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त्रिलोचन
शास्त्री देश के उन बड़े कवियों में थे जिनका वास्तविक महत्व अभी तक पहचाना नहीं
गया है । एक ख़ास साहित्यिक समूह में उनका बहुत सम्मान था । वे हिंदी के मूर्धन्य
कवियों में शुमार किए जाते थे । शायद यही समूह उनका नाम भी लेता था – कुछ इस अंदाज़
मेंकि रक़ीबों ने रपट लिखवाई है जा-जाके थाने में, कि अकबर नाम लेता है ख़ुदा का इस
ज़माने में ।
अति प्रगतिशील हलके में उनका नाम इसलिए लिया जाता था,
क्योंकि वे जन संस्कृति
मंच के अध्यक्ष थे लेकिन दूसरे लोगों के लिए उनकी क़ीमत और
अहमियत क्रमश: कम होती गई
थी। कुछ तो साहित्य की दुनिया की राजनीति के कारण और कुछ इस
कारण कि हिंदी की
साहित्यिक आलोचना का विवेक अरसे से कुंद पड़ा है।
यह बात और है कि त्रिलोचन का व्यक्तित्व इतना बड़ा था कि उनकी
उपेक्षा या अनदेखी
करना किसी के लिए संभव नहीं था। मैं त्रिलोचन को जितना समझ
पाया हूँ उसके लिहाज़ से
वे हमारे बीच शायद एकमात्र ऐसे प्रसिद्ध कवि थे जो भारतीयता से
सराबोर कविता लिखते
थे। यह परंपरा प्रसाद,
निराला,
महादेवी आदि के बाद बुझ-सी गई थी।
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय ने इसका एक तरह से
पुनराविष्कार किया था,
लेकिन अपनी विशिष्ट तर्ज़ में,
जिसमें पश्चिमी साहित्य के अनेक तत्व घुले-मिले थे।
अज्ञेय के लिए भारतीयता या हिंदीपन एक आह्वान की चीज़ थी। वे
कुछ परिश्रम से या ज़ोर देकर इसे सिद्ध करते भी थे। त्रिलोचन
के लिए यह अत्यंत सहज था।
दरअसल,
उनका पूरा व्यक्तित्व ही सहज भारतीय का व्यक्तित्व था। माखनलाल
चतुर्वेदी
अपने को एक भारतीय आत्मा
कहते थे। त्रिलोचन को यह कहने या बताने की कोई ज़रूरत
नहीं थी। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों में ही भारतीय
आत्मा कूट-कूटकर भरी थी।
इस अर्थ में शमशेर भी एक भारतीय कवि ही थे लेकिन उनमें उर्दू
के संस्कार गहरे तक
समाए हुए थे इसलिए उनकी कविता एक अलग चाशनी में डूब कर निकलती
थी और अपनी इस
विशिष्टता की वज़ह से आकर्षित करती थी।
त्रिलोचन ने लोक भाषा अवधी और प्राचीन संस्कृत से प्रेरणा ली,
इसलिए उनकी
विशिष्टता हिंदी कविता की परंपरागत धारा से जुड़ी हुई है।
मज़ेदार बात यह है कि अपनी
परंपरा से इतने नज़दीक से जुड़े रहने के कारण ही उनमें
आधुनिकता की सुंदरता और सुवास
थी। हिंदी जगत में पोंगापंथ का राज कभी ख़त्म नहीं हुआ,
पर उसका असली बल आधुनिक
चेतना का सहज विकास है जिसके कारण उसने स्वाभाविक रूप से
जनवादी भूमिका निभाई है।
ध्यान देने की बात है कि वेदांत और भक्तिधारा से जुड़े होने के
कारण ही निराला
के साहित्य में प्रगतिशीलता के दर्शन होते हैं। उनकी
