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संस्कृति
ग्राह्म, रक्षणीय और व्यवहार्य विचार और आचार की प्रक्रिया है जो किसी समूह, जाति
या देश के जीवन-सन्दर्भ में देखी और परखी जाती है। किसी संस्कृति पर विचार करते समय
तत्कालीन इतर संस्कृतियों पर भी दृष्टि डालने से अन्तरग्रहण, आदान-प्रदान और प्रभाव
का पता चल सकता है जिससे कोई विवेचक यह कह सकता है कि कोई संस्कृति सही अर्थों में
विशुद्ध और स्वतंत्र नहीं होती, फिर भी, जीवन विचार और कला में देश और काल की निजी
और बाहरी प्रवृत्तियों के अनुसार विभिन्न संस्कृतियों में विशिष्टता पाई जाती है।
कला के रचनात्मक साहित्य वाले पक्ष पर ध्यान दिया जाय तो भाषा का माध्यम होने से
संस्कृति विशेष और पृथक दिखाई देती है। भाषा स्थानीय सन्दर्भों से प्रभावित होती
हैं जिनको समझने के लिए टिप्पणियाँ और व्याख्याओं का सहारा अवश्य हो जाता है। आजकल
यहाँ-वहाँ विश्व-संस्कृति की भी चर्चा मिलती है;
प्रश्न है, विश्व-संस्कृति है क्या और उसकी स्थिति कहाँ है । यदि सारी संस्कृतियों
का। अलग-अलग और सपूँजित भाव से ग्रहण ही विश्व-संस्कृति है तो इसमें किसी को क्या
आपत्ति हो सकती है किन्तु विश्व-संस्कृति यदि प्रयोग करने वालों के पूर्वग्रहों के
अनुसार निरन्तर भिन्नता व्यंजक है तो यह एक जगह अनेक रूप गड़बड़ा झाला ही होगा।
जब संस्कृति ही विवाद से मुक्त नहीं तो स्वाभाविक है कि
सांस्कृतिक विपन्नता भी विवादास्पद हो। फिर भी सांस्कृतिक
विपन्नता की दृष्टि से आधुनिक लेखन पर विचार करना लेखकीय और
प्रकाशकीय प्रचार-जाल से निकल कर देश और काल के हित में सोचने
की दिशा में आवश्यक क़दम है।
सर्व-मान्यता या बहु-मान्यता में सर्व या बहु के अनुबन्धों का
निर्वाह करना होता है किन्तु जो मान्यता अपनी छाप लगा कर
प्रस्तुत की जाती है उस पर भी इस सर्व या बहु का कुछ न कुछ
चिपका हुआ मिलता है। आधुनिक लेखन के विषय में आधुनिक विचार
टिकाऊ न हों तब भी उनसे रचना सम्बन्धी सामयिक प्रतिक्रिया का
परिचय तो मिलता ही है। रामचन्द्र शुक्ल आलोचक छोटे नहीं हैं पर
छायावादी काव्य को उन्होंने जितना छोटा समझा और समझाया उसे आज
उतना छोटा नहीं समझा जाता । छायावाद पर विचार चल ही रहा है,
क्या मालूम भविष्य में वह कहीं अधिक महत्वपूर्ण मान्य हो जाय ।
प्रेमचंद विषयक अवध उपाध्याय की आलोचनाओं से नगेन्द्र परिचित
होते जो विरोधी स्वर को कायम रखते हुए कुछ और बातें जोड़ते ।
प्रेमचंद देश-विदेश में अनुवादों के कारण महत्व अर्जित कर रहे
हैं या उनकी रचनाओं में ही महत्व के तत्व निहित हैं
?
