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सृजनगाथा

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-20, जनवरी, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। त्रिलोचन अंक।।

 

 

काव्य और अर्थबोध


त्रिलोचन

 

पने विषय पर कुछ कहने के पूर्व इसी विषय से संबंध रखने वाले दो- एक प्रसंगों का अवतरण करने के लिए मैं पाठकों से क्षमा चाहता हूँ।

 

एक प्रतिष्ठित पत्र के सम्पादक ने, जिनके साथ मैं काम किया करता था, एक दिन अपने हाथ के लेख को मेज पर डालकर, चश्मे की कमानी को ठीक करते हुए प्रश्न किया- त्रिलोचन जी, सुन रहे हैं न ? मैंने ध्यानपूर्वक उनकी और देखा। उन्होंने कहा-इस लेख में एक कविता उद्धृत है जो मुझे ठीक नहीं जान पड़ती । लिखा है, एक मुर्दा गा रहा था बैठकर जलती चिता पर। भला जलती चिता पर बैठकर मुर्दा गायेगा कैसे ? ऊटपटांग बात है। मैंने कुछ कहा नहीं। केवल सम्पादक जी को और सतर्क होकर देखा।

 

वे कह रहे थे कि ऐसा तो न मैंने कहीं देखा, न सुना। सचमुच वे अनुभवी तो थे ही। विद्वान् भी थे। मौनं स्वीकृति लक्षणम् के अनुमान से उन्होंने कहा-मैं गा रहा था की जगह जा रहा था कर देता हूँ, यद्यपि फिर भी कुछ ख़ामी तो रह ही जाती है, यद्यपि यहाँ लेट कर होता तो शायद कुछ ठीक होता। अब सम्पादकजी क़लम लेकर कुछ कर गुजरने के लिए तैयार थे कि मैंने उनकी सुफेदी की इज्जत लिये हुए निवेदन किया- इसका संशोधन यदि न करें तभी अच्छा । यह कविता तो एक पुस्तक में प्रकाशित हो चुकी है। यहाँ पहले छपती तब संशोधन उचित होता। इस समय के संशोधन को लोग प्रूफ़ की ग़लती मान लेंगे। पुस्तक में प्रकाशित होने के कारण कवि भी अब संशोधन से कोई लाभ न उठा सकेगा। सम्पादकजी को यह बात जँच गयी। और उन्होंने संशोधन से हाथ खींच लिया।

 

बच्चन दूसरे कवियों से अधिक लोकप्रिय हैं। कहा जाता है, उनकी कविताएँ सरल हैं। इतने पर भी क्या आप सहमत हैं।

 

उन सम्पादकजी के लिए संभवतः कुछ उदारमना विचारक यह सिफ़ारिश करें कि उन्होंने कविता न पढ़ी होगी, जाने भी दीजिये। अच्छी बात । अब एक और प्रकरण । एक कवि हैं। बड़ा नाम है, बड़ा काम किया है। ग्राम-गीत कहानी, उपन्यास और बाल-साहित्य कौन ऐसा विषय है जिस पर उन्होंने कृपा न की हो। हाँ, आलोचना का विषय न जाने कैसे छूट चला था कि जो खेतों से आया था और फिर खेतों में चला जाऊँगा यह निश्चय कर चुके थे; क्या मालूम क्या हुआ कि जाने से पहले इस विषय को भी कृतार्थ करते गये । जिन दिनों उन्हें आलोचना का आवेश रहा करता था वे ख़ास तौर से छायावादी कवियों के दोषों पर दृष्टि रखते थे और निश्चय ही उनके हावभाव से प्रकट होता था कि हिन्दी साहित्य के अकल्याण-भय से उनकी चिन्ताओं का कोई अन्त नहीं। एक बार ग्राम्या के पन्ने पलटते हुए बोले-पन्तजी को प्रकृति का परिज्ञान तक नहीं। उनकी नायिका वर्ष भर के फूलों से, कभी इससे, कभी उससे, श्रृंगार करती है।बस, उन्होंने फूलों के नाम नोट किये और एक कविता में सबको भर दिया। न देश का विचार किया न काल का। उस कविता में सबको भर दिया। न देश का विचार किया न काल का । उस कविता को एक नज़र देख जाने पर निहायत अदब से अर्ज किया कि ऐसी बात तो नहीं है। यहाँ तो कवि ने नायिका पर ध्यान रखा है। वह प्रकृति से इतनी हिल-मिल गयी है कि प्रकृति जब जिन फूलों से श्रृंगार करती है, उन्हीं को वह भी अंगीकार करती है। देखिये, लिखा है, सज ऋतु सिंगार । इसके बाद कवि जी अन्यान्य दोषों पर ज़बान दौड़ाने लगे।

