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वर्ष-2, अंक-20, जनवरी, 2008

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।। त्रिलोचन अंक।।

 

 

शब्दों का अन्तर्निहित प्रकाश


अरुण कमल

 

रधान(यात्री प्रकाशन दिल्ली,1983) त्रिलोचन जी का सबसे नया संग्रह है। लेकिन इसमें संगृहीत कविताएँ नई भी हैं और और पुरानी भी-सन् 57 से लेकर अब तक की । इस कारण अरधान पर लिखने के लिए त्रिलोचन के पूरे काव्य-क्रम को ध्यान में रखना ज़रूरी है। यह संग्रह सिर्फ़ काल-सीमा के हिसाब से ही नहीं, बल्कि कविताओं के स्वभाव के ख़्याल से भी उनके पूरे काव्य-व्यक्तित्व का नमूना है।दिगंत के पहले सॉनेट में आगरे के किले के नग का जिक्र है, जो पूरे ताजमहल को दिखलाता है। कुछ-कुछ वैसे हो नग की तरह यह संग्रह  ‘अरधानभी है, जिसमें त्रिलोचन  की वाटिका के सभी फूलों का थोड़ा-थोड़ा हिस्सा है। यह नाम भी बहुत व्यंजक है - गहरी, सान्द्र गन्ध, फूलों का सुगंधित कोलाहल’ !

 

त्रिलोचन मूलतः जीवन की स्थिर, शांत स्थितियों के कवि हैं। बहुत तीव्र गति के बीच भी जो धुरी के पास की स्थिरता होती है, वे स्वभाव से उसी स्थिरता के कवि हैं। अनेक विकट स्तिथियाँ हैं, भावों और विचारों के परस्पर घात-प्रतिघात हैं, लेकिन सब कुछ बहुत स्थिर चित्र से, निपुण संयम से उनकी कविताओं में अंकित है- प्रखर वेग के पार अडिग जीवन ने पाई / सोची हुई सिद्धि जीवन की (उस जनपद काकवि हूँ, पृ. 37) यहाँ जीवन की सोची हुई सिद्धि है, प्रखर वेग के पार, जो मन को और शब्दों को साध कर प्राप्त की गयी है। शायद यही स्थिरता, यहीत्वराहीनता कुछ लोगों को अकाव्यात्मक लगती है, क्योंकि त्रिलोचन स्थितियों और भावों के संयोजन से लेकर शब्दों के चुनाव तक इसी स्थिरता के साथ काम करते जाते हैं। उन्हें शब्द सिद्ध हैं। कहीं कोई तात्कालिक व्यग्रता नहीं  है, कहीं कुछ भी आकस्मिक नहीं है। जो है, वह पूरा सोचा-विचारा । सम्भवतः इसी कारण उनका सबसे प्रिय काव्य-रूप सॉनेट रहा, जहाँ एक नियत घेरा तो है ही, विराम का भी यथेष्ट अवसर है और जटिलतम् स्थितियों स्त्रवित (dirtilled) कर एकत्र कर देने का सुयोग भी। उस जनपद का कवि हूँ के सॉनेट खासतौर से त्रिलोचन  की संतृप्त काव्य-व्यवस्था के उदाहरण हैं। उसमें कहीं भी सहसा प्रकट हुआ आवेग या उच्छृंखल भाव-समूह नहीं है ! एक औरत संतान माँग रही है और इस स्थिति की पूरी जटिलता को धीरे-धीरे खोलते हुए त्रिलोचन  एक़दम अन्त में कहते हैं-जड़ जीव पिन्हा दे एक वाक्यांश में दो स्थितियों और उनके पारस्परिक संबंध को व्यक्त करते हुए जो शब्द वह खासतौर से चुनते हैं वह हैपिन्हा। फिर वे जड़ और जीव के जो अनेक संस्मरण हैं मन में, उन्हें जाग्रत करते हुएजीवन्त अभिमान की प्रतिष्ठा करते हैं, जो पूरी कविता का विषय है। अपनी गरीबी, दरिद्रता और उपेक्षा की चर्चा जिस विस्तार से त्रिलोचन करते हैं (पृ.11,12,13 आदि) वह इसी स्वभावगत स्थिरता और संयम से संभव हुआ, नहीं तो स्वाभिमान और मानव-गरिमा के स्थान पर आत्म-दया ही पैदा होती । सम्भवतः आधुनिक हिंदी कविता में अपनी दरिद्रता का हिला देने लावा, फिर भी नियन्त्रित और कहीं भी गरिमाच्युत नहीं, वर्णनउस जनपद का कवि हूँ में ही मिलता है। यही त्रिलोचन की पूरी कविता का मिजाज है-स्थिरता और स्थिरचित्तता।

