीपट्टी गाँव के धनहीन लेकिन घमंडी और मेहनती किसान।
भूमिहीन जगर सिंह ने अकेले अपने बल-बूते तालाब को पाट कर खेत
बनाया और बैल न होने के कारण जुए में अपने-आपको जोतकर बीज बोये
और अन्न उपजाया। रोज़ अहरी चलाते थे। उन्नाव के पास ऊँचगाँव
सानी के रामविलास शर्मा के रिटायर फौजी बाबा की तरह जगर सिंह
ने भी खुद ही ईंट थाप कर अपना घर उठाया और छप्पर डाली। लेकिन
जगर सिंह में ज्ञान की पिपासा और परोपकार की भावना गजब की थी।
सात फुट तीन इंच ऊँचे जगर सिंह में कई भैंसों का बल था। एक बार
कोई नामी पहलवान गांव के मेले में आया और लंगोट घुमाकर इलाके
के सारे नौजवानों को चुनौती दी तो कुश्ती का ककहरा तक न जानने
वाले जगर सिंह ने लंगोट पकड़ कर उसे ऊपर आसमान में टांग दिया।
पहलवान की बीवी अपने चैंपियन पति का ये हाल देखकर चिल्लाई-'अरे
दाँव मारकर नीचे भुइंया पर आ जाव!' तो
न जमीन न आकाश, ऊपर जगर सिंह की हथेली
पर टंगे पहलवान ने कहा -'दाँव-पेंच तो
किसी आदमी के खिलाफ चलता है। ये तो हमें कोई 'जबरा
बरम' लगता है।'
'जबरा'
माने जबर्दश्त और 'बरम'
माने 'ब्रह्मराक्षस',
जो मुक्तिबोध को किसी खंडहर के पास की बावड़ी
में दिखा था। जगर सिंह को भी उस इलाके के लोग 'बैरागी
बाबा' कहते थे। क्योंकि इतनी मेहनत,
इतनी ताकत और इतने घमंड के बावज़ूद वे भीतर से
'योगी' ही थे।
एक अनगढ़-बीहड़ संत।
इन्ही जगर सिंह के बेटे थे ठाकुर वासुदेव सिंह,
जो आगे चलकर दूसरी दंतकथा के हीरो बने और
जिनके किस्से आज दिल्ली, भोपाल,
हरिद्वार, काशी,
गुजरात, पटना,
कोलकाता तक दूर-दूर चलते हैं। वासुदेव सिंह ने
अपने पिता जगर सिंह पर कविता लिखी -'हृष्ट
पुष्ट उन्नत शरीर वह पित: तुम्हारा/ एक चुनौती था मनुष्य की
ऊँचाई के लिए/--विचारता हूँ मैं किनमें गिनूं तुम्हें- देवों
में या ॠषियों में/'
वासुदेव सिंह को उनकी माता बलवान बनाना चाहती थीं। अपने बेटे
के सामने रोटियाँ थाप-थापकर डेढ़ हाथ ऊँची ढीह लगा देतीं। बचपन
में खा लेगा तभी तो बाद में संसार के कुरुक्षेत्र में लड़ने का
बल आयेगा। वह अपने बेटे को बज्र जैसा बनाना चाहती थीं,
गांधारी की तरह। बज्र वह बना भी। पक्की ईंटों
को अपनी कनपटी और माथे से फोड़कर चूर-चूर कर डालने वाला।
लोलार्क में उमड़ती गंगा में गोता मार कर,
सांस भींच कर,
नीचे-नीचे दूसरे पाट तक जा निकलने वाला।
लेकिन कितना मार्मिक और त्रासद लगता है इस किस्से का
उत्तरार्ध्द जानना,
जब हम देखते हैं कि माँ के हाथों,
पिता के तप और पसीने से उपजाए अन्न की ढाई
दर्जन से ज्यादा रोटियाँ खानेवाला वासुदेव पाँच-पाँच दिन खाली
पेट पानी पीकर और पेड़ की छाल चबाकर ज़िंदा रहा। विधाता ने मुँह
चीर दिया था तो उसमें कुछ भरने के लिए दाना तो चाहिए। लेकिन इस
निजंधर नायक के जीवन के महाभारत का यह 'उत्तरपर्व'
है। यानी हमारा आज का उत्तर-आधुनिक समय।
महा-गाथाओं के महान् नायकों के जीवन का वह बचा-खुचा हिस्सा,
जब वे या तो हिमालय की बर्फ़ में गल जाते हैं
या कोई मामूली बहेलिया उन्हें धोखे से मार डालता है। ऐसा समय
जब मिथक टूटते हैं, यूटोपियाओं का
खात्मा हो जाता है और ठगों-हत्यारों,
उठाईगीरों-दलालों, चिरकुट-चापलूसों से
समूचा यथार्थ आक्रांत हो जाता है। जब किसी भी भाषा के
व्यास-बाल्मीकि विदा लेते हैं और अफ़वाहबाज़ जुगाड़बाज 'कविता-आलोचना'
लिखने लगते हैं। जब किसी भी सच्चे और ईमानदार
रचनाकार का जीवन कठिन और दुसह-दुरूह होता जाता है। ख़ैर ----
तो कथावाचक कवि शमशेर के उस किस्से की पगडंडी पर थोड़ा-सा फिर
लौटें। वासुदेव की ठेठ अवधी माता भले ही अपने बेटे को बलवान
बनाना चाहती रही हों,
पढ़ाई-लिखाई के खिलाफ रही हों क्योंकि -
'पढ़े-लिखे कछु काम ना आवे,
हल जोते कुठिला भर धान!'
