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‘कविता
वही है जो बार-बार पढ़ी जाने को प्रेरित करे।’
कवि त्रिलोचन की यह उक्ति मात्र दंभ नहीं है वह यथार्थ है जिसे हमने आपने सभी ने
बड़ी शिद्दत के साथ महसूस किया है। इन अर्थों में त्रिलोचन जी एक सफल कवि हैं। उनके
प्रकाशित संकलनों में राजकमल प्रकाशन दिल्ली द्वारा प्रकाशित 1987 का संकलन
‘सबका
अपना आकाश’
कुछ इसी तरह की सफलताओं का एक और प्रमाण है।
त्रिलोचन भाषा के क्षेत्र में बहुभाषाविद् है। जर्मन,
अँग्रेज़ी, हिंदी, संस्कृत बँगला, गुजराती, उर्दू, फारसी आदि
भाषाओं का ज्ञान उन्होंने विश्वविद्यालयों की डिग्रियों से
नहीं हासिल किया है, वरन उन्हें जानने की प्रबल इच्छा ने ही
त्रिलोचन को इन भाषाओं को पढ़ने और सीखने की ओर अग्रसर किया
है, ‘भाषा
पर अधिकार करना हो, उसे समझना हो तो पैदल घूमिये ऐसे लोगों में
घूमिये जो जन सामान्य कहलाते हैं। शब्दों की सही जानकारी
उन्हीं से मिलती है।’
त्रिलोचन अक्सर बातचीत के दौरान यह बात कहा करते हैं। उनके इस
संकलन को पढ़ते हुए भाषा पर उनकी पकड़ और उसके सार्थक प्रयोग
से इस बात की सत्यता सिद्ध होती है।
इस संकलन में त्रिलोचन की कुल 52 कविताएँ हैं। जिनमें सॉनेट एक
भी नहीं हैं। हाँ, शिल्प की विविधता अपने सारे प्रयोगों के बाद
भी कविता के गेय तत्व को छूटने नहीं देती। उनकी एक कविता है-
‘मैं
तुम्हारा’
। इस पूरी कविता में चार से लेकर छः वर्षों का प्रयोग कर
पंक्ति बनाई गई है। कहीं भी क्रम टूटने या भाव धारा में
व्यवधान आने का बोध नहीं होता और कविता अपनी समग्रता के साथ एक
दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ती है। कविता इस प्रकार है-मैं तुम्हारा
/बन
गया तो /
फिर न हारा/
आँख तक कर /फिरी
थक कर /
डाल का फल /गिरा
पक कर /
वर्ण दृग को /
स्पर्श कर को /
स्वाद मुख को /
हुआ प्यारा /
फूल फूला /
मैं न भूला /
गंध वर्णों /
का बगूला /
उठा करता/
गिरा करता /
फिरा करता /
नित्य न्यारा
।
पूरी कविता में समर्पण की आस्था उससे हुए परिवर्तन की जीवंत
प्रस्तुति देखी जा सकती है। पंक्ति अपने अति सीमित वर्णों के
प्रयोग के उपरांत भी पूरा-पूरा अर्थ देती है। कविता एक साथ लय
में पढ़ी ही नहीं समझी भी जा सकती है। इतने सहज ढंग से और
साधारण से दिखने वाले रोजमर्रा के शब्दों को प्रयोग से ऐसी
कविता रच लेना त्रिलोचन
के ही बस की बात है। उनके पूरे संकलन में तीन कविताएँ ऐसी हैं
जो लीक से हह कर लिखी गई हैं। जब वे चीन की लाल क्रांति पर-‘बढ़
रहे हैं दल उमड़ते हाथ में झंडे उठाए
/
वे क़दम इनसान कंधे से चल कंधा मिलाए
/
रक्त आँसू की नदी में और कब तक वह नहाए
/
