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सृजनगाथा

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-20, जनवरी, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। त्रिलोचन अंक।।

 

 

कविवर त्रिलोचन


राममूर्ति त्रिपाठी

 

वैसे त्रिलोचन जी विभिन्न काव्य परम्पराओं से परिचित हैं-हिन्दी, संस्कृत, उर्दू और अँग्रेज़ी। कहा भी है, भाषा के अगम समुद्रों का अवगाहन मैंने किया।’ ‘दिगन्त’ ‘तथापिउनके काव्य की संवेदनात्मक सामग्रीपरोप-रचितार्थ परिग्रहीं नहीं हैं। इसका स्त्रोत है उनका संघर्षमय जीवन। उनके काव्यों के वर्ण्य से यह नितान्त सुस्पष्ट है। वैसे उनके जिन संग्रहों से मैं गुजर चुका हूँ, वे हैं-ताप के ताए हुए दिन’ ‘गुलाब और बुलबुल तथाउस जनपद का कवि हूँ  इनके अतिरिक्त त्रिलोचन प्रतिनिधि कविताएँ भी देख चुका हूँ। इन सबके  द्वारा उनकी काव्यवृत्ति का औसत बोध हो जाता है। वैसे काशी के हम दोनों हैं और परिचय भी लगभग चालीस से अधिक वर्षों का है। उनकी अव्यवस्थित और संघर्षमय जीवन चर्या का भी मैं साक्षी रह चुका हूँ। इस सब से यह स्पष्ट है कि उनके पास आपबीती ही इतना है कि वही सब कह लिया जाय तो कहने को अपर्याप्त है। हाँ यह अवश्य है कि वे इस सामग्री को तब तक काव्य सामग्री नहीं बनने देते जब तक उनका सामाजिकरण न हो जाय। जिस प्रकार और लोगज्ञान को संवेदनात्मक बनकर ही काव्य उपजीव्य बनने देते हैं उसी प्रकार त्रिलोचन जी व्यक्ति वेदना का सामाजिकीकरण आवश्यक मानते हैं। यही कारण है कि अपनी व्यक्तिवेदना को भी तटस्थ रहकर व्यक्तिगत भूमि से ऊपर उठकर व्यक्त करने में संकोच नहीं बरतते ।

भीख माँगती उसी त्रिलोचन को देखा था।

जिसको समझा था है तो है यह फौलादी।

 

वे समाज में उठने वाली ध्वनियों को पकड़ लिया करते हैं और नई आशा अभिलाषा की पूर्ति के निमित्त संघर्षरत समाज के नए चित्र नई भाषा में देते हैं। उनकी रचनाओं में दुनिया का हैवानी रूप और उससे दीप्त भावों का उबाल ज़्यादा है। वे उस जनपद के कंठ हैं जो भूखा-दूखा है नंगा है, अनजान है जो कला नहीं जानता-कैसी होती है क्या है ? वह नहीं मानता कि कविता कुछ दे सकती है। उसके जीवन का सोना कब सूखा है-इतिहास ही बता सकता है। वे सामाजिकीकृत अपने अनुवाद जगत के कवि हैं ? और उनका यह अनुभव जगत जिन वस्तुगत अपादानों से बना है उनकी बानगी देखें-

बिस्तरा है न चारपाई है

ज़िंदगी खूब हमने पाई है

कल अँधेरे में जिसने सर काटा

नाम मत लो हमारा भाई है

ठोकरें दर-ब-दर की भी हम थे

कम नहीं हमने मुँह की खाई है

 

आदमी जी रहा है मरने को

सबसे ऊपर यही सचाई

 

लगभग इन और ऐसी ही परिस्थितियों से उनका अनुभव जगत बना है और काव्य रचना में वही सबसे आगे आने को उतावला रहता है।

 