लेकिन पिता जगर सिंह माने 'बैरागी
बाबा' अपने बेटे को ज्ञानी संत बनाना
चाहते थे। सो, उन्होंने उसे किन्हीं
स्वामी जी के हाथों सौंप दिया। 'विद्या
माता ही अब इसको निरखें-परखें।'
लेकिन वासुदेव को किसी ने पढ़ते नहीं देखा। न संगी-संघातियों ने,
न गुरु जी ने। एक बार शिष्य की लफंगई और
घुमक्कड़ी से गुरु नाराज़ हुए और उन्होंने उसे संस्कृत का कोई
कठिन सूक्त रटने के लिए दे दिया। गुरु के गुस्से का पारावार न
रहा, जब वासुदेव बिना पढ़े और रट्टा
मारे फिर खेलने और आवारागर्दी के लिए गायब हो गया।
लेकिन गुरु जी बक्क तब रह गये जब उनके पूछने पर चेले ने पूरा
सूक्त,
एक-एक हलंत,
कॉमा-फुलस्टॉप के साथ एक सांस में सुना दिया। 'अरे
तू क्या किसी गुप्त तीसरी आँख से पढ़ाई करता है रे,
त्रिलोचन?'
बस वासुदेव उस रोज़ से हो गये त्रिलोचन। हिंदी के कवि त्रिलोचन।
'धरती', 'दिगंत'
'शब्द', 'चैती'
के त्रिलोचन। 'उस जनपद
का कवि हूँ' और 'ताप
के ताए हुए दिन' के कवि त्रिलोचन।
हमारे अपने पिता-पितामह त्रिलोचन। रेणु जी ने इन्हीं त्रिलोचन
के औघड़ व्यक्तित्व के भरम जाल में भौंचक होकर वह मशहूर जुमला
कहा था - 'त्रिलोचन को देखते ही हर बार
मेरे मन के ब्लैकबोर्ड पर, एक
अ-गाणितिक, अ-साहित्यिक तथा अवैज्ञानिक
प्रश्न अपने-आप लिख जाता है। आखिर वह कौन-सी चीज़ है,
जिसे त्रिलोचन में जोड़ देने पर वह शमशेर हो
जाता है और घटा देने पर नागार्जुन?'
