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त्रिलोचन
इन दोनों
बीमार हैं, कमजोर हैं....सिर्फ़ शरीर से....। किसी व़क्त शमशेर ने त्रिलोचन
के प्रिय
छन्द सॉनेट से उनकी कद-काठी की तुलना की थी, कहा था-दोनों एक हैं । ठीक ही तो है,
दोनों में नझोले कद के पुष्ट, समनाप में ठीक से गठे-बँधे हैं। वे फिर से
‘सॉनेट’
हो जाएँ, यही कामना है।
जब त्रिलोचन भोपाल में थे, कई रातें दो-दो बजे तक उनके साथ
टी.टी. नगर और पं. रविशंकर शुक्ल मार्ग पर पैदल गुज़रीं । पहली
बार जब वे हमारे घर आये तो स्नेह से चौंकाया-“आप
बहुत लोकप्रिय हैं।”
–
“कैसे
?”
एकान्त-प्रिय व्यक्ति लोकप्रिय कैसे हुआ भला
?
- “उधर
टीन शेड के पास हमने एक पढ़े-लिखे दिखने वाले युवक से पूछा, एक
प्रभाकर श्रोत्रिय हैं, इधर कहीं रहते हैं, पता हमें याद नहीं,
हमीदिया कॉलेज में पढ़ाते हैं, तो उसने कहा-चलिए, हम आपको उनके
घर छोड़ देते हैं। छोड़कर चला गया, इसे श्रद्धा कहते हैं।....
तो यह है,”
और उन्होंने जैसे पुष्टि में दायाँ हाथ नीचे की तरफ फैलाया।
दरअसल घर खोजकर आने का दबाव न डालने का यह सौजन्यपूर्ण ढंग था,
पर अपन ने सोच-लोक की और आदमी की पहचान इस तरह भी होती है।
क्योंकि उस अनजान व्यक्ति ने जो पहचान दी, वह तो आज तक
क़लमघिसाई ने नहीं दी।
त्रिलोचन
हर वाक्य और हर शब्द ही नहीं, हर अक्षर पूरा बोलते हैं जैसे
पहले लोग बरू से जमाकर अक्षर लिखते थे। भवानी प्रसाद मिश्र का
पाठक यदि लेखक से कहता था
:
“जिस
तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख
और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख।”
तो त्रिलोचन शायद अपने पाठक से कहेंगे –
“जिस
तरह हम बोलते हैं उस तरह तू सुन
और इसके बाद भी हमसे अधिक तू गुन।”
भवानी भाई के भेड़ाघाट की नर्मदा में जैसे मन की नौका ऊँची
संगमरमरी चट्टानों से घिरी मुग्ध बाँकी-तिरछी अदा में
खलती-कूदती बहती जाती है, वैसा त्रिलोचन के यहाँ नहीं है। यहाँ
समतल गंगा में घाट-घाट को निरखते बहना और कभी निर्वात चौड़ाई
में सरकना होता है। चाहें तो नीचे अथाह को महसूस कर सकते हैं।
ख़ैर,कविता की बात आगे, फिलहाल सत्संग की बात करें।
त्रिलोचन जितने पण्डित हैं उतने भोले और बेहद सुजन, दूसरे का
मन सहेजते हैं एहतियात से। एक बार खाने के व़क्त आ गये। कढ़ी
बनी थी। एक कटोरी, दो कटोरी, तीन, चार...वे खाली करते जाएँ,
ज्योति भरती जाए, यह सोचकर कि इन्हें कढ़ी पसन्द है (जबकि
मामला उलटा था। ) पाँचवीं बार उन्होंने हाथ से कटोरी ढँक ली।
हँसते हुए कहने लगे, “अब
आप कढ़ी रखना बन्द करें तो हम खाना शुरू करें। हम इसलिए इसे
जल्दी पी डालते हैं कि इसके बाद आराम से खाना खाएँ
!