रचना में निहित तत्व सर्वानुगम्य नहीं होते । सर्वानुगम्य के
सर्व का आलोचक भी एक अंग है।
आधुनिक लेखन पर विचारार्थ काव्य को लिया जाय तो आवश्यक सामग्री
का अभाव नज़र आता है। मुक्तिबोध, शमशेर, नागार्जुन और कितने ही
अन्य कवियों की रचनाएँ पर्याप्त रूप में अभी तक प्रकाशित ही
नहीं हैं। इसके बाद के कवियों को भी हाल वैसा ही है। सामूहिक
या वैयक्तिक संकलनों के आधार-पर हिन्दी की आलोचना चल रही है,
हिन्दी में साहित्य के अन्य रूपों के मुकाबले काव्य की रचना अब
भी अधिक होती है जिसमें प्रकाशन का अवसर कुछ रचनाकारों को ही
मिलता है। प्रकाशित सभी रचनाएँ ध्यान देने योग्य भी नहीं होतीं;
रचयिता और प्रकाशकों का परितोष ऐसी रचनाओं से भले होता हो।
एक प्रश्न है, अधिसंख्य हिन्दी-पाठक आधुनिक कविता से परहेज़
क्यों रखते हैं । मुझे पुस्तकालयों में जाने की आदत है।
कभी-कभी किताबें लेने वालों से बात भी करता हूँ और उनकी
रुचियों का भी पता लगाता हूँ । पुस्तकालयों में जानेवाले भारी
संख्या में जासूसी और अपराध सम्बन्धी उपन्यासों को लिया करते
हैं। इन पाठकों में किशोर से वृद्ध तक होते हैं। अल्पसंख्यक
पाठक स्कूल या कालिज के छात्र होते हुए भी काव्य नहीं बढ़ा
करते । प्रेम-कथाओँ में वे घटिया उपन्यास पढ़ा करते हैं और
हिन्दी के जाने-माने उपन्यासकारों से कोई सरोकार नहीं रखते।
हिन्दी या उर्दू फ़िल्मों से भी जो संस्कार बनते हैं उनमें
अज्ञेय, इलाचन्द्र जोशी, अमृतलाल नागर, यशपाल, नागार्जुन और
रेणु के लिये कोई गुंजाइश नहीं रहती। थोड़े से पाठक रह जाते
हैं जो पुस्तकालयों से अथवा दुकानों से इनकी किताबें लेकर पढ़
लेते हैं पर इनकी संख्या इतनी नगण्य है जिसका असर लेखक के
रहन-सहन पर देखा जा सकता है। दो हजार का संस्करण चार साल में
बिकने पर कोई उपन्यास अतिशय लोकप्रिय माना जाता है और यह बिकाई
सरकारी, स्कूल, कॉलिज, जन और निजी पुस्तकालयों के बाद कितने
व्यक्तियों तक पहुंचती है इसका पता लगाना कठिन है। कहा जा सकता
है कि हिन्दी-भाषी पाठक के पास पैसे नहीं हुआ करते, तब बंगला
और मलयालम भाषियों के पास क्या इफ़रात पैसे रहते हैं;
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि गरीबी भारत में कम-वेश हर कहीं
है।
यहीं कुछ और विचार आवश्यक है। लस्टम पस्टम बिक्री का मतलब यह
भी हो सकता है कि लेखक का जनता से कोई लगाव ही न हो, आज कोई
लेखक न मिलेगा जो प्रति दिन दो चार बार जनता शब्द न कहता हो।
पर हिन्दी का लेखक अब जनता से सीखने की जगह उसे सिखाने की बात
सोचता है। फलतः जनता नेताओं की तरह मिल जाने पर उसका आदर कर
सकती है पर अपना कैसे समझ सकती है। जनता को हिन्दी की किताबों
में यदि अपनी भाषा नहीं मिलती तो उन्हें अपनाने का और कौन सा
आधार रह जाता है।
कविताओं की लोकप्रियता जाने-माने छंदों के आधार पर होती है,
इसके अलावा भाषा और विषय के निर्वाह में कुछ विशेषता आवश्यक
है। गद्य की कविता रचनाकार को भले याद हो, पाठक उसे याद नहीं
कर सकता । छंदों को लिख लेना ही कोई बड़ी बात नहीं, बड़ी बात
है छंदों में जो बात आई हो वह भाषा के निरालेपन के साथ पहचान
की खास भंगिमा पेश करती हो। ध्यान देने की बात है कि पुरानी