 

लेकिन ऐसे भी क्षण त्रिलोचन  में मिलते हैं, जब राग प्रबल हो जाता है और एक तरह की तरलता उत्पन्न होती है। ऐसा प्रायः सॉनेटों के अतिरिक्त जो काव्यरूप हैं उन्हीं में होता है। ऐसी कविताएँ हैं जो उन पाठकों को भी सहज ही तुष्ट कर सकेंगी, जिन्हें त्रिलोचन शुष्क लगते हैं। लेकिन इन कविताओँ की तरलता भी वैसी नहीं, जैसी उत्तरछायावादी गीतकारों या धर्मवीर भारती-सरीखे नये कवियों की टुटपूँजी है। बरसात के गुड़ की पसीज यहाँ नहीं है। यहाँ तोशरत का प्रसन्न ताल है, जिसमें लहरें भी नहीं भीतर मछलियाँ कुछ करते हैं.....।अरधान की इन कविताओँ में सघन ऐन्द्रिकता है और एक गीति-तत्त्व भी, जो स्वयं त्रिलोचन में भी कम मिलता है। त्रिलोचन के इस संग्रह में यदि एक ओर प्रकृति तथा मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन के अंतरंग चित्र हैं, तो दूसरी और गहन सामाजिकता वाले महाकुम्भ-सम्बन्धी सॉनेट। बाह्म तथा आन्तरिक का यह सन्तुलन और अन्योन्याश्रय संबंध उनके कवि-व्यक्तित्व का मूल चरित्र है।

 

अरधान की शुरू में दी गई कविताएँ अधिकांशतः प्रकृति के विभिन्न रूपों और अवस्थाओं का चित्रण करती हैं। कई बार तो स्थितियाँ बिल्कुल पारम्परिक सी लगती है, जैसे  ‘उपहार कविता में कत्थई महुआ का चित्र। लेकिन एक स्पर्श इसे बिल्कुल नया बना देता है। त्रिलोचन लिखते हैं-डालियों के बढ़े हुए कूचों में । यहाँ  ‘डाली और  ‘कूचा का संयोग पूरी कविता को नया बना देता है।वातावरण कविता में शाम का चित्रण है। यहाँ भी कुछ पारम्परिक उत्पादन हैं, साँझ गुलाबी, हवा की  ‘छेड़छाड़ आदि। लेकिन कई नये और ताजे वर्णन हैं और

धूमाच्छादित हैं वृक्ष वे,

टहनी टहनी डाली डाली थाम के

धुआँ और ऊपर चढ़ता है

यह शाम का बिल्कुल नया रूप है। बहुत ही सूक्ष्म निरीक्षण।धूमाच्छादित जैसा शब्द पारम्परिक है, लेकिन जो निरीक्षण है टहनी-टहनी, डाली-डाली थाम के धुआँ के ऊपर चढ़ने का, वह त्रिलोचन का बिल्कुल अपना है।आँधी भी ऐसी ही कविता है, जहाँ उनकी शब्दावली कमोबेश पारम्परिक है, लेकिन उसमें कुछ बहुत ही जीवन्त चित्र हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस कविता के सर्वाधित सशक्त अंश वे हैं, जहाँ त्रिलोचन बिल्कुल पास के और अपेक्षाकृत स्थिरता के बिम्ब देते हैं-

 डरे चौपाए भी चकित नयनों से निरखते

.......थानों से लगकर कँपे

यहाँ आँधी की विभीषिका का बहुत ही मार्मिक अंकन उन्होंने एक पंक्ति में किया हैं-डरे चौपाए भी चकित नयनों से निरखते । उस भयंकर गतिशीलता को भी उन्होंने अपेक्षाकृत स्थिर और इसीलिए सर्वाधिक मार्मिक बिम्ब से व्यक्त किया है। ठीक इसके बाद जो पद हैं, उनमें वह आँधी की बेगशीलता चित्रित करते हैं-

उखाड़ा पेड़ों को पटककर आगे बढ़ चली

कुटीर को थामे अलख कर से दूर पटका...

