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वर्ष-2, अंक-20, जनवरी, 2008

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।। त्रिलोचन अंक।।

 

 

त्रिलोचन के न रहने के बाद


संजय द्विवेदी

 

हिंदी की प्रगतिशील कविता के अक प्रमुख हस्ताक्षार माने जाने वाले त्रिलोचन शास्त्री का निधन एक ऐसी घटना है, जो लंबे सभय तक हिंदी जगत को रुलाती रहेगी। 91 वर्षिय त्रिलोचन ने हिंदी जगत की जितनी लंबी और जैसी सेवा की, उसका उदाहरण हाल-फिलहाल खोजे नहीं मिलता। अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता, साहित्य के प्रति समर्पक और लेखन के माध्यम से समाज को बदलने की बेचैनी उनमें साफ़ दिखती थी। वे पत्रकारिता से भी जुड़े रहे। उन्होंने हिंदी दैनिक आज, जनवार्ता, हंस, प्रदीप, चित्रलेखा और कहानी पत्रिका में भी काम किया । जीवन में लंबा और सतत संघर्ष कर अपनी मूल्यों के लिए समर्पण की बानगी उन्होंने पेश की। उनके कविता संग्रह  ताप के ताये हुए दिन के लिए उन्हें 1981 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। प्रगतिशील नई कविता की वृहत्रयी में उनका नाम लिया जाता था। नागार्जुन, त्रिलोचन शास्त्री और केदारनाथ अग्रवाल इस वृहत्रयी का हिस्सा ते। नई कविता को एक जनवादी तेवर देने वालों में उनका नाम लिया जाता है। आम आदमी की समस्याएँ, उसके दुख-दर्द और संघर्ष उनकी कविता में जगह पाते थे। कविता के फ़ार्म को लेकर वे मुक्त राय रखते थे। उनका यह मानना था कि कविता छंदबद्ध हो या छंदमुक्त, यह कविता की अनुभूति पर निर्भर करता है। जैसी अनुभूति होगी, कविता का फार्म बी वहीं होना चाहिए । शायद इसीलिए उन्होंने नई कविता के साथ-साथ सॉनेट भी खूब लिखे। उन्हें हिंदी में सॉनेट का जन्मदाता माना जाता है। वे एक साथ कई मोर्चों पर जूझने वाले व्यक्ति थे। अपने सृजनात्मक लेखन के साथ-साथ उन्होंने हिंदी को की शब्दकोश दिए।

 

 वे एक बड़े कवि के साथ महान कोशकार भी थे। हिंदी, संस्कृति, अँग्रेज़ी और फारसी सहित कई भाषाओं पर उनका अधिकार था। उन्होंने हिंदी को तमाम नए शब्द दिए, जिससे भाषा न सिर्फ़ समृद्ध हुई, वरन उसमें विविध विषयों को व्यक्त करने का आत्मविश्वास भी बढ़ा। उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर जिले में एकटघरा चिरानीपट्टी में 20 अगस्त 1917 को जन्मे त्रिलोचन शास्त्री जनपदीय काव्यबोध और प्रगतिशील काव्यधारा के आखिरी कवि थे । उनमें अगाध पांडित्य था, जिसे देखकर हिंदी जगत् चमत्कृत रहता था। अपने पूरे जीवन में उन्होंने शब्दों का ही साथ निभाया। नए शब्दों को रचते, उन्हें नया जीवन देते उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी हिंदी की सेवा के लिए समर्पित कर दी। उनकी प्रमुख रचनाकओं में धरती, गुलाब-बुलबुल, दिगंत, शब्द, उस जनपथ का वासी हूँ, आत्मालोचन आदि प्रमुख हैं। अपने लंबे जीवन और सतत लेखन नहीं किया। उनकी कविता में गाँव, खलिहान, खेत में संघर्ष करती हुई मानवता का चित्रण मिलता है, वहीं एक कोशकार के रूप में उनका योगदान भी अप्रतिन और अभूतपूर्व है। आज जबकि हिंदी पर बाज़ार और अँग्रेज़ी है, वहीं एक कोशकार के रूप में उनका योगदान भी अप्रतिम और अभूतपूर्व है। आज जबकि हिंदी पर बाज़ार और अँग्रेज़ी के वर्चस्ववाद का खतरा मेंडरा रहा है, भाषा की अस्मिता को चोटिल करने और उसे विकृत करने की कुटिल चालें चली जा रही हैं, त्रिलोचन  जैसे महानायक की याद बहुत स्वाभाविक और मार्मिक हो उठती है।

 (ेखक दैनिक हरिभूमि, रायपुर के संपादक हैं)

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