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सृजनगाथा

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वर्ष-2, अंक-20, जनवरी, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। त्रिलोचन अंक।।

 

 

धरती : एक समीक्षा


गजानन माधव मुक्तिबोध

 

मुझे कहने दीजिए कि धरती (त्रिलोचन का काव्य-संग्रह) के गीतों का क्षेत्र बहुत अधिक व्यापक है, जिनसे मात्र काव्य-सामर्थ्य ही नहीं प्रकट होता, वरन् जीवन के विस्तृत दायरे के विभिन्न भागों का काव्यत्मक आकलन करने की क्षमता भी प्रकट होती है। यही कारण है कि जब कवि ने, एक ओर, अनेक सफल प्रयोग किये हैं, तो दूसरी ओर, उसने परम्परागत छन्दों और शैली का सहारा लेकर उस शैली को अपनी निजी मौलिकता भी प्रदान की है। और, इस द्विविध सफलता के लिए कवि बधाई का पात्र है।

 

कवि की अपनी अनुभूतियाँ बहुत संयम के साथ प्रकट होती हैं। उसमें चीख-पुकार या अट्टहास का आलोड़न नहीं है। न वह चीज़ है जिसे आप अतृप्त वासना कह सकते हैं। इन सब दोषों से मुक्त, विचारों और भावनाओं से आलोकित काव्य मिलना कठिन होता है। साथ ही कवि की प्रगतिशीलता अट्टहासपूर्ण से मँज-घिसकर तैयार हुई है। इसीलिए कवि कह उठा :

मुझमें जीवन की लय जागी

मैं धरती का हूँ अनुरागी,

जड़ीभूत करती थी मुझको

वह सम्पूर्ण निराशा त्यागी

 

सारी कविताओं में कवि का गहरा आत्मविश्वास और सामाजिक लक्ष्य के प्रति ईमानदारी प्रकट होती है। यह मात्र ईमानदारी ही नहीं, प्रत्युत् उसका जीवन-दर्शन है। उससे जहाँ थोड़ा-सा भी स्खलन होता है, उस अपने प्रति क्षोभ होता है और वह कहता है :

पथ पर धुल उड़ा करती है,

वह भी आखिर कुछ करती है़

पर मैं मेरे जीवन जीवन है

और नहीं तो तत्त्व मुक्त है

वे विराट में प्रभा-युक्त है

मेरे पाँचों तत्त्व लजाओ मैं मरता हूँ

क्या मेरा जीवन जीवन है

 

कवि में नैतिक सचाई बहुत प्रबल होने के कारण ही वह सामाजिक लक्ष्य के प्रति उन्मुख है। बहुत काफ़ी लोगों का ख़याल है कि नैतिक सचाई से अनु-प्रेरित कविता में काव्य कम होता है और कोरा उपदेश अधिक। परन्तु इस विचार में कोई सार नहीं है। कवि ने डायडैक्टिक काव्य के कई अपने उदाहरण रखे हैं, जो शुद्ध वाक्य की दृष्टि से उत्कृष्ट चीज़ें हैं। इसी नैतिक भावना के कारण ही कारण ही कवि अधिक मानवीय हो गया है्। यह मानवीय गुण ही उसके समाजवादी ध्येय और तद्गत काव्य के उद्गम का मूल कारण है।

 

संघर्षकालीन कवि का व्यक्तित्व साधारण रूप से एकांगी नहीं रह पाता । जीवन को कठोर वास्तविकताएँ बरबस उसे अपनी ओर खींचती हैं । संघर्ष के कार चेतना विकसित होती है, जिसकी सहायता से वह विपरीत वास्तविकताओं से जूझ विजय प्राप्त करने का प्रयत्न करता है।

 

ये वास्तुविकताएँ और उसके प्रति मानसिक प्रतिक्रियाएँ अब तक काव्य का विषय बन न सकी थीं। परन्तु जब वे कवि के जीवन की अवशयम्भआवनाएं बन बैठीं, तो वे काव्य का विषय क्यों न बनतीं ? यहीं प्रायोगिक काव्य का मूल उद्गम और प्रेरणा है। कवि का प्रायोगिक काव्य सफल हो या असफल, वह कवि की प्रसरणशील और विकासशील चेतना का चिह्न तो है ही।

