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1985 के अप्रैल
महीने की बात। एक संबंधी के विवाह में सागर जाना हुआ। वैवाहिक कार्यक्रम के दौरान
ही एक मज़ेदार शख्स से परिचय हो गया। नाम, उपनाम और काम तीनों दिलचस्प
!
नाम क़लम कुमार,
उपनाम ‘कोकिल’
और काम आबकारी इंस्पेक्टरी। मंचीय कवि थे। हिन्दी में मंच पर जमने के लिए गला होना
चाहिए या चुटकुलों की कला। कोकिल जी के पास गला था। उन्होंने नीरजाय शैली में कुछ
गीत सुनाए। रुझान जब एक जैसे हो, तो आत्मीयता जल्द बढ़ जाती है। कोकिल जी ने
प्रस्ताव किया-चलो, कविवर से मिलने चलते हैं। प्रस्ताव अच्छा था। मैंने फौरन हामी
भर दी और हम सुबह-सुबह विश्वविद्यालय परिसर के क्वॉर्टर नम्बर बी-15 में जा पहुँचे
।
कॉलबेल दबाते ही कमर पर लाल अंगोछा, बदन पर तेल और मुख पर
दाढ़ीधारी एक प्रौढ़ सज्जन बाहर आए। कोकिलजी ने उन्हें प्रणाम
किया। मुझे समझने देर न लगी कि यही शास्त्री हैं।
‘उस
जनपद का कवि हूँ’
और ‘ताप
के ताए हुए दिन’
जैसे काव्य संग्रहों के रचयिता और सोलह देशी-विदेशी भाषाओं के
जानकार। हमारे असमय आगमन पर उनके चेहरे पर खिन्नता जैसे भाव
दिखाई नहीं दिए। उन्होंने सहज स्वागत भाव से कहा-बरामदे की
कुर्सियों पर विराजिए। कुछ दण्ड बैठकें बाक़ी है। उन्हें
सम्पन्न कर अभी आया।
कवि और पहलवानी ?
हमें आश्चर्य हुआ फिर निराला का ख्याल आया वे महाकवि भी कम
बड़े पहलवान नहीं थे। दस मिनट बाद ही वे कुर्ता और लुंगी में
हाज़िर हो गए एक कुर्सी खींची और बैठते हुए बोला- दण्डबैठकों
को स्कूलों में सज़ा का रूप दे दिया गया है। यह ग़लत हैं इससे
अच्छा व्यायाम कोई दूसरा नहीं है।
मैंने कहा-लेकिन मुर्गा बनता जाना ज़रूर बड़ी सज़ा है।
खिलखिलाकर हँसे, बोले-मुर्गे को तो व्यायामों का शिरोमणि कहना
चाहिए। उससे हर अंग का व्यायाम हो जाता है।
‘कोकिलजी’
व्यायाम चर्चा से अकचका गए थे। फिर भी हस्तक्षेप के लिए
उन्होंने पूछ लिया-शास्त्रीजी
!
कितनी दण्डबैठकें
निकाल लेते हैं ?
त्रिलोचन बोले-पाँच सौ। जवानी में हजार-पंद्रह सौ मामूली बात
थी। एक बार चुनौती मिलने पर शहद की पूरी बोतल गटक गया था। पचा
नहीं और हालत ख़राब हो गई। डेढ़-दो हजार बैठके लगाईं, तब जाकर
आराम मिला।
विचित्र थे, कवि त्रिलोचन
। बातचीत में कोई आडम्बर नहीं, बड़े कवि होने का कोई प्रदर्शन
नहीं, आदर भाव के कारण हमारे मन में एक दूरी की भावना थी ।
दण्डबैठक प्रसंग से वह ऐसी छूमन्तर हुई कि त्रिलोचन
समवयस्क दोस्त लगने लगे।
इतनी सब बातचीत के बाद परिचय का नम्बर लगा उन्होंने कोकिल से
कहा-तुम्हें तो देखते ही ताड़ गया था कि कवि हो। कवियों के
शरीर से एक विशेष प्रकार की गंध आती है। फिर एक कवि दूसरे को न
पहचाने, यह कैसे संभव है
?