जलों को भी छेड़ा मथकर उन्हें और तट से

उछाला....

लेकिन यहाँ कविता शिथिल होती है। डरे चौपाए भी चकित नयनों से निरखते जिस शक्ति और वेग से आँधी को मूर्त्त करते हैं, वैसा इन पदों में बहुत कम हो पाया है। यह केवल त्रिलोचन के स्वभाव को व्यक्त करता है। त्रिलोचन मूलतः स्थिरता के कवि हैं।

 

एक और कवितागाय करती है घमौनी इस लिहाज से देखने योग्य है। यह दोपहर के ठीक बाद का चित्र है। ग्रीष्म में यह समय गाँवों में सबसे ज़्यादा उदासी, आलस्य और स्थिरता का होता है। पूरे वातावरण के इस स्वभाव को त्रिलोचन ने सिर्फ़ तीन पंक्तियों मे व्यक्त किया है-

आँख मूँदे,पेट पर सिर टेक

गाय करती है घमौनी बँधी जड़ से

पेड़ की छाया खड़ी दीवार पर है

 

यहाँ पूरा चित्र खड़ा होता है और एक साथ गाँव के पूरे वातावरण को व्यक्त किया गया है। अक्सर लोग गाँवों को किसी पेड़ की उभरी हुई जड़ से बाँध देते हैं। पेड़ की छाया दीवार पर खड़ी है, जिससे दुपहर के बाद का बोध होता है।आँख मूँदे, पेट पर सिर टेक पूरी शिथिलता और इस शिथिलता के सौन्दर्य को व्यक्त करता है। यह बहुत ही तरल स्वाभाविक चित्र है, बहुत कुछ बेन्द्रे के चित्रों की तरह। त्रिलोचन की सघन ऐन्द्रिकता का यह उत्तम सबूत है। इसमें यह भी पता चलता है कि स्थिरता के क्षणों के चित्रण में त्रिलोचन का जवाब नहीं ।

 

इस संग्रह की कुछ कविताओं में आदि पारम्परिक शब्दावली है, तो इसमें कुछ ऐसी भी कविताएँ हैं, जिनमें त्रिलोचन ठेठ आंचलिक शब्दों का प्रयोग करते हैं, जनदीय मुहावरों का ठाठ बाँधते हैं।  ‘परदेसी के नाम पत्र सन् 57 की लिखी कविता है। इसमें पत्र लिखने की पुरानी चाल को अपनाया गया है- सोसती सिरी सर्व उपमा जोग बाबू रामदास को...। एक पत्नी अपने परदेसी पति को पत्र लिख रही है। भाषा उसी के अनुकूल है। इस पत्र के संबंध में दिलचस्प बात यह है कि पूरे पत्र में सिर्फ़ तीन समाचार दिये गये हैं। पहला है,अमोला बड़ा हो गया है, ऐसा ही रहा तो फल अच्छे आएँगे दूसरा, बधिया कोराती है, देखो कब ब्याती है। तीसरा,मन्नू बाबा की भैंस ब्याई है, । और अन्त में थोड़ा लिखना समझना बहुत । लोकगीतों की शैली का आश्रय लेकर त्रिलोचन ने अपूर्व काव्य-संयोजन किया है। पूरी कविता आने वाले फलों और गर्भवती या आसन्न-प्रसवा जीवों के समाचार से भरी है। लेकिन समाचार वह नहीं है जो दिया गया, समाचार वह है जो इंगित है, एक घटना घटने वाली है-थोड़ा लिखना समझना बहुत। इस तरह यह कविता लोकगीतों की तरह समपन्न होती है। त्रिलोचन का यही मिजाज है - फल्गू नदी की तरह भीतर-भीतर जल से उद्वेलित।

 