 

आइए, हम कवि के मनोलोक में घुसकर उसके काव्य के विविध बहलुओं का आकलन करने की चेष्ट करें।

 

धरती पढ़ जाने पर मालूम होता है कि उसके संघर्ष-भाग को निकाल देने पर जो भी काव्य बचता है वह लँगड़ा है, यानी अगर मस्तिष्क और हृदय को नहीं काट दिया गया है तो चरम और भुजाओं को तो अवश्य उच्छिन्न कर डाला गया है। इसीलिए सबस पहले मैं उस संघर्ष को ही लूँगा। इस संघर्ष की वास्तविकता उसके मन में इतनी गहरी गयी है कि न वह प्रलयवादी रोमैंटिक स्वप्नों में डूबता है, और न किसी समझौते की भावना से परिचालित हो आदर्शवादी तलैया को अपना समुद्र समझता है । वह संघर्ष इतना यथार्थ है कि उसमें सफलता के लिए धीर-गम्भीर व्यक्तित्व की आवश्यकता है, जिसकी परिकल्पना की कसौटी पर वह अपने व्यक्ति को कसना चाहता है, और अपने मन को उसके बारे में उपदेश दिया करता है, समझाता रहता है। इस समझाने को उसके अनेक मूड्स हैं। पर एक बात निर्विकार रूप से अपनी रहती है। वह है उसकी नैतिकता-मूलक धारा (डायडैक्टिक स्ट्रेन), जो उसकी सब संघर्ष-सम्बन्धी कविताओं में प्रधान है। इसीलिए वह कहता है :

जिनका क़दम क़दम जीवन की जय-यात्रा का प्रिय प्रतीक है

      मैं सगर्व सोल्लास निरन्तर उन लोगों का गुण गाता हूँ।

 

अथवा-

स्नेह-नम्र यह तरु की छाया

तुमने जिसके नीचे बस कर

रात बिताई स्वप्न स़जाया

स्वप्नों को चरितार्थ करो अब।

 

अथवा-

जिस समाज में तुम रहते हो/ यदि तुम उसकी एक शक्ति हो/उसकी ललकारों में से ललकार एक हो/उसकी अमित भुजाओं में दो भुजा तुम्हारी/चरणों में दो चरम तुम्हारे/आँखों में दो आँख तुम्हारी/तो निश्चय समाज-जीवन से तुम प्रतीक हो।

 

अथवा-

सूनापन हो/या निर्जन हो/पथ पुकारता है/गत स्वन हो/पथिक,/चरमःध्वनि से/दो उत्तर/पथ पर/चलते रहो निरन्तर

 

इसी से सम्बद्ध वे कविताएँ भी हैं जो उसने मजदूर-किसानों पर लिखी हैं। वे उद्घोषक कविताएँ हैं और डायडैक्टिक श्रेणी में ही आती हैं। यहाँ वह कह देना उचित होगा कि इतनी वास्तविक खरी डायडैक्टिक भावना अपने असली रूप में अन्य कवियों में बहुत ही कम मिलेगी। किसानों पर जब वह लिखने लगता है तो वह नीति-प्रधान भाव-स्थिति से उठकर गीति-प्रधान भाव-स्थिति में पहुँच जाता है। जैसे-

उस किसान ओ, उठ किसान ओ,

बादल घिर आये हैं

तेरे हरे-भरे सावन के

साथी ये आये हैं।

यह सन्देशा लेकर आया

सरस मधुर शीतल पुरवाई

तेरे लिए, अकेले तेरे

लिए, कहाँ से चलकर आयी

फिर वे परदेशी पाहुन, सुन,

तेरे घर आये हैं।

 

जिस भाव से कवि कहता है-

भीतर से जितनी साँसें बाहर आती हैं

वे अपने शक्तिपूर्ण अस्तित्व को ही

उद्घोषित करती हैं

 

उसी भाव से सम्बन्धित यह भी है-

तन-गिरि में निर्झर-मन

स्वर से संगीत से

सहाय पा गया

अब मैं

राह  पा गया

अब मैं।

 

इसीलिए-

छाती पर चढ़ा हुआ अन्धकार का पहाड़ उतर गया

और यह प्रभाव हुआ

कंचन बरसाता हुआ सुन्दर प्रभात हुआ।

 