वे वस्तुवादी दृष्टि के द्रष्टा हैं। इसी दृष्टि से जीवन और समाज को देखा है पर इस धारा के रूढ़ और क्रमागत फ़ारमूलों या साँपों का अता-पता उनकी रचनाओं में प्रायः नहीं मिलता या कम मिलता है शायद इसीलिए प्रगतिवादी कवियों की सूची में जो बड़े नाम मिलते हैं-वहाँ ये लापता हैं। शहर में रहते हुए भी इउनकी रुचि और रुझान देहाती परिवेश और देहाती लोगों की ओर ज़्यादा है। यही कारण रहा है कि व्यस्त सड़कों और काफ़ी हाउसों की अपेक्षा हरियाली या सूखापन जो भी हो-वीरान से जुड़े रहना ज़्यादा पसंद करते हैं। बनारस में भी सामने घाट की और खेत-खेत चार छःमील घूमने चल जाया करते थे। और प्रकृति के बीच रहना ज़्यादा पसंद करते हैं। आज सागर की भी पहाड़ी भूमि कुछ उसी के आसपास है। इस तरह एक ओर उनमें उनके मानसिक जगत में नगर और ग्राम का व्यवधान कम हुआ है तो उनको पहचानने वालों की भी दृष्टि में भी परिवर्तन आया है नगर केंद्रित सर्जनशीलता और ग्रामोन्मुख सर्जनशील चेतना के पास-पास आने की प्रक्रिया में त्रिलोचन को रेखांकित करने का स्वर उभरा है और अब उनका सवाल प्रगतिशील रनचाकारों में काफ़ी उभरकर ऊपर आ गया है। इस पहचान में उनका अपना वैशिष्ट्य स्पष्ट है। ये उन कवियों में नहीं हैं जो एक खेमे में अपनी पहचान बनाने के लिए रूढ़ फार्मूलों और हथियार हुए प्रतिमानों का उपयोग करते हैं- भुवनमोहिनी उनका भी वरण करे जिधर उचक-उचक करनारद अपनी कुर्सी यहाँ से वहाँ और वहाँ से यहाँ उठाने फिरते हैं। उनका काव्य संसार उस झुग्गी झोपड़ी का संसार है जहाँ मानवता के आँसू टपकते रहते हैं। प्रचार-प्रसारकामियों का इनसे क्या लेना-देना ? लेकिन सरस्वती बन्ध्या नहीं होती-सरस्वती उपासकों के भी दिन बदलते हैं । वे अपनी काव्य यात्रा और पहचान में आने की प्रक्रिया पर टिप्पणी करते हैं-

अब शोशा उसके तन मन में छिप नहीं रही है

सविभक्त वपुयौवन से आज अनोखा

लगता है शंका होती है, सच या धोखा

क्या है रंग रूप में कभी न कहीं रही है

किसी एक में नहीं, ज्वार सर्वत्र दिखाई

देता है एक ही यही है जीवनधारा

वेगवती, जिसके प्रवाह से वारा न्यारा

हो जाता है बोध शक्ति का लिखी लिखाई

यह वह कविता नहीं-निखिल सुन्दरता-सीमा

जिसकी बँध सी गई, पारखी जिसका लेखा

जोखा करते हैं,यह है वह है, अनदेखा

करते हैं उस मूल स्त्रोत को जो द्रुत धीमा

वे आँखें कुछ नई ज्योति से जल जाती है

गूढ़ अर्थभूमियाँ स्पष्ट सी दिख जाती है

कितनी भी धूप चढ़ जाय, मौसम आग उगलने लगे दैन्य और विवशता से कंचुक फट जायँ पायजामा-कुर्ता चिथड़े-चिथड़े हो उठे-दिलवाले सहृदय रचनाकार का दिल राग से कैसे रहित हो सकता है वही तो रचनाकार का मेरुदण्ड है-परिस्थितियों के बदलने से उसी के विभिन्न रूप मनोजगत पर उभरते हैं यह राग-ऊर्जा ही है जो दिलदार मानव के जीवन की जड़ता तोड़ती है-और निरन्तरंग पाषाणी क्रीड़ा को समाप्त कर देती है-