पैर गिरते शत्र उर पर बज्र की है थाप
/
मुसकराता है उदय ।’
तब उनकी कविता उनके सामान्य विषयों से अलग होती है। जब वे जीत
नई उकसाओ पैर पढा़ओ /
देश-देश की जनता आगे आई
/
देश-देश की ध्वजा साथ फहराई
/
देश-देश की गीत धार लहराई
/
अपनी ध्वजा उठाओ गान गुँजाओ
+ + +।
कहीं एक भी दुःख न रहने पाए अपना सत्य नागरिक कहने पाए
/
द्वन्द्व रहित धारा में बहने पाए
/
इतना कर दिखलाओ स्वर्ग सज़ाओ
/
माध्यम से सर्वे सुखिनः भवतु सर्वेः सन्तु निरामया की बात करते
हैं तो लगता है त्रिलोचन
संत हो गए हैं। संत अर्थात् सत् और और असत् को जानने वाला।
संत अर्थात् सत् का पक्षधर । यहाँ कवि अपने उन तेवरों से कुछ
अलग दिखता है जिनमें वह पिछली कविताएँ लिखता रहा है । उनकी
तीसरी कविता दीपावली पर्व पर है। इस तरह की कविताएँ उन्होंने
कम लिखी हैं। उनके इस संकलन में शुद्ध प्राकृतिक चित्र भी देखे
जा सकते हैं। बादलों ने उनके मन में भी धूम मचाई है परंतु उनकी
अभिव्यक्ति अन्य कवियों से भिन्न और यथार्थ के अधिक नज़दीक
हैं। बादल घिर आए ताप गया पुरवा लहराई
/
दल-के-दल घन लेकर आई /
जगी वनस्पतियाँ मुरझाई
/
जलधर तिर आए।
छायावादी कवियों के संपर्क में त्रिलोचन
रहे हैं। निराला ने उन्हें बहुत प्रभावित किया है। शब्दों के
सार्थक प्रयोगों को उन्होंने उनसे ही सीखा है।
इसके बाद भी उनके प्रकृति चित्रण में छायावादी माँसलता कम है ।
जब वे गाओ-गाओ गान /
क्षितिज कोर पर आई-आई
/
उषा नई छवि से मुसकाई
/
विहग सुनाने लगे जाग कर
/
अपने-अपने गान /
नीरव यह प्रकाश चलता है
/
छाया में विकास पलता है/
प्राण-प्राण में रूप-रूप में
/
व्यापे छवि के गान। लिखते हैं तो किसी परंपरा का निर्वाह नहीं
करते अलग पहचान बनाते हैं।
अन्य कवियों की तरह त्रिलोचन
ने नियति की मार सही है। नीरव मार की पीड़ा ने उन्हें विचलित
भी किया है पर ‘कब
कटी है आँसुओं से राह जीवन
/
लोटता है धूल में मन यदि कहीं हारा
/
तन झुके चाहे न कुछ भी
/
है यही धारा। इसी तम से उबरने के लिए निराशा को झटक कर सो गया
था दीप मैंने फिर जगाया है
/
पथ कहाँ था सामने तम था। पथ चलें किस और दिग्भ्रम था/
भय प्रबल था /
चाह थी गीत की उसे पथ पर लगाया है।’
कह कर वे फिर से जीवन संग्राम में उतर पड़ते हैं।
जीवन में गति है परिवर्तन है। वह जिस गति से बढ़ रहा है उसमें
विगत को पकड़ना संभव नहीं क्यों
‘जीवन
के दस बीच बरस क्या /आते
और चले जाते हैं /
घड़ियों, दिनों, महीनों के क्रम
/
गत संवत् में खो जाते हैं।’
भाव और विचार की दृष्टि से त्रिलोचन का अपना चुनाव है अपनी
प्रस्तुति है। शब्दों के देशज प्रयोग उनकी कविता में जहाँ-तहाँ
हुए हैं। विशेष रूप से कविता में आए अवधी के शब्द सुकना,