जीवन के इस पराजयहीन अनुरागपूर्ण, आसक्तिपूर्ण, तेजोपूरित भाग के प्रतीक-प्रभाव का कवि में मन से अंगागी सम्बन्ध है, और प्रकृति के उल्लास-चित्रों के प्रति प्राकृतिक मोह । यथा-

लहर-लहर परिचय-पराग-पूर्ण

दृश्य-दृश्य अनुरंजित ज्योति-पूर्ण

खिला यह दिन का कमल

सुन्दर सहस्त्र दल

अन्धकार-कारा से दृग छूटे

दृश्य-देश विचरण को खुल टूटे।

 

और

धूप में जगरूप सुन्दर

सहज सुन्दर।

 

अथवा-

रूप में स्वर में

सूवर्ण तरंग आयी

प्राप्त गति में प्रीति

जीवन में मधुर आसक्ति आयी

ढल गया दिन धूप शीतल हो गयी।

 

और रात-

चाँदनी चर्चित

परम प्रार्थित

समर्पित

स्नेह-सी यह रात

स्तब्ध नीरव रात।

 

संघर्ष के उपदेशशील कवि से विपरीत, अत्यन्त गीतात्मक काव्य के रचयिता के रूप में यहाँ लेखक आता है।

 

प्रकृति उसके मन में एक बाह्म वास्तविकता के रूप में है, मन की इमेज के रूप में नहीं। वह उस वास्तविकता के चित्रात्मक रूप पर मुग्ध है, परन्तु उसका अन्तर्मुख चित्रात्मक अंकन नहीं करता । उसे देखकर अपने मन में उमड़े भावों को प्रधानता देता है। इसके बहुत जगह अपवाद भी हैं । परन्तु प्रधान रूप से यही बात विद्यमान है। उदाहरणतः-

बढ़ रहीं क्षण-क्षण शिखाएँ

दमकते से अब पेड़-पल्लव

उठ पड़ा देखो विहग-रव

गये सोते जाग

वादलों में लग गयी है आग दिन की।

 

अथवा-

पेड़ों के पल्लव से ऊपर

उठता धीरे-धीरे ऊपर

अन्धकार-चन्द्रिका-स्नात

तरुओं पर जैसे पारा

रेखा-प्राय धूम्र घर-घर से

नील-नील नभ चला नगर से

लहराता तरु ऊपर छाता।

उसके ऊपर तारा।

 

और-

बीस कदम पर उन पेड़ों को खड़े निहारा

जो प्रकाश में

सहज समीरण की किरणों से खेल रहे थे

देखो, उनकी श्यामल हरियाली में

हलके धुएँ की तरह

कुहरा

किरणों से परास्त हो

छिपकर रहने का उद्योग अथक करता था

ऐसी लगता था कि

सुविस्तृत आसमान का

नीला-नीला रंग छूटकर

पेड़ों के पत्तों-पत्तों में

गिरते-गिरते उलझ गया है।

 

परन्तु प्रकृति कवि के मूड्स की आधार-भूमि भी है-

आज की चली गयी

आयी और चली गयी

शाम आयी, चली गयी

चारों ओर चिन्ताएँ

चित्र अगणित

सारे रंग खो गये

अँधेरा एक रहा शेष

....   .....

अगर मन खुला होता

नयन खोजते राह

....   .....

बढ़ते अँधेरे में

एकान्त आज डूब गया

दिन की तरंग औ

उमंग सब खो गयी

आज की शाम आयी

आयी और चली गयी।

 

अथवा-

वह निशा चली गयी

जो अब तक

रंग-रंग के सपने देती रही

उड़ो बिहग

जिन किरणों ने

कोमल स्पर्श से

तुमको अपना प्रिय परिचय दिया

उनको अब अपना लो

उड़ो विहग-

..............

दिवा,

यह तुम्हारी

सहधर्मिर्णी है

लक्ष्मी है।

स्वागत कर उसका सम्मान करो

उड़ो विहग-

 

जिस भव्य भावना का कवि ने अन्तिम पंक्तियों में परिचय कराया है वह अन्यत्र दुर्लभ है, इसमें सन्देह नहीं। वह कवि के अपने व्यक्तित्व से निःसृत है।

(क्रमशः आगे पढें)

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