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सृजनगाथा

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-20, जनवरी, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। त्रिलोचन अंक।।

 

 

पन्नों की इबारत


त्रिलोचन

 

1 फरवरी 1951

जगा । नित्यकर्म । डॉ. गणेश का काम । स्नान । आसन । दूध । डॉ. गणेश को उनकी कॉपी और प्रतिलिपि दी । रुपयों के लिए याद दिलाई । उन्होंने आज या कल कहा । कल कॉलिज से चलते समय रामायण ने डॉ. की किताब संशोधन करा देने के लिए कहा था । और मुझसे पारिश्रमिक पूछा, उस समय मैं बात टाल गया । आज डॉ. से कहा तो बोले एक सौ पचास माँगो । मैं तो पचास की सोच रहा था । प्रकट कहा, इतना नहीं 100 रुपये और अग्रिम । तभी काम करूँगा । तुम उनसे कह देना । डॉ. द्विवेदी के यहाँ एक घंटा काम हुआ । बड़ा थकाऊ काम है । सुपारी खाने को दी । मेस में खाकर नामवर के यहाँ । विश्राम । तरकन के भाषण की याद कर कॉलिज गया . तरकन ने पढ़ा । साहनी तथा दो अन्य एम.ए. फ़ाइनल के छात्र, डॉ. द्विवेदी बोले, बड़ा अच्छा प्रोगाम रहा । देसाई, एस.के.सिंह और मेनन ने पढ़ाया । भवन आया । रामअँजोर द्विवेदी आए । ए पैसेज टु इंडिया पढ़ने के लिए ले गए । यह बुरा लगा अब सब किताबें बॉक्स में रखूँगा । न कोई देखेगा न माँगेगा । जो देख चुके हैं उनसे कहानी कहूँगा । थोड़ी देर बच्चे से खेला । तारा को पढ़ाने गया । लेटर बॉक्स में पत्र डाला । छ पर पहुँचा हूँगा । सिटी मजिस्ट्रेट बसंत सेठ बैठे थे । तारा ने परिचय कराया । मि. सेठ, और शास्त्री जी मुझे पढ़ाते हैं; सेठ अँग्रेज़ी में बोलते रहा । मेरी ओर उदासीन । मैं भी अनासक्त बैठा । मेरा भाव उसे सह्य न लगा क्योंकि कई प्रकार से उसने अपने पद, कार्य, परीक्षा आदि की चर्चा की, जो तारा के लिए अनावश्यक और मेरे लिए सूचनीय था । चाय पीने का उसका ढंग देखा, मैंने ही दो कप ली और लोगों ने तो एक कप भी न पूरा किया । तारा से आज पैसों को मासारंभ में देने को कहा । बोली मैं तो स्वयं सावधान हूँ ।

 

2 फरवरी 1951

डॉ. गणेश ने 30 रुपये दिए । 12 रुपये ओझा जी का मैंने लौटाया । तीन रुपये दस आने की दो किताब मिलीं और जैकसन ली । साढ़े तीन रुपये हृदयनारायण मिश्र को दिया ।

 

3 फरवरी 1951

जागरण । नित्यकर्म । स्वाध्याय । दातून । स्नान । आसन । दूध । भोजन । जय की परमार द्वारा डाक्टरी कराई । चोट थी । एक दवा ख़रीदी गई । जय को सामने वाली लड़की ने खाना खिलाया । उसके कमरे में जाकर जय ने खाना खाया । भोजन कर मैं भी जय को लेकर गौदौलिया कपड़े खरीदने गया । कपड़े खरीद कर उसे बस से भेज दिया । जगत के यहां बैठा । चौहान की बातें सुनीं, शेरजंग की । जगत ने राहूल के कलिम्पोंग की एक युवती से, नए विवाह की बात बताई और भी अनेक बातें । जगत ने चाय पिलाई । नमकीन और मीठा भी खाया गया । जगत ने हंस के एक अंश को और का और समझ लिया था । मुझे भी अपने अर्थ पर ही सहमत करन चाहते थे । नौकरूढ़ चलत जग देखा । साढ़े चार घंटे बैठा । प्रतीक लेकर भवन आया । बसंतू से दूध लिया । रख कर पढ़ाने गया । तीन बजे पहुँचने का समय दिया था । साढ़े छ पर पहुँचा । तारा भी कहीं बाहर गई थीं । आध घंटे पहले आई थीं । रास्ते में जाते समय भीड़ मे ट्रक से बचने क प्रयत्न में रिक्शे से टकरा गया । साइकिल डायल हो गई । ठीक कराते देर हो गई । चलते समय तारा ने पचास रुपये दिए, कहा, हिसाब फिर होता रहेगा । मैंने कहा, दस आप दे चुकी हैं शेष फिर दे दीजिएगा । पद्मा नहीं थी । नामवर के यहाँ गया । उनसे तारा की किताब वापस करने की बात कही तो उन्होंने चुप रहने को कहा, और रविवार कहीं न जाने को कहा । ओझा जी के यहाँ खिचड़ी खाई । साढ़े पाँच रुपये अखबार वाले को जनवरी के हिसाब में दिया । जय छ आने की दवा लाया, बीस रुपये ओझा जी से लिया । जय के लिए दो खाकी और एक सादी, एक रंगीन रेखा-मयी कमीज के कपड़े तथा दो लँगोट के लिए कपड़े छब्बीस रुपये में लिए, पैसा कम होने पर जगत से एक रुपया लिया । जय को आठ आना किराए का दिया । तारा ने पचास रुपये दिए । बीस रुपये बलराम के दूध के मद्धे और बीस रुपये ओझा जी को लौटाया । आठ आने में साइकिल का डायल ठीक कराया ।

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