कविताओं का भी पारायण या प्रचार किया जाता था और नई कविता के
कवि पत्रों में छपा कर या मंचों से सुना कर ही अपना कर्तव्य
पूरा मान लेते हैं जब कि दोनों ही स्थितियों में किसी से सीधा
सम्पर्क नहीं बन पाता । नई कविताओं को जनप्रिय बनाने के लिये
कवि-सम्लेनों के अलावा छोटी-छोटी गोष्ठियों में काव्यपाठ और का
कार्यक्रम जगह-जगह स्थायी रूप से चलाना चाहिये।
राजनीतिक दलों में इधर जन-सम्पर्क शब्द का चलन बहुत बढ़ गया है
और विभिन्न ढंग से इसकी आजमाइश भी जारी है, उसी प्रकार साहित्य
में भी जन-सम्पर्क यानी पाठक का महत्त्व माना जाने लगा है। इस
सम्पर्क के कई द्वार हैं-स्कूल, कालिज, विश्वविद्यालय,
सम्मेलन, संस्थाएँ, पत्र-पत्रिकाएँ, रेडियो, कहीं-कहीं
टेलीविज़न और सिनेमा आदि । पर देखा जाता है कि इनका असर
साहित्य पर कम ही है यानी बिक्री में बढ़ोत्तरी नहीं है। जब
बिक्री का यह हाल है तब लेखक के हाल का पता लगाना कोई कठिन काम
नहीं। पाठक पुस्तकों और उनसे संबंद्ध
‘अध्ययनों’
के प्रकाशन का व्यावसायिक रूप सामान्य साहित्य की अपेक्षा कहीं
व्यवस्थित और लाभप्रद है। पाठ्य-पुस्तकों के संकलन कार अनेक
लेखकों के लाभांश का अधिग्रहण अपना अधिकार समझ बैठे हैं।
शिक्षा के काम में लोग यदि इतर क्षेत्रों की चालों से कुछ
परहेज़ रखें तो स्थिति में कुछ अन्तर आ सकता है। किन्तु इस आशा
की पूर्ति का अभी कोई आधार नहीं है।
हमारी शिक्षा ने ऐसा रूप ले लिया है कि जितने शिक्षित
संस्थानों से निकलते हैं उनका समाज से कोई लगाव नहीं पाया
जाता। अपनी चिन्ताओं में फँसे ये शिक्षित अपनी गोष्ठियाँ,
सभाएँ और संस्थाएँ भी मन बहलाव के विचार से चलाया करते हैं
जिनमें रुचियों और संलग्नताओं में सीमा रहा करती है क्योंकि
कहाँ शेष समाज से अलगाव को विशिष्टता समझ लेने की प्रवृत्ति का
विकास होता रहता है और शेष समाज इसी अलगाव के कारण इनसे
लेनदेन का कोई सरोकार नहीं रखता । यदि शिक्षा व्यक्ति को समाज
से अलगाती है तो वह दोषयुक्त है। ज़ाहिर है कि अलगाव है। तब
सहित होने की कल्पना को भी गुंजाइश कहाँ।
हाँका करने वाले, शिकारियों का सम्पर्क शिकार से कराया करते
थे, अब जब से जंगल सुरक्षित कर दिये गये तब से हाँका करनेवाले,
शिकारी और शिकार होते हुए भी नहीं जैसे हैं किन्तु समाज के
विभिन्न वर्णों में हाँका भी है, हाँके वाले भी हैं और शिकारी
और शिकार भी हैं। सामंजस्य हो तो बात शिकार और बाज़ार की भाषा
में न चले, पर जब साहित्य बाज़ार में आ ही गया है तब बाज़ार
की उपेक्षा से इस धन्धे में लगे लोगों की दशा ख़राब होती
जायेगी। पुराने सन्तों और ऋतियों का नाम अधिकारियों और
प्रकाशकों के ही हित का सम्पादन पर सकता है क्योंकि आज
साहित्यकार, समाज में, समाज के सहारे, परिवार सहित और अकेला
भी, रहने को बाध्य है। उसकी इस स्थिति का प्रभाव भले ही संख्या
में कम लोगों पर हो किन्तु समाज के व्यापक हित की दृष्टि से यह
संख्या भी नगण्य नहीं।
संस्कृति समाज-मूलक है। साहित्य भी संस्कृति का एक आवश्यक अंग
है, इसे शीर्ष भी कह सकते हैं। अतः सांस्कृतिक विपन्नता के
सन्दर्भ में समाज की भी निरख-परख करना ज़रूरी है। व्यक्ति की