त्रिलोचन का सहज मानव-प्रेमसब्जी वाली बुढ़िया में भी नज़र आता है। एक सब्जी वाली बूढ़ी औरत से उसका सारा बचा-खुचा सामान खरीदकर वे उसे मुक्त करते हैं। एक मार्मिक प्रसंग है यह। जहाँ दूसरों के लिए प्रेम, दूसरों की चिन्ता लगातार नष्ट होती जा रही है, वहाँ ऐसा सहज अनुराग बहुत महत्त्वपूर्ण हो उठता है। त्रिलोचन को चिन्ता है-मनुष्य की बात मनुष्य कानों/कभी सुनेगा कि नहीं सुनेगा। त्रिलोचन उद्विग्न हैं-परस्परावलम्बन क्या न होगा/ममत्व क्या शब्द बना रहेगा। (प्रयोग का अन्त कभी न होगा) इसीलिए उस बुढि़या की बातें जो कानों में पड़ी उनको अनसुना कर नहीं पाया मैं । (सब्जी बेचने वाली बुढिया ) यह सहज मानवता उनका आधार है। उनके सभी संग्रहों में इसी सहज, स्वाभाविक मानवता का अवलम्ब है। लेकिन त्रिलोचन यह नहीं पूछते-कल उस बुढ़िया का क्या होगा ? या सिर्फ़ उसका बोझ आज हल्का कर देने से समस्या का हल न होगा ?

 

अब भारतीय जीवन में भी ऐसा क्षण आ गया है, जब सामूहिक वध के आगे सहज, स्वाभाविक सहानूभूति भी अक्षम सिद्ध हो रही है।  जीवन की स्थिरता समाप्त हो चुकी है। ब्रेख्त की एक कविता है न्यूयार्क के एक चौराहे पर बेघरों के लिए ठण्ड में रात-भर की जगह जुटाने के लिए चन्दा इकट्ठा करने वाले पर । ब्रेख्त उसकी प्रशंसा करते हैं, कहते हैं। कुछ तो होगा, एक रात तो जीवन बचेगा। फिर तुरंत पूछते हैं-लेकिन कल ? सिर्फ़ इतने से क्या होगा ? त्रिलोचन यह नहीं पूछते । लेकिन ऐसा नहीं है कि उन्हें इस सामूहिक संहारक शक्ति का अनुमान नहीं है। महाकुम्भ के सॉनेट भारतीय जीवन की उस संगठित संहारक शक्ति की जबर्दस्त भर्त्सना है, जो धर्म, शासन और सम्पत्ति के मेल से लगातार बढ़ती जा रही है। ये सॉनेट त्रिलोचन के पूरे काव्य-व्यक्तित्व का महत्त्वपूर्ण अंग है। पहली बारमहाकुम्भ की फूटन कालेखा किया गया है। एक तरह से यह महाकुंभ सिर्फ़ प्रयास का ही महाकुम्भ नहीं, बल्कि पूरे भारत में लगातार चल रहे शोषण का महाकुम्भ है। इस दृष्टि में देखने पर इस पच्चीस सॉनेटों के महत्त्व का अंदाज़ा लगता है्। ऐसे समय में जब हिन्दी के अनेकआधुनिक साहित्यकार कुम्भ के साधुओं के सर्पिल धुआँ से आकर्षित हो रहे हैं औरजय जानकी तथा भारतीय संस्कृति के नाम पर विनाश का पक्ष लिया जा रहा है, त्रिलोचन के ये सॉनेट अतिरिक्त महत्त्व प्राप्त कर लेते हैं। यदि धर्म के पक्ष का साहित्य, जीवन के निषेध का साहित्य महत्त्वपूर्ण हो सकता है, तो धर्म-पाखण्ड के विपक्ष और जीवन के जीवन्त अभिमान का साहित्य क्यों नहीं ??

 