बिराने धुरियाई देह, खेह, दियना, कढ़ा दो, बाहा इसी तरह के
शब्द हैं। संस्कृत के अप्रचलित शब्दों का प्रयोग भी उनकी कविता
में देखा जा सकता है। जननांतर, चंडाशु, पर्युत्सुक शब्दों का
प्रयोग इसी तरह का है। निराला ने अमा का प्रयोग निराशा में
डूबी अँधेरी रात के लिए किया है। त्रिलोचन भी इस शब्द का
इन्हीं अर्थों में प्रयोग करते हैं। वे शेखर शब्द का प्रयोग
शिखर के लिए है। इसी तरह शरद की राका उनके प्रयोग में शारदा हो
गई है। लीक से हट कर प्रयुक्त होने के बावजूद ये शब्द खटकते
नहीं हैं।
अपनी सूझ से नये शब्द गढ़ने में भी त्रिलोचन पीछे नहीं रहे
हैं। अपने कविता, ‘मुझे
बुलाता है पहाड़’
में वे लिखते हैं ‘मुझे
बुलाता है पहाड़ मैं तो जाऊँगा
/
निर्मल जल के वे झरने कल
/
बैठे जहाँ अविपालों के दल
/
देते काट दुपहरी के पल
/
वहीं उन्हीं के सुख-दुख में धुल मिल जाऊँगा।’
शब्द अविपाल के संबंध में जब त्रिलोचन जी से चर्चा की तो बोले
‘लेटिन
में भेड़ के लिए EWE(इवि)
लिखा जाता है । मैंने वहीं से अवि लेकर पाल जोड़ा है अर्थात्
भेड़ों को पालने वाला।’
गड़रिये के लिए इस तरह शब्द गढ़ लेना त्रिलोचन जी के शब्द
सामर्थ्य का ज्ञान कराता है। उनका बहुभाषाविद् होना यहीं
सार्थक हुआ है।
अपने इस संकलन में त्रिलोचन ने प्रेम की कविताएँ भी लिखी हैं।
त्रिलोचन के जीवन में पत्नी के अलावा कोई रहा है
?
ऐसे प्रमाण तो नहीं मिलते, इसलिए ये कविताएँ पत्नी को ही
संबोधित की गई होनी चाहिए। यह संभावना इस बात से और दृढ़ होती
है कि उन्होंने अपनी कविता
‘न
जाने हुई बात क्या’
में लिखा है ‘मुझे
अब बहुत पूछने तुम लगी हो
/
उधर नींद थी इन दिनों तुम जगी हो
/
यही बात होगी /
अगर कुछ न हो तो कहूँ और क्या
/
परिचय पुराना हुआ अब नया है। दाम्पत्य में लगातार के संपर्कों
से एक स्थिरता, पुरानापन बल्कि ठंडापन संबंधों में आ जाता है।
ऐसे में कोई घटना अनायास सोये स्नेह तंतुओं को फिर से जगा देती
है और नयापन आ जाता है। वही कुछ इस कविता में दिखाई देता है।
कुल मिलाकर यह संकलन त्रिलोचन
जैसे स्थापित कवि की काव्य श्रृखला में एक और कड़ी जोड़ता है।
हिंदी कविता के क्षेत्र में आज की कविता जिस तरह से अबूझ और
अगेय हो गई है छंदों के बंधनों को तोड़ने के साथ गद्य की और
उन्मुख हुई है वहीं त्रिलोचन
की कविता में आज भी ताज़गी है, छंद है, अलंकार है, सार्थक
बिम्ब है और कविता की गेयता है। उन्हें पढ़ कर बार-बार पढ़ने
का मन करता है। यही उनकी कविता की सार्थकता है। उनके इस संकलन
की अभू्तपूर्व सफलता है।
(कृति- सबका
अपना आकाश/त्रिलोचन/)
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