पर रखती ही जाती हैं...तो यह है।”
आप त्रिलोचन
के साथ अधरात में, दूर तक खिंची सड़क नाप रहे हैं, और
त्रिलोचन
हैं कि एकालाप में हैं-आपको संबोधित करते, मगर आपको बेदखल
करते । वे एक कसी हुई वीणा की तरह हैं कि कोई एक तार कहीं से
छू दे तो देर तक झंकार, गूँज-अनुगूँज सुने। त्रिलोचन
में ज्ञान सिर्फ़ ‘ज्ञान-राशि’
के रूप में हीं नहीं है,
‘वाक्-राशि’
के रूप में भी है। इसमें विलक्षण स्मरण की भूमिका भी है और कहन
के रस का आत्मभोग भी।
उन्हें जाने कितने विषयों का, कितनी भाषाओं का ज्ञान है;
पता नहीं कब, कैसे अर्जित किय होगा। फ़ाकामस्तियों के
ऊबड़-खाबड़ दौरों में, शिक्षाकाल में किसी अव्यस्थित कालाटन
में, पर है वह पुख्ता और प्रामाणिक । यह सिर्फ़ बहुश्रुत
मधुकरी-वृत्ति से संभव नहीं। आप किसी देश-काल, समाज, दर्शन,
विज्ञान, विचारधारा, व्यक्ति, इतिहास, संबंध, युद्ध, अर्थ,
कानून, ज्योतिष, गणित, व्याकरण, छन्द, शास्त्र, काव्य,
आधुनिकता, परंपरा, कला, यहाँ तक कि पेड़, पौधे वनस्पति और
पशु-पक्षियों के बारे में बारीक जानकारी त्रिलोचन
से पा सकते हैं। पहलवानी, व्यायाम और मालिश के गुर भी आप उनसे
चाहें तो जानें। विजय कुमार
‘देव’
को एक दिन पानी से मालिश के फ़ायदे बताने लगे, क्योंकि वे नहा
रहे थे और वह इंतजार कर रहा था।
त्रिलोचन का यह है कि वे चलते-फिरते विश्वविद्यालय हैं, जिसमें
कई फैकल्टियाँ हैं। आप जिस विभाग में पढ़ना चाहें, पढ़े । कई
प्राध्यापक तो क्लास में पढ़ाने से पहले उनसे नियमित पढ़कर
जाते थे। त्रिलोचन कहीं से भी शुरू हो जाते हैं और अगर आप कोई
नयी बात कह दें या नया प्रश्न कर दें तो जारी विषय की पोटली
वहीं पटक कर, दूसरी बाँधने लगते हैं । जैसे कुछ लोग, लोगों की
व्यक्तिगत ज़िंदगी में घुसकर, ताक-झाँक और ऐय्यारी-जासूसी करते
रहते हैं, वैसे ही त्रिलोचन विषय के भीतर घुसते, उसकी जड़ों तक
पहुँचते और विस्तार में फैसले हैं। यदि आप उन्हें भटकाएँ नहीं,
या बाधा न दें तो वे किसी बात को पक्के राग की तरह आलाप से
उठाने, बढ़त लेने और अपनी पूर्णता तक पहुँचाने भर भरोसा करते
हैं। इसमें संगीत का जो ज़रूरी लक्षण
‘रंजकता’
है, इसकी उम्मीद वे ख़ुद तो अपनी गायकी से शायद ही करते हों।
हाँ, श्रोता की सहृदयता से अलबत्ता करते होंगे। इसीलिए ज़रूरी
धैर्य के अभाव में अगर उनका कोई नादान श्रोता बीच ही में कोई
दूसरी फ़र्माइश कर बैठता है तो वे उसी के संग चल पड़ते हैं।
कलकत्ता में कभी-कभी आते थे, तब उनका बेटा अमितप्रकाश सिंह
वहाँ सपरिवार रहता था। एक बार त्रिलोचन
के साथ कलकत्ता के प्रसिद्ध बॉटोनिकल गार्डन का कार्यक्रम
बना। वहाँ वह प्रसिद्ध वटवृक्ष है जिसकी जड़ें और तना कहते
हैं, दो मील क्षेत्र में फैला है। हमारे साथ बेटी अनामिका जैसी
छात्रा थी और त्रिलोचन
जैसा शिक्षक । वे चलते जाएँ, और उसे हर पौदे का, वनस्पति का,
चिड़िया का नाम बताते जाएँ, लक्षण बताते जाएँ माली भी हैरत
में। ज्योति और मेरे लिए भी यह सब ज्ञानवर्द्धक और रोचक था।
कुसुम खेमानी भी खूब उत्साहित थीं। वह अटवी-अटन सचमुच सार्थक
हो गया। अनामिका खुश थी। यह वही लड़की थी जिसने तीन-चार साल की
उम्र में घर आये अज्ञेय द्वारा एक सुन्दर पीला विदेशी सेबफल
हाथ में देने पर उसे आँगन में झटके से फेंक दिया था
!
और भोपाल में जब पहली बार यही त्रिलोचन घर आये थे तब वह शायद
दो-तीन साल की रही होगी। उनकी दाढ़ी देखकर डाढ़ मारकर जो रोयी
तो चुप होने का नाम ही न ले। त्रिलोचन
प्यार करना चाहे तो वह और चीखे। उसे उस कमरे से जब तक हटाया
नहीं, चुप नहीं हुई। उस दिन त्रिलोचन
बहुत उदास हुए। रंग फीका पड़ गया। त्रिलोचन
को ऐसा कभी नहीं देखा था- न पहले, न बाद में
!