तुमने अनजाने वह पीड़ा

छवि के शर से दूर भगा दी-तुम्हें सौंपता हूँ

तृप्त-अतृप्त मानवीय जीवन की मनोदशा ही कवि की यात्रा के पाथेय है। त्रिलोचन का कवि आह्वाद-उल्लास के लिए प्रकृति का साहचर्य चाहता है। उसके विजन जीवन के साथी प्रकृति के जीव जगत है। देखें-

चोंच में दबाए एक तिनका / गौरय्या

मेरी खिड़की के खुले हुए

पल्ले पर / बैठ गयी

और देखने लगी

मुझे और कमरे को

मैंने उल्लास से कहा / तू आ

घोंसला बना / जहाँ पसन्द हो

शरद से सुहावने दिनों से

हम साथी हो

इनका अनुभव जगत अपना है- अतः अनुरूप भाषा और पद्धति भी अपनी है। उसमे भीप्रसाद के साथ गाम्भीर्य है। पानी वही स्वच्छ रहता है जहाँ गहराई होती है। भाषा के सहारे पाठक इनके भाव जगत की समीपी हो जाता है।

 

त्रिलोचन जी की मान्यता है कि कविता एक अनायत्त मानसिक लहर की परिणति है। उस लहर पर रचयिता व्यक्ति का कोई अधिकार नहीं है। वह लहर अनुरूप भाषा में परिणत हो जाती है। जैसे सहज भाव वैसी ही नपे-तुले कसाव की सहज बोधगम्य भाषा। इससे स्पष्ट है कि उनमें कोई ग्रंथि नहीं है कि पाठकों पर आतंक जमाया जाय । उन्होंने कहा है-

जब लहर आई तो मैं ने गाया

जी का व्यवसाय बस यही पाया

शब्द और अर्थ ये जगत के ही

भाव अपने उन्हीं में भर लाया। - (गुलाब और बुलबुल)

त्रिलोचन जी काव्यभाषा के संदर्भ में बोलचाल के गद्य की भाषा के पक्षधर है। जब व्यक्ति हृदय लोक हृदय में फना हो जाता है तब उसकी सत्ता नहीं उसकी सीमा टूट जाती है वह व्यापक हो जाता हो जाता है इउनकी भाषा शैली गाँव-गवई के जीवन की तरह सादी ही है-पर कभी-कभी गोस्वामी जी के बरवैरामायण की भाँति आलंकारित भी हो जाती है। एक हेतूपेक्षा का प्रयोग है-

सुलावण्य आँखों में आता रहा है।

हुआ अश्रुजल यों ही खारा नहीं है।

कवि का ख्याल है कि जो सौंदर्य धरती से आकाश तक व्याप्त है-कवि उधर क्यों नहीं देखेगा? यही तो उसकी परमसत्ता है। यह मन की खोट है जो सौंदर्य की परिधि सीमित करता है। ऐसे सौंदर्यदर्शी कवि का अधिकांश फटेहाल जीवन भी एक विडंबना ही है उनका व्यक्तित्व ऐसे विरोधों से व्याप्त है। जो जितने ही विरोधों को पचाकर चलता है-वह उतना ही समर्थ होता है।

 

निष्कर्ष यह कि त्रिलोचन का काव्यप्रस्थान एक ऐसा स्वनिर्मित प्रस्थान है जो अपने समशीलों के खेमे का होकर खेमेबाजी की झलक से सर्वथा शून्य है। भाषा और छंदोनिर्वाह के प्रति बेहद सजग होने पर भी अनपेक्षित वाग्भांगिमा से मुक्त है-फिर भी सटीक प्रयोग और समर्थ भाषाबद्ध है।

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन,राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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