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बच्चन
छायावादोत्तर पीढ़ी के कवियों में है। छायावादोत्तर पीढ़ी का यह मतलब नहीं कि
छायावाद से सर्वथा भिन्न या विरुद्ध है। इनकी भाषा और व्यंजना सरल है। यह सरलता भी
अकेले उन्हीं के यहाँ नहीं है। समझ से काम लेने वाले जानते है कि सरलता स्वयं
छायावाद के कवियों में भी मिलती है। बच्चन के समकालीन गोपाल सिंह नेपाली, नरेन्द्र
शर्मा आदि कवि अपने ढंग और भाव-परिवेश के अनुसार यह रूप उपस्थित करते हैं।
बच्चन का रचना काल 1929 से आज तक है। उन्होंने
रुबाइयात-ए-उमरखैयाम के अँग्रेज़ी अनुवादक फ़िट्ज़जेराल्ड का
हिन्दी रूपांतर किया है। यह रूपांतर उन्होंने अवसरों पर
गोष्ठियों और कवि सम्मेलनों में सुनाया। श्रोताओं ने सर्वत्र
इसकी सराहना की। उन्होंने
‘मय’
के स्थान पर मधु, ‘मयख़ाना’
की जगह मधुशाला और ‘साक़ी’
के बदले मधुबाला शब्द चलाए। लोक जीवन में भले ही ये शब्द नहीं
चल पाए लेकिन शिक्षित जनों को इन्हें समझने मे कोई कठिनाई नहीं
हुई, यद्यपि व्यवहार शिक्षितों में भी इन शब्दों का अपेक्षित
रूप में नहीं हुई, इसके बाद बच्चन ने
‘मधुशाला’
नाम से अपनी मौलिक कविताओं का अलग संकलन प्रकाशित किया। उनकी
मधुशाला श्रोताओं में बराबर चर्चा का विषय रही। उन्होंने
‘खैयाम’
के अनुवाद का नाम दिया
‘खैयाम
की मधुशाला’
साथ ही ‘मधु
और मधुशाला’
की प्रतीक- निर्भर अपनी मौलिक कविताओं के संकलन का नाम केवल
‘मधुशाला’
दिया । ‘मधुशाला’
की कविताएँ बहुत लोकप्रिय हुई। जहाँ कहीं कवि-सम्मेलन में
बच्चन जाते थे वहाँ श्रोता आग्रहपूर्वक मधुशाल की कविताएँ भी
सुनते थे। ‘मधुशाला’
विषयक कविताओं के कारण बच्चन की अनुकूल और प्रतिकूल दोनों
प्रकार की आलोचनाएँ हिन्दी जगत् में हुई । प्रतिकूल आलोचनाओं
का बच्चन ने गद्य में उत्तर नहीं दिया। यह उत्तर उन्होंने
कविताओं में ही दिया और इस प्रकार की कविताओं का संकलन है
मधुकलश। ‘मुधुकलश’
की कविताएँ विवाद के प्रभाव में लिखी हुई उत्तरमूलक और अच्छी
कविताएँ हैं। यह सही है कि ये प्रतीक कवि बच्चन को अधिक दिन
बाँधे न रख सके। उनके बाद की कविताएँ इस प्रतीक को छोड़ देती
हैं। जिन आलोचकों ने कमी बड़े उत्साह से उन्हें हालावादी कहा
था वे देखें कि बच्चन अब कहाँ हैं।
इसके बाद बच्चन की पहली पत्नी का देहावसान हुआ जिससे बच्चन
इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी पत्नी की याद में जो
कविताएँ लिखी उनके संकलन का नाम निशा निमंत्रण है। दुख और
निराशा की स्थितियों में कवि ने काफ़ी कुछ लिखा जो इसमें
प्रकाशित है। इसी कारण उस समय के हिन्दी समीक्षकों ने इन्हें
निराशावादी कवि कहा और इनकी प्रतिकूल आलोचनाएँ कीं। बहुतों ने
इन्हें राष्ट्रीय कविताओँ की रचना करने का अनमाँगा परामर्श भी
दिया। बंगाल के दूसरे विवाह का प्रकरण है। उस समय उन्होंने
मिलन यामिनी और प्रणय पत्रिका की रचनाएँ कीं। इसी अरसे में
गाँधी जी मारे गए। इस विषय पर बच्चन ने खादी के फूल की कविताएँ
लिखीं।
बच्चन ने शेक्सपियर के चार नाटकों का अनुवाद किया। मैकबेथ,
ओथेलो, हैमलेट और किंगलिअर। उन्होंने 64 रूसी कविताएँ शीर्षक
से रूसी कवियों के अँग्रेज़ी रूपांतर का हिन्दी अनुवाद किया और
