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फिर एक-
....माह अप्रैल 1988, त्रिलोचन जी विश्वविद्यालय परिसर स्थित अपने बड़े से मक़ान के
लम्बे-चौड़े ड्राइंगरूम में दरी पर बैठे थे। सफ़ेद लुंगी और बनियान पहने। बाहर तेज
धूप थी लेकिन भीतर सुकून देनेवाली ठंडक थी। त्रिलोचन जी ने मेरी ओर देखा और मुझे
बैठने का इशारा करते हुए आंटी जी को आवाज़ लगाई-‘देखो, शरद आई है।‘
त्रिलोचन जी आवाज़ सुन कर आंटी जी तुरन्त आ गईं। इस पर
त्रिलोचन जी विनोदपूर्ण स्वर में बोले-‘तुम्हारा नाम सुन कर
देखो ये कितनी जल्दी आ गईं वरना मैं अपने लिए इन्हें आवाज़
देता हूँ तो ये अनसुना कर देती हैं।‘ इस पर आंटी जी ने अपने
ठेठ उत्तरप्रदेशीय लहज़े में हँस कर उत्तर दिया-‘बरसों से तो
सुनती आ रही हूँ आखिर कब तक सुनूं
?‘
उन दिनों
त्रिलोचन
जी
डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) के अंर्तगत
‘पद्माकर पीठ‘ में कार्यरत थे।
यहाँ मैं बता दूँ कि त्रिलोचन जी की जीवनसंगिनी को मैं ‘आंटी
जी‘ और त्रिलोचन जी को ‘अंकल‘ कहती थी। जब मैंने पहलीबार
त्रिलोचन जी को ‘अंकल‘ कह कर सम्बोधित किया था तो मैंने उनसे
साफ़ शब्दों में पूछ लिया था कि आप साहित्य जगत् में
बहुप्रचलित सम्बोधनों के आदी हैं, आपको ‘अंकल‘ अटपटा तो नहीं
लगेगा ?
त्रिलोचन जी बोले-‘नहीं! यह सहज सम्बोधन है। इसमें थोथा
पांडित्य नहीं है।‘
उस दिन मुझे पहलीबार अनुभव हुआ कि त्रिलोचन जी ‘शास्त्रों‘ के
ज्ञाता थे, ‘(साहित्यिक) पंडिताई‘ से कोसों दूर थे। खैर, मैं
1988 के अप्रैल माह के उस दिन की चर्चा कर रही थी जिस दिन वे
मेरे नवगीत संग्रह ‘आँसू बूंद चुए‘ के फ्लैप के लिए अपने
तत्संबंधी विचार देने वाले थे। मैंने पूछा, कहाँ हैं आपकी
टिप्पणी ?
त्रिलोचन
जी
ने कहा-‘लिखो
!‘
‘क्या
?‘मैंने चकित होते हुए पूछा।
‘टिप्पणी
! मैं बोल रहा हूँ, तुम लिखो
!‘
त्रिलोचन
जी
ने आदेश दिया।
और उस दिन
त्रिलोचन
जी
मेरे नवगीतों पर बोलते रहे और मैं लिखती रही।
दो-....उस दिन आंटी जी की तबीयत कुछ ख़राब थी।
त्रिलोचन
जी
ने मुझसे पूछा-‘खाओगी?‘
मैंने कहा,‘नहीं
! मैं खा कर आई हूँ।‘
‘ठीक है, फिर मेरे लिए परोसो
!‘
त्रिलोचन
जी
ने कहा।
‘पद्माकर पीठ‘ की ओर से मिला हुआ सेवक रोटी, सब्जी और खिचड़ी
पका गया था। मैंने खाना परोस दिया। अभी एक चीज़ कम है, कहते
हुए उठे और किचेन में जाकर एक बड़ा-सा प्याज उठा लाए।
‘लाइए, इसे काट दूँ।‘ मैंने कहा।
‘नहीं प्याज को काट कर नहीं, ऐसे खाना चाहिए...‘ कहते हुए
त्रिलोचन
जी
ने प्याज को अपनी दोनों हथेलियों के बीच पूरी ताक़त से दबाया
और उसे लगभग कुचल दिया। फिर वे उस प्याज को स्वाद ले ले कर
खाते रहे।
तीन-.....त्रिलोचन
जी कहा करते थे कि नवगीत एक अच्छी विधा है।
सशक्त विधा है।
लेकिन इसके साथ ही वे कहते थे कि चाहे तुकान्त लिखा जाए या
अतुकान्त, काव्य में गेयता और प्रवाह होना चाहिए। ‘पद्माकर
पीठ‘ की ओर से आयोजित एक कविगोष्ठी में उन्होंने नवोदित कवियों
को सलाह देते हुए कहा था, ‘कविता में भारी-भरकम शब्दों का
अनावश्यक प्रयोग नहीं करना चाहिए। इससे कथ्य प्रभावित होता
है।‘
चार-....वह ‘पद्माकर पीठ‘ में उनका दूसरा कार्यकाल था।
इस बार उनमें उस उत्साह की कमी दिखी जो उनके पहले कार्यकाल के
दौरान उनमें थी। कुछ तो वे
विश्वविद्यालय
प्रशासन से असंतुष्ट थे और सबसे बड़ा कारण था, उनका एकाकीपन।
पिछले कार्यकाल के दौरान उन्हें इसी परिसर में अपनी जीवनसंगिनी
का चिरवियोग सहना पड़ा था। इस दूसरे कार्यकाल में
विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से उन्हें न फ़ोन
उपलब्ध कराया गया था और न ही कोई ऐसा सेवक जो कार्यालीन समय के
अलावा भी उनके साथ रहता जो कि उनकी अवस्था एवं अस्वस्थता को
देखते हुए ज़रूरी था। वे कई बार विस्मृति की अवस्था में आ जाया
करते थे। स्मृतिदोष के कारण वे प्रायः विषयान्तरित हो जाया
करते।
पाँच-....03 जुलाई 2007, मुझे हरिद्वार जाने का सुअवसर
मिला। मन में ललक थी कि
त्रिलोचन
जी
के दर्शन कर सकूंगी। किन्तु ऐसा न हो सका। हरिद्वार में कुछ
ऐसा समयाभाव रहा कि मुझे मन मार कर यही सोचना पड़ा- अगली बार
आऊँगी तो त्रिलोचन
जी से ज़रूर मिलूँगी
!....उस समय मुझे क्या मालूम था कि
त्रिलोचन
जी
से फिर मिलना कभी नहीं होगा।
डॉ.सुश्री शरद सिंह
एम-111, शांतिविहार,
रजाखेड़ी,
सागर
(म.प्र.)-
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