 

अभि कल की बात है कि चारों ओर अश्लीलता सूँघने वालों ने निराला जी की एक कविता पर अथक कृपा दिखलायी थी। उसका निम्नांकित पद प्रायः सबूत के लिए पेश किया जाता है।

 

दूर ग्राम की कोई वामा

आये मन्द चरम अभिरामा

उतरे जल-तल अवसन श्यामा

अंकित उर-छवि सुन्दरतर हो

 

उन स्वयंभू समालोचकों ने कभी यह सोचने की तकलीफ़ गवारा न की कि इस कविता का शीर्षक विनय क्यों है ? क्या उन महाभागों ने कभी किसी को अपने मन में धँसे हुए कुत्सित अर्थ की प्रार्थना विनय या सन्ध्या में करते देखा अथवा सुना था ?

 

एक बार ऐसी ही काव्य-पारखी लोगों से तंग आकर आनन्दवर्धन ने कहा था :

जग की कविताई के धोखे रहैं

ह्याँ प्रवीनन मति जाति जकी

समुझैं कविता घनआनँद की

हिय-आँखिन देह की पीर तकी

मर्मी कवि ठाकुर न ऐसे ही लोगों का खाका खींचा है :

डेल सौ बनाय आय मेलत सभा के बीच

लोगन कविता कीबो खेल करि जानो है  

सन्त कवि सुन्दरदास ने इन्हीं लोगों के पूर्वजों से प्रार्थना की थी :

बोलिए तो तब जब बोलिबे की जानि परै

न तो मुख मौन गहि चुप होइ रहिए

 

लेकिन इन सबसे क्या होता ? पारखी न तब कम हुए न अब कम हैं। उनकी संख्या दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है। इन पर आपको हर्ष होगा या शोक ?

 

भतृहरि ने साहित्य, संगीत और कला से हीन व्यक्ति को पुच्छ विषाण-हीन साक्षात् पशु कहा है। वह बात स्वयंसिद्ध के समान मानी जाती है। ऐसी हालत में अन्य दिशाओं की ओर गति मूढ़ता देखकर अधिकतर लोग साहित्य को अपने कृपा-कटाक्ष से अवश्य धन्य करते हैं। आजकल सुसंस्कृत मनुष्य की एक यह भी पहचान है कि वह साहित्य से अच्छा परिचय रखता हो। हमारे यहाँ की चौंसठ कलाएँ पुरातन सभ्यता का लक्षण हैं। उनमें से अधिकांश दैनिक जीवन से संबद्ध हैं। कुछ का बौद्धिक महत्व है, कुछ का व्यावहारिक, कुछ का आनंदमूक। चौंसठ कलाओं में साहित्य या काव्य की गणना नहीं है। उसमें समस्यापूर्ति का नाम है। कुछ लोग इसी समस्यापूर्ति को काव्य कहना चाहते हैं। समस्यापूर्तियों में कभी-कभी कवित्व की झलक मिल जाती है। लेकिन यह अपवाद है और अपवाद को नियम का पद नहीं दिया जाता । नटों के प्रदर्शनों में अच्छी-खासी मेहनत पड़ जाती है मगर उनके कौतुक को शायद ही कोई व्यायाम कहना चाहे।

 