ख़ैर, अब वही नकचढ़ी बड़ी हो गयी थी, शायद बी.ए. में पहुँची
थी। उनसे लगी-लगी पार्क में सब देखती-सुनती रही। उस दिन का
फ़ीकापन आज जाकर सुर्ख हुआ।
त्रिलोचन
से साहित्य-चर्चा खूब हुई। चर्चा माने एकालाप । भरोसा है कि वे
भी ऐसा श्रोता पाकर ज़रूर खुश हुए होंगे, क्योंकि भोपाल में
(और अन्यत्र भी) उन्हें वाचाल या चपरकनाती तो बहुत मिले होंगे
पर ऐसा मौन जिज्ञासु शायद ही मिला हो, जिसे मालवा में
‘घुन्ना’
कहते हैं। शायद इसमें वक्रोक्ति के साथ चुपचाप सुनते हुए
‘गुनने’
की ध्वनि भी है। त्रिलोचन से हर अध्यापक एकालाप की दीक्षा या
ज्ञान का महत्त्व ही यह है कि मनों किताबों का, जीवनानुभव,
प्रतिभा और मनन का निचोड़ विद्यार्थी को गुरू-मुख से सुनने पर
मिल जाता है। त्रिलोचन
ऐसी ही गुरु-मुख है।
यों त्रिलोचन
से आप संसार के कई-कई कवियों और लेखकों पर चर्चा कर सकते हैं,
परंतु तुलसी और निराला उन्हें बहुत प्रिय हैं। यों वे संस्कृत
के शास्त्री हैं। और शास्त्र और साहित्य के मर्मज्ञ हैं, पर
लोक में भी उनकी गहरी पैठ है। दोनों के मेल से वे तुलसी की
पंक्ति-पंक्ति, शब्द-शब्द की अनूठी व्याख्या करते हैं-
‘निज
मुख मुकुर मुकुर निज पानि। गहि न जाई असि अद्भुत बानि।।’
पंक्ति के भीतर छिपा वागर्थ इतना सुन्दर, पहली बार उन्हीं से
जाना। ‘राम
की शक्ति-पूजा’
तो उन्हें कंठस्थ है। (अब पता नहीं, स्मरण रही हो या न..) इसकी
अद्भूत व्याख्या और अप्रतिम विवेचना वे करते हैं। जिस कवि को
उठा लेते हैं, उसकी रचनाओं से वे ऐसे अनूठे और चकित करनेवाले
उदाहरण चुनते हैं कि परिचित कवि से एक अपरिचित मुलाकात होती
है।
भाषा त्रिलोचन का बड़ा ही प्रिय विषय है। वे कहीं न कहीं से
घूम-फिर कर भाषा तक ज़रूर आ जाते हैं। विगत कुछ वर्षों से तो
वे तुरन्त भाषिक होते रहे हैं। शब्द के पूरे प्रयोग, व्याकरण,
इतिहास, सन्दर्भ समझाते वे एक तरह से भाषा की सोनोग्राफी कर
देते हैं। दूसरे शब्दों में जब वे भाषा की राह पकड़ लेते हैं
तो वह कहाँ तक जाएगी आप नहीं तक सकते-
‘इस
पथ का उद्देश्य नहीं है श्रान्त भवन में टिक रहना
/
किन्तु पहुँचना उस सीमा तक जिसके आगे राह नहीं (प्रसाद)
!
तो यह है। कलकत्ता में जब एक बार भारतीय भाषा परिषद की
व्याख्यान-माला के लिए उन्हें आमंत्रित किया तो सोचा कि कोई भी
विषय दिया जाएगा, त्रिलोचन भाषा पर ही आएँगे तो क्यों न विषय
ही भाषा से सम्बन्धित दिया जाए
!
तो कुछ ऐसा विषय दिया जिसका तात्पर्य था
‘बदलते
सर्जना युगों में बदलती भाषा’।
अब त्रिलोचन को इस विषय पर घूम-फिरकर आने की ज़रूरत नहीं थी।
वैसे भी त्रिलोचन सीधी राह पर चलनेवाले पथिक और लेखक हैं।
उनमें कोई छल-छन्द और वक्रता नहीं, उतनी भी नहीं जितनी वे
भाषाई बहस में समझाते हैं। और वह छलाघात तो उन्हें जन्मजात
अप्राप्य है, जो उस शिविर ने उनके साथ किया जिसकी नायकी करते
हुए वे हलाक हुए । क्या इन लोगों को पहले पता नहीं था कि
त्रिलोचन जन्म से सर्वहारा होते हुए भी ऐसे औढर दानी हैं
जिन्होंने कलकत्ता में हाथरिक्शा खींचने पर भी साहित्य,
संस्कृति, दर्शन, परम्परा और सुजनता को कभी अपने दलीय गणित के
दायरे में नहीं रखा;
खुले आकाश में हर पल उछाला है। क्या इन्हें पता नहीं कि
त्रिलोचन धरती के ही नहीं
‘दिगंत’
के भी कवि हैं, सिर्फ़ इस वज़ह से भी उन्हें जो त्रास झेलना
पड़ा, उससे भी वे कई स्तरों पर हमारे समय का इतिहास बनते हैं;
यथार्थ और संस्कृति दोनों का। सीमित बुद्धि को सोचना चाहिए कि
वामन अगर बँध जाएँ तो क्या यह आपकी फाँस और ताकत का कमाल है या
आपको उत्साहित करने के लिए उसकी छूट
!
(लेखक की आलोचना किताब'कवि
परंपरा तुलसी से त्रिलोचन'/1983
से)
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