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सृजनगाथा

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-20, जनवरी, 2008

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।। त्रिलोचन अंक।।

 

 

दिगन्त


प्रो. नलिन विलोचन शर्मा

 

दिगन्त के कवि त्रिलोचन की कविताओं को पढ़ने वाले से छिपा नहीं रहेगा कि उनके रचयिता को शब्दों के लक्ष्यार्थ और व्यंग्यार्थ के बारे में कुछ ज़्यादा जानना बाक़ी नहीं है। उसने दिगन्त शीर्षक इस लक्ष्य से ज़रूर चुना है कि उसे विश्वास है कि उसकी कविताएँ हिन्दी के दिगन्त को निर्धारित करती है। यह एक महत्वाकांक्षापूर्ण शीर्षक है, किन्तु जैसी कविताओं के संग्रह पर है, उनके लिए इससे उपयुक्त शीर्षक नहीं हो सकता था। संग्रह वस्तुतः हिन्दी की आधुनिक कविता का दिगन्त है और अब यह कविता आगे बढ़ेगी, तो इसी बिन्दु से जिसमें सामाजिक चेतना और प्रयोग-निपुणता एक दूसरी के लिए साधक सिद्ध हुई हैं। त्रिलोचन ने स्वयं कहा है-

लड़ता हुआ समाज, नई आभा अभिलाषा,

नये चित्र के साथ नई देता हूँ भाषा,

 

त्रिलोचन की सामाजिक सहानुभूति स्पष्ट है, किन्तु कवि के रूप में वह जिस माध्यम से उसे ग्रहण करता है, उसके समानधर्मा दूसरे कवि नहीं करते । त्रिलोचन की कविताओं का विषय जो कुछ हो, वह कविता के माध्यम से ही व्यक्त हुआ है, जब उनके से विचार रखने वाले दूसरे कवि बहुधा अभिव्यंजना के माध्यम की उपेक्षा कर अपने विचारों को पद्यबद्ध-मात्र कर लेने पर संतुष्ट हो जाते हैं, अतिशय तीव्र सामाजिकता वाले इस कवि का दावा है-

भाषाओं के अगम समुद्रों का अवगाहन

मैंने किया, मुझे मानव की माया

सदा मुग्ध करती है, अहोराज आवाहन-

सुन-सुनकर छाया धूपा मन में भर लला

ध्यान एक-से-एक अनोखे ! सब कुछ पाया

शब्दों में; देखा सब कुछ ध्वनि रूप हो गया।

 

यह स्फोटवाद का नव्य पूनर्वक्तव्य है। त्रिलोचन  प्रच्छन्न छायावादी नहीं है, जैसे अनेक तथाकथित प्रयोगशील दिखे हैं। छन्द तोड़ देने से ही कोई छायावादी के बदले बुद्धिवादी या प्रगतिवादी या प्रयोगवादी नहीं बन जाता । छायावाद का इन्द्रजाल हँस कर पहले अपने, फिर दूसरें पर भी हँसकर तोड़ा जा सकता है। छायावादियों के बीच इस तरह केवल निराला हँसा किये हैं और इसलिए वे ज़्यादा ऐतिहासिक दृष्टि से छायावादी रहे भी हैं। त्रिलोचन का अपने पर करता व्यंग्य यह है, जो अपने पर होने के कारण दर्शन के स्तर का स्पर्श करता है-

इधर त्रिलोचन सॉनेट के ही पथ पर दौड़ा

सॉनेट सॉनेट सॉनेट सॉनेट क्या कर डाला

यह उसने भी अजब तपाया। मन की माला

गले डाल ली।......

 

दिगन्त का यह भी उल्लेखनीय विरोधभास है कि उसमें चतुर्दशपदी या सॉनेट का कठोर अनुशासन कवि ने अपने पर रखा है।

 

(कृति-दिगन्त-लेखक- त्रिलोचन शास्त्री/प्रकाशक-जगत शंखधर, वाराणसी/मूल्य- उल्लेख नहीं मिला)

 पत्रिका-साहित्य-वर्ष-8 अंक-1 चैत्र, विक्रमाद- 2014/शकाद 1874 अप्रैल 1957पटना से प्रकाशित से साभार,

सम्पादक-शिवपूजन सहाय : नलिन विलोचन शर्मा

सहाकरी-श्री रंजन सूरिदेव

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