मालूम नहीं जग की कविताई से आनन्दघन का क्या अभिप्राय है ? सामान्य सत्यों की व्यंजना करने वाली रचना को अब हिन्दी में सूक्ति कहने का रवाज चल पड़ा है। इस सूक्तियों को कुछ काव्य-समीक्षक कविता के क्षेत्र से ख़ारिज़ कर देना चाहते हैं। उन लोगों का भगीरथ प्रयत्न बराबर चालू है। न जाने किन अलक्ष्य कारणों से अभी सिद्धि के लक्षण नहीं दिखाई देते ।

 

एक बार एक सम्पादक जी ने प्रसंगवश कहा कि वृन्द के समान महान् कवि हिन्दी में कोई नहीं हुआ। सुनने वाले हँस पड़े। एक दुर्मुख कवि ने कह ही तो दिया और आपके समान महान् सम्पादक भी हिन्दी में कोई नहीं हुआ। सम्पादक जी ने भोलेपन से पूछा-क्या मैंने कुछ ग़लत कहा ? भला वे कुछ ग़लत कह सकते थे।

 

एक आत्मिविश्वासी पत्रकार ने निराला पर एक लेख में लिखा है कि मैं निरालाजी की कविताओं को समझने का दावा नहीं करता । वरन् मेरा तो ऐसा विश्वास है कि उनकी कविताएँ समझी ही नहीं जा सकतीं। फिर भी सम्मेलनों में जब निरालाजी काव्य-पाठ करते हैं, सभा की अखण्ड शान्ति को देखकर मैं सोचा करता हूँ कि इस साहित्यकार में कोई शक्ति अवश्य है। ऐसे ही महापुरुषों ने इधर-उधर से प्रकाश डाला है। क्या इन्हीं लोगों को ध्यान में रखकर गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है :

 

मनि मानिक मुक्त छवि जैसी,

अहि गिरि गजसिर सोहन तैसी

नृपकिरीट तरुनीतन पाई,

लहहि सकल सोभा अधिकाई

तैसई सुकवि कविता बुध कहहीं,

उपजहि अनत अनत छवि लहहीं

 

सचमुच ऐसे पुरुषार्थियों को यदि बधाई देने में संकोच हो तो दया के लिए मितव्ययिता न करनी चाहिए। श्रीहर्ष को उदाराशय कहने में हमें इसीलिए आगा-पीछा हो रहा है उसने इन परोपकारियों के साथ कोई अच्छा सलूक नहीं किया। जगह-जगह अपने काव्य में ग्रन्थियों का नियोग करके उसने इन लोगों को व्यर्थ ही निरुत्साहित किया है।

 

जब, कविः करोति काव्यानि स्वादं जानन्ति पंडिताः उक्ति प्रचलित हुई होगी तब शायद इस प्रकाश के पंडित न रहे हों। कविता का भाव तो कुछ और है परंतु, आलोचक महाशय की व्याख्या कुछ और ही गजब ढा रही है; ऐसा प्रायः देखा जाता है। कुछ लोग कवियों को व्याकरण पढाना चाहते हैं, कुछ यह चाहते हैं, कुछ वह चाहते है; सब अपनी हाँकते हैं। कहा जाता है, एक बार किसी चित्रकार ने एक सुन्दर चित्र बनाकर विशेषज्ञों की सम्मति के लिए, उसे किसी विशेष स्थान पर टाँग दिया और लिख दिया कि इस चित्र में जिसे जहाँ जो त्रुटि दिखाई दे वहाँ पर निशान बना दे। परिणाम यह देखने मे आया कि उस चित्र में निशान-ही-निशान रह गये;  चित्र न जाने कहाँ चला गया। यदि काव्य पर भी विशेषज्ञों की यहीं कृपा बनी रही तो काव्य की जगह विशेषज्ञता ही रह जायेगी ।

 

निरालाजी कवि के साथ काव्य-मर्मज्ञ भी भी अच्छे हैं; पर उनकी एक आलोचना देखिये। पन्तजी की पंक्तियाँ हैं :