वास्तविक और रचनात्मक कल्पनाओं का समाज से गहरा संबंध अनिवार्य
है। संबंध अनुकूलता के ही पर्याप्त नहीं । उनका कभी कोई रूप हो
सकता है। कोटियों की भिन्नता से विचारों का विकास हुआ करता है।
व्यवस्था या प्रशासन में विचार और व्यवहार के अनुकूलन और
सामंजस्यकरण की माँग की जाती है। विपरीत ढंग से सोचने वाले
अपना संघटन और कार्यक्षेत्र अलग कर लेते हैं, फिर भी वे
व्यवस्था को मान देते हैं भले ही वह भिन्न रूप और प्रकृति की
हो।
नई कविता के प्रसंग में पाठकों के अभाव की शिकायत उसके इतिहास
पर ध्यान देने पर अब पुरानी पड़ चुकी है। अभाव की यह शिकायत तो
छायावादी काव्य पर भी थी। पर छायावादी काव्य छन्द से बहुत दूर
नहीं था। प्रसाद और पन्त तो छंदों के ही कारण ग्राह्म थे
किन्तु निराला जो मुक्त छन्द के प्रवर्तक माने जाते हैं, छंदों
से बहुत अलग नहीं हैं। उनके काव्य पर काम करने वाले ने उनकी
मुक्त-छन्द में लिखी कविताओं की अभी पड़ताल कहाँ की। निराला ने
छन्द की अन्तर्निहित सम्भावनाओं को अपने प्रयोगों द्वारा और
उजागर किया लय-अश्रित कविताओं को परे कर दें तो निराला की ऐसो
कविताएँ भी मिलती हैं जिनका आज की नयी कविताओं से सज़ातीय
संबंध है।
नयी कविताओं के पाठक मुख्यतया दो कारणों से कम हैं-एक, यदि वे
लय के आधार पर हैं तो पूरा पढ़ जाने पर भी उसी लय को पकड़ पाना
सबके बूते की बात नहीं, दो, गद्य की कविता यदि सामने है तो वह
इतर गद्य से भिन्न कहाँ है और भिन्नता है तो वह कविता कहाँ तक
है।
छपी हुई नई कविताओं पर सामान्य पाठक की यही दो प्रकार की
शंकाएँ हैं। इन शंकाओं को मुझे भी सुनना पड़ा है। मैंने पाठ
करके उनकी लय को भी प्रकट करने की चेष्टा की है। देखा है, संशय
अंशतः दूर हुआ है पर एकाध कविता के पाठ से संस्कार नहीं बना
करता । संस्कार के लिए सम्पर्क बराबर होना चाहिये।
अब एक नयी स्थिति पर भी ध्यान जाना चाहिये । स्वाधीनता के बाद
के लेखक और कवि अँग्रेज़ी-शिक्षित हैं । अँग्रेज़ी साहित्य
अनूदित इतर साहित्यों का अध्ययन ऐसे लेखकों ने बराबर किया है
और करते रहते हैं। परिणामतः ऐसी कोटि के लेखकों की रचनाओं में
एक अजनबीपन हर कहीं उजागर है। इस अजनबीपन की हिमायत में कहा
जाता है कि हिन्दी में यह सब पहले नहीं था और इस पद्धति से
उसके भण्डार की पूर्ति हुई है। भाषा का प्रयोग भी हिन्दी के
मूल स्वभाव से भिन्न मिलता है, भिन्न ही नहीं अनपैठ भी।
सांस्कृतिक समृद्ध आन्तरिक विकास से संबंद्ध होती है। बाह्म
तत्व आया करते हैं पर आंतरिक तत्व की ही रहती है। प्रेमचंद के
बाद, यदि कोई कहे कि इस आंतरिक तत्त्व को पहचानने वाला कोई
नहीं हुआ तो बहस के अलावा भरोसा करने लायक कोई बात न रह
जायेगी। किताबों की संख्या और एक ही किताब में पन्ने बढ़ा कर
कोई लेखक होने का दावा करता रहे तो उसका यह आत्मसन्तोष उसी को
सुखी करेगा। हिन्दी जहाँ की तहाँ बनी रहेगी। बिना हिन्दी की
निर्मित और निर्मियमाण संस्कृति की पहचान को अलगाए, हिन्दी
लेखक भारतीय साहित्य में योगदान नहीं कर सकता।
(फरवरी 1975
–पूर्वग्रह
से साभार)
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