आज मैं एक दूसरे किसान जैसे कवि को देख रहा था। पहले नागार्जुन
को देखा था। सादगी और विद्धता का अनोखा तालमेल दोनों में एक
जैसे था। उन दिनों त्रिलोचन
सागर विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध पीठ के अध्यक्ष थे पर सादगी
और वेशभूषा में किसी कोने से अध्यक्ष नहीं लगते थे। काफ़ी वक्त
बनारस में गुजारा था। इसलिए फक्कड़पन और बनारसी अदा बात-बात
में झलकती थी।
व्यायाम से हटकर हमने कुछ साहित्य-चर्चा शुरू की। नये लेखन के
विषय में पूछा। त्रिलोचन
जी बच्चों के से उत्साह से बताने लगा-यहाँ बड़ा सुख है।
पत्रकारिता में बड़ा संघर्ष था। ठीक से न लिखना हो पाता था, न
पढ़ना । नये दो काव्य-संग्रह यहीं की देन हैं। समझो, जैसा
पुरसुकून मुक्तिबोध को दिग्विजय महाविद्यालय राजनांददगाँव में
मिला था, वैसा यहाँ मुझे मिल रहा है।
कोकिल जी बोले-मैं अपने हिन्दी-प्राध्यपक मित्रों के घर
छोटी-मोटी लायब्रेरी तक नहीं देखता। पाठ्यपुस्तकें और कुंजियाँ
ही उनकी पूँजी होती हैं। त्रिलोचन
बोले-इसके बरक्स अँग्रेज़ी के अध्यापकों की लायेब्ररी में
तीन-चार हजार किताबें होती हैं। वे तैयारी से पढ़ाते भी हैं।
मुझे चुहल सूझी । मैंने कहा-मेरे हिन्दी के प्राध्यापक मित्र
लायब्रेरी रखते ज़रूर हैं, पर वे पुस्तकें माँगकर लाते हैं और
लौटाना भूल जाते हैं। उनकी बड़ी सी लायब्रेरी ऐसे ही तैयार हो
गई है ?
इस बार पर सबको हँसी आ गई। तभी कोकिल उनसे पूछ बैठे- आप तिवारी
थे, शास्त्री कैसे बन गए
?
त्रिलोचन
मुस्कुराए, बोले- संस्कृत पढ़ने का परिणाम है। पंडितजी ने कहा
शास्त्री लिखा करो तो शास्त्री लिखने लगा। पालि मुझे पंडितजी
ने बोनस में सिखा दी। प्राइमरी में संस्कृत के साथ उर्दू भी
पढ़ी । एम. ए. बीएचयू से अँग्रेज़ी में किया । हिंदी मैंने
पढ़ी ही नहीं। मैंने लिखा है-‘तुलसी
बाबा भाषा मैंने तुमसे सीखी।’
हिंदी में तुलसी की पाठशाला का विद्यार्थी हूँ मैं।
त्रिलोचन जी में अजीब बात देखी। बीच-बीच में वे सुरती फाँकते
जाते ते पर तंबाकू की पीक थूकते नहीं थे, गुटक जाते थे।
त्रिलोचन जी को नहाना था, पर अपनी सरलता और सौम्यता के कारण वे
कह नहीं पा रहे थे। इस बात को समझकर मैंने खड़े होकर कहा-आपके
स्नान का वक्त है। हम लोग बाधा बने हुए हैं। चर्चा के लिए आपने
समय दिया । धन्यवाद, शायद बहुत छोटा शब्द होगा।
त्रिलोचन जी भी खड़े हो गए। हँसकर बोले, चाय-वाय तो पिलाई
नहीं, धन्यवाद की पात्रता कहाँ है
?
घर में कोई है नहीं और मुझे ठीक से चाय-शक्कर के अनुपात नहीं
मालूम।
अब वे स्मृति-शेष रह गए हैं। उनके साथ वह अद्भुत पीढ़ी भी विदा
हो गई लगती है, जो उम्र और ज्ञान की दुरियों को झुठलाते हुए
सबसे बराबरी से मिला करती थी।
विनोद शंकर शुक्ल
मेघ मार्केट, रायपुर, छत्तीसगढ
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