प्रगतिशीलता मार्क्सवाद या
किसी अन्य वाद की मोहताज़ नहीं थी। यह उनके भीतर से उपजती थी
जिसके मजबूत आधार
भारतीय परंपरा में खोजे जा सकते हैं। नागाजरुन में यह तत्व
संस्कृत साहित्य और लोक
चेतना से आया था। त्रिलोचन तो बिना लाग-लपेट के कहते थे कि
तुलसी बाबा,
मैंने कविता
तुमसे सीखी। यह कोई राजनीतिक वक्तव्य नहीं था। त्रिलोचन की सहज
कृतज्ञता थी।
तुलसी की कविता में भी अक्खड़पन मिलता है जो उन्हें
हीनता-दीनतावादी कवियों से
अलग करता है। त्रिलोचन के व्यक्तित्व और लेखन में यह बहुत
गहराई तक समाया हुआ था।
उनकी कविता में जो बेलौसपन,
अक्खड़ता और प्रगतिशील आग्रह था,
उसका सार-तत्व
उन्होंने अपनी परंपरा से खींचा था और शेष उनका अपना बनाया हुआ
था। जहां तक मुझे पता
है,
वे अँग्रज़ी और उसके साहित्य के बड़े ज्ञाता नहीं थे।
हाँ,
अँग्रज़ी का सामान्य ज्ञान ज़रूर रखते थे। यह बात हिंदी के
अनेक देशी और
लोकपरक कवियों के बारे में सच है। क्या अँग्रज़ी से यह दूरी ही
उनकी रचनात्मकता को
भारतीय या कहिए हिंदवी बने रहने देने में काम आई?
अकसर देखा जाता है कि जिस कविता में पश्चिम या मार्क्सवादी
मुहावरे जड़ जमाए
बैठे होते हैं,
उसमें वह स्वाभाविक शक्ति या आत्मीयता नहीं मिलती जो त्रिलोचन
की
कविता के हर कोने-अंतरे में उपस्थित है और जिसके कारण त्रिलोचन
की कविता को एकदम
अलग से पहचाना जाता है।
त्रिलोचन खांटी देशी आदमी थे। यहां तक कि उनका उच्चरण भी
बिलकुल देशी था जिसमें
किसी प्रकार की आधुनिकता या कृत्रिमता नहीं थी। मैं इसके लिए
ठेठ शब्द का प्रयोग
करना चाहूँगा। इसका एक साक्ष्य यह है कि त्रिलोचन की कविता
तद्भव-प्रधान है। हिंदी,
दरअसल,
तत्सम की नहीं,
तद्भव की भाषा है। जिस कवि में तत्समता का प्राधान्य देखिए
उसके बारे में आप निश्चित मान सकते हैं कि वह लोक चित्त से कुछ
दूर है।
सवाल यह उठता है कि फिर त्रिलोचन ने सॉनेट जैसी विधा क्यों
चुनी,
जो अँग्रज़ी कविता की एक खास विधा है। इसके दो उत्तर मेरी समझ
में आते हैं। एक तो यह कि
त्रिलोचन अंग्रेजीवालों को दिखाना चाहते थे कि देखो,
हिंदी में कितनी शक्ति है। यह
एक तरह से एक ठेठ हिंदवी के लिए अपनी हीनता-ग्रंथि से मुक्ति
पाने और अपनी सक्षमता
के प्रदर्शन का माध्यम था।
दूसरी ओर,
इसमें संस्कृत कविता से गहरा अनुराग भी है जो ज्यादातर वर्णिक
छंदों पर
आधारित है। क्या यह उम्मीद की जा सकती है कि अब जब त्रिलोचन
हमारे बीच नहीं रहे,
उनकी थाती का मूल्याँकन करने की कुछ कोशिश की जाएगी?
भूमंडलीकरण के विरोधी लेखकों
और बुद्धिजीवियों का यह सहज दायित्व है।
(लेखक इंस्टीटच्यूट ऑफ सोशल साइंसेज,
नई दिल्ली में वरिष्ठ फैलो हैं)
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