और इन्हीं फणीश्वरनाथ रेणु ने,
जिनका अपना व्यक्तित्व और कृतित्व भी किसी
दंतकथा से कम महिमापूर्ण नहीं था,
त्रिलोचन को 'सबद जोगी'
भी कहा था। उनकी तुलना उन्होंने लालन फ़कीर,
कबीर और रूमी से की थी।इस
औघड़
'सबद-जोगी',
वासुदेव से त्रिलोचन बने महाकवि की
शिक्षा-दीक्षा, नौकरी-चाकरी,
घर-गृहस्थी और जीवन संघर्ष के किस्से-
कहानियाँ काशी से लेकर हरिद्वार तक फैली हुईं हैं। इसके बीच
में सागर, दिल्ली,
गुजरात, भोपाल,
कोलकाता, टीकमगढ़ और
पता नहीं कहाँ-कहाँ के शहर-गाँव-देहात हैं।
विष्णुचंद्र शर्मा,
नामवर सिंह, विश्वनाथ
त्रिपाठी, काथीनाथ सिंह,
अशोक वाजपेयी, राजेश
जोशी से लेकर बिल्कुल आज की पीढ़ी के नए कवियों के पास भी उनके
क़िस्से हैं। मेरे पास भी हैं। लेकिन त्रिलोचन जी के बारे में
एक सच यह भी है, जिसे एक बार काशीनाथ
सिंह ने 'हंस'
में अपने संस्मरण 'दंतकथा में त्रिलोचन'
में लिखा था कि दरअसल त्रिलोचन एक नहीं,
दो अलग-अलग हैं। एक सुनाई देने वाले त्रिलोचन
और एक दिखाई देने वाले त्रिलोचन। डॉ-भगवान सिंह ने भी अपने एक
लेख में एक 'असली'
और एक 'नकली'
त्रिलोचन की बात की थी। मैं आपको अभी-अभी
कथावाचक शमशेर जी की कथा का एक छोटा-सा,
बालकांड वाला अंश सुना चुका हूँ इसलिए आप को
इस रहस्य का ताला खोलने के लिए कुंजी की ख़ातिर ज़्यादा भटकना
नहीं पड़ेगा। माने, आप समझ गये न
? 'एक-ठो त्रिलोचन'
में 'दो-ठो त्रिलोचन'
का रहस्य वासुदेव और त्रिलोचन शास्त्री की दो
व्यक्तिवाचक संज्ञाओं के बीच पसरे बहुश्रुत वृत्तांत के अंधेरे
में है। यह सारा वृत्तांत बहुत बड़ा है। लगभग महाकाव्यात्मक।
अगर कोई हमारे समय का डॉ. रामविलास शर्मा जैसा आलोचक-अकादेमिक
होता तो वह 'निराला की साहित्य साधना'
(भाग एक) जैसा ग्रंथ उनके जीवन संघर्ष के बारे
में ही हिंदी साहित्य को सौंप जाता। लेकिन 'जो
नहीं है, जैसे कि सुरुचि,
उसका ग़म क्या?'
अब इस किस्से को अतीत में लपेट कर वर्तमान में लौटते हैं। माने
सन्
2007,
नवंबर-दिसंबर का महीना।
वासुदेव माने कि त्रिलोचन वैशाली सेक्टर तीन में अपने छोटे
बेटे अमित प्रकाश के घर पर बीमार लेटे पड़े थे। हरिद्वार से
उन्हें दिल्ली इलाज के लिए ले आया गया था,
जहाँ वे अपनी बहू के पास रह रहे थे। उनके शरीर
के दाहिने भाग में सूजन थी और स्मृति क्षीण हो रही थी। कोशांबी
के यशोदा हॉस्पिटल में उनका इलाज चल रहा था। अमित प्रकाश ने
बताया था कि उनके मस्तिष्क की कोशिकाओं में संचित स्मृतियाँ एक
बीमारी के कारण कई वर्षों से समाप्त हो रही थीं।
मैं भी अपने समकालीन कवि-मित्र मदन कश्यप जी के साथ उन्हें
देखने गया। उस दिन कुछ ही देर बाद वे सो गये। मैंने अपने
हैंडीकैम से उनकी कुछ छवियाँ खींचीं,
जिन्हें अपने ब्लॉग में 'संध्या
में त्रिलोचन' शीर्षक के साथ प्रदर्शित
किया। देश-विदेश से उनके प्रशंसकों-प्रेमियों की प्रतिक्रियाएँ
आने लगीं। दो-चार दिनों बाद मदन कश्यप फिर वहाँ गये। उस दिन वे
बिल्कुल स्वस्थ लग रहे थे। हिंदी अखबारों के पन्ने बड़ी
तल्लीनता के साथ पढ़ते लग रहे थे। सिरहाने किताबें थीं। मदन ने
उन्हें उन्हीं की शैली में उन्हीं को समर्पित अपना सॉनेट पढ़कर
सुनाया -'गंवईं गांव के मनुख त्रिलोचन
सीधे-सादे/ खुरदुरी मुट्ठी में अपना आकाश बांधे.../'
त्रिलोचन पूरे मनोयोग से सुनते रहे। सॉनेट
समाप्त होने पर हँसे और कहा -'इसमें
नये और पुराने का संयोग है, जो कि
अच्छा है।'
फिर उनसे उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछा गया। वे फिर हँसे।
कुछ देर सोचा और कहा-'इसमें
नये और पुराने का संयोग है। जो कि अच्छा है।'
कुछ देर में चाय आई। वे चाय पीते रहे और अखबार पढ़ते रहे। उनसे
आग्रह किया गया कि अपनी कोई कविता की पंक्ति सुनायें। वे फिर
हंसे और कहा-'इसमें
नये और पुराने का संयोग...!'
