vbn

SRIJANGATHA.COM

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच

सृजनगाथा

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-20, जनवरी, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। त्रिलोचन अंक।।

 

 

बनारस के कवि त्रिलोचन


फणीश्वरनाथ रेणु

 

स बार, शभूनाथ मिश्र के घर पर त्रिलोचन जी का चिमटा गड़ा था । सुबह, जिस समय पहुँचा- क़रीब दस बजे त्रिलोचन के प्रसादपाने का समय था । कबिराहा बाबाजी लोग भात को प्रसादजलपान कोबालभोगऔर नमक कोरामरसकहते हैं और कबिराहा गृहस्थ प्याज कोराम लड्डू। ड्राइंग रूम में ही टेबुल केकवर को हटाकर थाली लगा दी गई । हमारे परिवार में, बचपन से ही बड़ों के भोजन के समय पास बैठकरभोजनदेखने की आदत डलवाई जाती थी । पंखा झलते हुए, पंखे से मक्खी उड़ाते हुए अथवा गिलास का पानी बदलते हुए, हम बड़ों का भोजन देखा करते । परिवार केसंत-मति कर्त्ता का विश्वास था कि, इससे बालक परम संतोषी होता है और भोजन करने का सही सलीका सीखता है-संतोषीहुआ या नहीं, कह नहीं सकता किंतु लोगों को भोजन करने के इतनी तरह के तरीक़े, ढंग और आदतों को देखकर मानवचरित्र की विचित्रताओं पर मुग्ध अवश्य हुआ हूँ इसलिए, त्रिलोचन के भोजन के समय पहुँचना अच्छा ही हुआ । सोचा, अगर ये भोजन काल में शरीर को एकआइलैंड यानी द्वीप समझने वाले जीव हुए तो, मैं तब तक कुछ पढ़ने का बहाना करता हुआ-बैठा रहूँगा और, यदि वे, भोजन का रस लेते हुए प्रेमियों से रसभरी बतियाँ करनेवाले हुए तो फिर क्या कहने! पापड़ टूटने की कुड़कुड़ाहट! चटनी अथवा अचार खाकर चटखारे लेते, और हरी मिर्च को दाँत से तनिक खोंटकर सीत्कारकरते बाँते करेंगे तो, सब कुछ एक ही साथ देखने-सुनने का मौक़ा मिल जाएगा । (आलू का चोखा सानकर तैयार करना एक आर्ट है और मुझे उसी दिन पता चल गया कि शंभूनाथ के चौके-चूल्हे तक आर्टिस्टोंकब्ज़ा है)

 

बहरहाल, खाते-खाते बातें होती रही, उनके भोजन करने के ढंग से यह जानना बाक़ी नहीं रहा कि, त्रिलोचन का पेट बुफ़े नामक किसी भोज में मेरी तरह कभी नहीं भर सकेगा....दूसरे देशों में क्या होता है नहीं जानता । अपने देशों के कई महानगरों के महाभोजों के इस बुफ़े (का व्युत्पत्ति ?) में शरीक़ होने के समय मुझे बार-बार एहसास हुआ है भारत में कितनी भूख है?’ झपट्टे मारते हुए चतुर चीलों (नर-मादा) से त्रिलोचन नहीं जीत सकेंगे । उन्हें कभी भी चिकन का कोई बढिया पीस नहीं मिल सकेगा ! मुर्गी की मांसल रान कभी हासिल नहीं कर सकेंगे इसलिए-इसलिए- अजी माल था !तुष्ट हूँ यहाँ’- कहने का कोई सवाल ही नहीं उठेगा । पहले खाना मिला कर तो कठिन नहीं है बात बनाना ।

 

भोजन कर चुकने के बाद त्रिलोचन अन्य आगत सज्जनों से साहित्य-विषयक बातें करने लगे । हमारे एक भाषा-शास्त्री मित्र, अपनी पत्नी द्वारा लिखित व्यक्तिगत निबंधों की सद्यः प्रकाशित पुस्तक ले आए थे, एक निबंध में कैक्टस की चर्चा करते हुए उसकी पुष्पहीनता पर तरस खाकर कुछ कहा गया था । मैंने कहा किंतु कैक्टस के भी फूल होते हैं..... मैं कहना चाहता था-उदाहरण सामने हैं। अर्थात् त्रिलोचन, फूलनेवाला कैक्टस । कहा नहीं, क्योंकि इसके कुछ क्षण पूर्व ही, मुझे उनके उस सॉनेट की पंक्तियाँ याद आई थीं-जिसमें दशाश्वमेध घाट के चित्र-कल्प हैं । सो मेरे लिए तो-

दशाश्वमेध घाट पर गंगा की धारा है

तट पर जल के ऊपर ऊँचे (भवन नहीं)

त्रिलोचन खड़े हैं....

 

 .......कविता मेरे लिए समझने-बूझने या समझाने का विषय नहीं, जीने का विषय है । कवि नहीं हो सका, यह कसक सदा कलेजे को सालती रहेगी और, अगर कहीं कवि हो जाता तो, त्रिलोचन के एक सॉनेट की पैरोड़ी लिखकर सहस्त्रलोचन नाम से प्रकाशित करनाने की हिमाक़त भी कर बैठता... और, मैं त्रिलोचन ही क्यों होना चाहता-पंत, नरेंद्र, सुमन, बच्चन, महादेवी, दिनकर, नलिनविलोचन अथवा रेणु क्यों नहीं ? यह सवाल मैं अपने-आपसे बार-बार पूछता रहता हूँ ।

 

त्रिलोचन जी को देखते ही हर बार मेरे मन के ब्लैक बोर्ड पर, एक अगणितक, आसाहित्यिक तथा अवैज्ञानिक प्रश्न अपने-आप लिख जाता है : ‘वह कौन-सी चीज़ है, जिसे त्रिलोचन में जोड़ देने पर वह शमशेर हो जाता है और घटा देने पर नागार्जुन.....?

(वर्षों पूर्व प्रकशित आलेख)

 

◙◙◙

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google