महाकुम्भ-सॉनेट जनता के विशाल समुद्द के आगमन से शुरू होते हैं। सतुआ और पिसान बाँधकर कुम्भ नहाने नर-नारी घर-पुर तजकर प्रयाग आये हैं। नारियाँ गंगा मैया के गीत गा रही हैं। देखा कोटि संख्या जनता सामने पड़ी है।(बिल्कुल गद्यवाक्य हैं ये ! ) पर्वत की दुहिता जनता बढ़ी आ रही है चारों तरफ से। त्रिलोचन ने महाकुम्भ में देखा मानव-काननदेखा शीश झुकाया । जनता सहस्त्र शीर्ष पुरुष की तरह अवतरित हुई। उन्होंने जनता के  ‘विराट दर्शन पाये । मैंने विश्वास पा लिया, वह विश्वास विजय के नवगान गा गया। लेकिन जल्दी ही यह उत्सव मरण में बदल जाता है। यह 1953 की बात है, जब महाकुम्भ में हजारों यात्री मरे थे।लाशों पर चढ़कर मानव आता हैलाशों की प्रदर्शनी लग गई।ट्रक में भर-भर आज गंज शव का आया है नाश अचल था । और यह सब धर्म के नाम पर हुआ।धर्म न होता तो वह दुनिया कैसे होता पुण्य/न होता तो प्रवृत्ति क्या ऐसे होती। एक तरफ तो यह मरण है-अनायास सामूहिक बध खिलवाड़ बन गया, दूसरी तरफ राष्ट्रपति की शाही सवारी निकली । नेताओं की दावत चल रही है। खबर मिलने पर कुम्भनगर जाते हैं- जहाँ फूटन थी वहाँ टसाई बातों से करते हैं और पुलिस  ‘नेताओं के पीछे-पीछे व्यस्त भाव से चलती थी । और

लाशों की चर्चा थी, अथवा सन्नाटा था

राज्यपाल ने दावत दी थी, हा हा ही ही

 

और इस दावत में साहित्यकार भी शरीक हैं,  ‘इन्द्र वरुण कुबेर-से अधिकारी छाये हैं। यह  ‘महामरण,’ ‘प्रभुता के मद का विध्वंसक कोप सोल्लास सम्पन्न हुआ ।

 

बहुत ही संक्षेप में त्रिलोचन से जनता के विराट स्वरूप से लेकर शोषण-तन्त्र के सभी पेंचों का उद्घाटन किया है। जनता के प्रति चाहे वह दिशाहारा धर्मभीरू ही क्यों न हो, अनवरत प्रेम और आदर का भाव है; कुम्भकाण्ड पर गहरा दुःख-भय का कम्पन आज वायु में भरा-भरा था, और महामरण के जिम्मेवार लोगों के प्रति घोरन नफ़रत । लाशों की चर्चा थी, अथवा सन्नाटा था राज्यपाल ने दावत दी थी हा हा ही ही स्थिति की पूरी वीभत्सता को सामने रखता है। ख़ुद त्रिलोचन में ऐसे स्थूल कम हैं। त्रिलोचन पूरे संयम से महाभारत के दृश्यों को रखते जाते हैं, कहीं भी अतिरिक्त आवेग या आवेश नहीं । एक बेटा पिता की लाश पर रो रहा है। वे अन्त में कहते हैं : किरणों का उत्ताप जहाँ था मृग़ज़ल भी था। भीड़ का जो वर्णन उन्होंने किया है, वह कविगुरु ही कर सकता है- आदमियों की वह मछेह, वह भीड़ ठसाठस उठती हुई गनगनाहट, आगे का रेला.....। पौराणिक प्रसंगों का बहुत ही कुशल उपयोग त्रिलोचन ने किया है सॉनेट संख्या 19 में । जब राक्षसों ने मुनियों की हड्डी का एक पहाड़ बना लिया, तो राम ने दक्षिण हाथ उठाकर प्रण किया राक्षस-वध का। लेकिनमहाकुम्भ में हत निरीह प्राणों की पीड़ा के लिए कौन प्रण करेगा ? जनता, स्वयं महान जनता – कब स्वतन्त्र होगी यह जनता टूटी हारी

 

सभी महाकुम्भ-सॉनेटों की मुख्य चिन्ता यही है कब स्वतन्त्र होगी यह जनता टूटी हारी त्रिलोचन ने पच्चीस सॉनेटों के ज़रिए ठेठ भारतीय जीवन की एक दशा सामने रखी-बिल्कुल मूर्त्त रूप में कहीं भी यथार्थ के वास्तविक स्वरूप को अन्य साधनों से बदला नहीं गया-जो है, जैसा है, वैसा ही। त्रिलोचन हमारे उन कवियों में हैं, जो यथार्थ को कम-से-कम परिवर्तित कर कविता की रचना करते हैं-स्थितियों को सामने रख