 झर-झर बिछते मृदु सुमन शयन

जिन पर छन कम्पित पत्रों से

लिखती ज्योत्स्ना कुछ जहाँ तहाँ

 

निरालाजी को शंका होती है। पूछते हैं, फूलों की सेज पर ज्योत्स्ना क्यों लिखती है ? सेज भी क्या लिखने की चीज़ है और यह ज्योत्स्ना कैसे लिखती  है। फिर मज़ाक करते हैं : अच्छा माना, पत्ते व्रोडनिब जैसे होते हैं, लेकिन काँपते पत्तों से, निब से लिखना, कैसे सम्भव है ? यहाँ निरालाजी की प्रकृति केवल छिद्रान्वेषिणी है, यह मेरा नम्र निवेदन है। देखिये। चाँदनी रात है। शायद पूनो । हवा चल रही है। फूल एक-एक गिरकर बिछ रहे हैं। पेड़ के पत्ते हिल-डुल रहे हैं। इन्हीं हिलते-डुलते पत्तों के बीच से ज्योत्सना छन कर कभी यहाँ कभी वहाँ मानों कुछ लिख जाती है। शायद इस अर्थ पर निराला जी को आपत्ति न हो। निरालाजी केवल एक जगह चूके हैं, उन्होंने छन पर ध्यान ही नहीं दिया औरसे का अर्थ तृतीय विभक्ति के रूप मे लिया। (निराला के जीवनकाल में लिखा गया है। यह ध्यातव्य हो ।उ0)

 

इससे प्रकट होता है कि काव्य का विषय बहुत नाज़ुक है । पूर्वधारणाओं के काव्यार्थ-बोध में प्रायः बाधा उपस्थित होती है। काव्यार्थ के लिए नियमित रूप से काव्य का पाठ और मनन करना चाहिए । किसी भी काव्य का अध्ययन करने से पहले आत्म-परीक्षा कर लेनी चाहिए। किसी भी प्रकाश की संकीर्णता काव्य-सौन्दर्य को अपिहित कर लेती है। किसी कवि के प्रति विशेष श्रद्धा दूसरे कवि का स्वरूप-बोध नहीं होने देती। कभी-कभी विचार-विशेष के आग्रह से भी काव्य समझने में बाधा खड़ी होती है। अतएव-काव्य-पाठ करने के पहले मन को प्रत्येक बाहरी प्रभाव से मुक्त कर लेना चाहिए।

 

इसके अतिरिक्त यदि मन मे शिथिलता, श्रान्ति या शून्यता हो तो भी काव्यानुशीलन न करना चाहिए। चिन्ता और उद्विग्नता भी काव्य-सौन्दर्य को परिच्छिन्न करती है। यदि मन पर किसी विशेष प्रकार के भावों अथवा विचारों की छाप पड़ चुकी हो तो भी काव्य का पाठ अनुपयुक्त है।

 

शब्दों की शक्तियों का जितना ही अधिक बोध होगा अर्थ बोध उतना ही सुगम्य होगा। इसके लिए पुरातन साहित्य का अनुशीलता तो करना ही चाहिए, समाज का व्यापक अनुभव भी प्राप्त करना चाहिए।

 

कवि में जिस प्रकार विधायक कल्पना की आवश्यकता है उसी प्रकार पाठक से ग्राहक कल्पना की आवश्यकता होती है। पाठक की ग्राहक कल्पना की विकास प्रत्यभिज्ञा के आश्रय से होता है। जिसकी निरीक्षण-शक्ति जितनी विकसित होगी उसकी भावना का भी परिपाक तदनुकूल ही होगा।

 

अन्त में हम आचार्य शंकर की इस उक्ति की तात्पर्य बोध के लिए उद्धृत कर ग्रहण करते हैं।

 अर्थमनर्थ भावय नित्यं नास्ति ततः सुखलेशः सत्यं

 

(स्थापना-सात-1970  से साभार)

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