आप कहीं जाना चाहते हैं?
आपको कोई दर्द या कष्ट तो नहीं है?
बाहर घूमने का मन नहीं पड़ता ?
बहुत से प्रश्न थे,
जिनका एक ही उत्तर उनके पास था। बच्चों जैसी निश्छल हँसी और
वही वाक्य- 'इसमें नये और पुराने का
---!'
आह! त्रिलोचन शास्त्री जा चुके थे। वहाँ वासुदेव की बीमार काया
बची थी,
जिसे उनके पुत्र-पौत्री संभाल रहे थे। हंस जा
चुका था। अकेला। यानी इस हमारे लोक में त्रिलोचन तब भी नहीं थे,
जब वे हमारे सामने बैठे हुए थे और हम उन्हें
अखबार पढ़ते, चाय पीते,
हँसते और कभी-कभी - 'ये
जो नये और पुराने का संयोग---' बोलते
देख रहे थे और उन्हें अपने कैमरे में रिकॉर्ड कर रहे थे।
बस,
यही वह बिंदु है, वह
स्थल, वह पल जब मैं पूरी साहस और समूचे
गुस्से के साथ एक बात हमेशा-हमेशा के लिए कहना चाहता हूँ। इसे
एक अदना से लेखक का बयान मानकर दर्ज़ किया जाय। वह बात यों है।
यशोदा हॉस्पिटल के डॉक्टर्स द्वारा की गई जाँच से यह प्रमाणित
हो जाता है कि त्रिलोचन का स्वास्थ्य पिछले कुछ वर्षों से
निरंतर बिगड़ रहा था। उनकी वही विलक्षण स्मृति,
जिसके साक्षात्कार से बचपन में उनके गुरु ने
हतप्रभ होकर उन्हें तीसरी आंख वाले त्रिलोचन की उपाधि दी थी।
उनकी वही अपूर्व स्मृति पिछले कई वर्षों से धीरे-धीरे मरती जा
रही थी। हर रोज़, हर घड़ी,
हर पल।
त्रिलोचन जीवन संघर्षों में थक गये थे। रुग्ण थे। वे कृष्ण की
तरह,
महाभारत के बाद किसी जंगल में,
या फिर हरिद्वार के किसी अंतरे कोने में
विश्राम कर रहे थे। स्मृतियों से वंचित होते किसी महागाथा के
नायक के जीवन का उत्तरपर्व। ----और आप सबको याद होगा,
यह कुछ ही वर्षों पहले की बात है। उन्हें
हमारे समय के राजनीतिक बहेलियों ने घेरा। उनसे बिल्कुल आज के
राजनीतिक सवाल पूछे। उस समय और राजनीतिक सत्ताओं के वे सवाल,
त्रिलोचन जिससे दूर होते जा रहे थे। उन्होंने
इस बीमार संत के मुँह से वह सब कहलवाया,
जिसे वे खुद सुनना चाहते थे। 'स्कूप'।
'स्कैंडल'।
हिंदी के एक संघर्षशील, कर्मठ,
प्रतिभाशाली, बूढ़े और
बीमार, नब्बे साल के अकेले हो चुके कवि
का 'स्टिंग ऑपरेथन'।और
फिर उनको लांछित किया गया। और यह सिलसिला उनके महाप्रयाण के
लगभग अंत से पहले तक चला। बूढ़े और जर्जर हो चुके कालजयी कथाकार,
निबंधकार और चिंतक निर्मल वर्मा के साथ भी ऐसा
ही हो रहा था और गुजराती के बयान्नवे साल के वयोवृध्द,
ज्ञानपीठ से सम्मानित साहित्यकार राजेंद्र शाह
के साथ भी यही हुआ था।
(साभार)
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