येट्स (Yeats)
की कविताओँ का अनुवाद मरकत दीप का स्वर नाम से किया।
बच्चन के निर्माण काल में जो हिन्दी कविताओं की भाषा थी वह
अनिश्चित और अनिर्धारित थी। अधिकतर कवि छंदों में लिखा करते थे
जिनमें भाषा प्रवाहयुक्त नहीं रह पाती थी। हिंदी कविता की भाषा
को उर्दू कविता की भाषा से मिलाकर देखा जाय तो प्रवाह और
बोलबाल का रचाव उर्दू में ही मिलता है। हिन्दी में इस अभाव और
बोलबाल का रचाव उर्दू में ही मिलता है। हिन्दी में इस अभाव का
क्या कारण है। क्या हिन्दी में ही कोई अंतर्निहित दोष है। फिर
उर्दू में यह दोष क्यों नहीं मिलता, जब बुनियादी तौर पर दोनों
भाषाएँ एक ही हैं। मेरा अनुमान है कि केवल लिपि-भेद के कारण
दोनों के लेखक एक दूसरे की भाषाई रचना से अनजान रहे। हिन्दी
धीरे-धीरे भाषाई रचना के सौन्दर्य की ओर अग्रसर हो रही है यह
नई पीढ़ी के कुछ हिन्दी कवियों में जहाँ तहाँ दिख जाता है।
बच्चन की भाषा सरल कही जाती है। अनजान और अपरिचित शब्दों का
व्यवहार उनकी रचनाओं में नहीं मिलता। लेकिन भाषा में
ऊबड़खाबड़पन दुर्लभ नहीं है। यह दोष उनकी अच्छी कविताओं की
अच्छाई को भी ढाँक लेता है। इसमें बच्चन का ही दोष नहीं है।
उनके अग्रज कवियों की भाषा में यह ऊबड़खाबड़पन जगह-जगह मिलता
है। बच्चन ने शायद इसे हिन्दी कविता की पहचान मान लिया हो। ऐसी
स्थिति में भाषा का वह रूप बना ही रह जायगा जो अच्छी कविता के
बनने में बाधक होता है।
बच्चन
की कोई भी कविता ऐसी नहीं है जिसकी कल्पना छायावाद के परिवेश
के बाहर की जाय। वयोवृद्ध कवि बच्चन
आज भी रचनाशील हैं। ये रचनाएँ किसी नए भाव-परिवेश को न भी दें
तो भी महत्व की हैं। बच्चन
हिन्दी के बहुत से वयोवृद्ध कवियों से अच्छी रचनाएँ दे रहे
हैं।
बच्चन
की कविताएँ मंच में विचार से भी सफल रही हैं और श्रोताओं ने
उन्हें बार बार सुना और सराहा है । ये कविताएँ प्रकाशित होने
पर भी गंभीर पाठकों को भी पसन्द आती रहीं । मंच के सभी सफल
कवियों के साथ यह बात नहीं थी। मंच की सफलता को ही सब कुछ मान
लेने वाले मनमोहन कवियों को पाठकों से वह सम्मान और स्नेह नहीं
मिला जो बच्चन
को । सिद्ध है कि बच्चन
कविता की स्वतन्त्र पहचान से समृद्ध रहे। अब उनके स्वर में वह
जादू शेष नहीं है जो युवा और प्रौढ़ बच्चन
प्रस्तुत किया करते थे, फिर भी उन कविताओं का आकर्षण कम नहीं
हुआ है।
बच्चन की कविता में विकास निरन्तर मिलता है, ही उनके सुदीर्घ
कवि-जीवन की सफलता का कारण है। उनकी गणना हिन्दी के श्रेष्ठ
कवियों की पंक्ति में की जायगी। बच्चन
अँग्रेज़ी के प्राध्यापक रहे, अँग्रेज़ी से काफ़ी कुछ अनुवाद
का कार्य भी उन्होंने हिन्दी में किया पर उनके लेखन में हिन्दी
का वह रूप मिलता है जो भाषा का सहज, स्वाभाविक और देसी रूप है।
इसका कारण यही है कि वे देसी जीवन और देसी भाषा के साथ मानसिक
रूप से बराबर जुड़े रहे ।
मेरी श्रेष्ठ कविताएँ बच्चन
की ही चुनी हुई कविताओं का संकलन है। सम्भव है कि संकलन में
पाठकों को अपनी पसन्द की कविता न मिले तो भी यह संकलन बच्चन
के पाठकों के लिए आवश्यक और उपादेय है। विविधता की दृष्टि से
भी संकलन का महत्व है।
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