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ठलुआ क्लब और त्रिलोचन
ऐतिहासिक
‘ठलुआ
क्लब’(काशी)
द्वारा त्रिलोचन शास्त्री, अपनी अद्भुत अनुपस्थिति में, आठ
दिसम्बर, 1953 को सम्मानित हो चुके हैं। इस ठलुआ क्लब की
स्थापना और उसके पुनरुज्जीवन का अपना एक महत्वपूर्ण इतिहास है।
सद्यःपूर्व पंचत्वप्राप्त श्री शिवप्रसाद मिश्र
‘रुद्र’
काशिकेय के अनुसार (1963,छह नवम्बर) ठलुआ क्लब की
स्थापना,चालीस वर्ष गुलाब राय (प्रख्यात निबंधकार) ने की थी।
दीर्घ अन्तरालानन्तर इसे पुनरुज्जीवित करने करने का प्रयत्न,
1961 की पहली मई को मिया गया। ठलुआ क्लब अपने ठलुओं के प्रति,
सम्मान-प्रदर्शन में, अत्यन्त अवधानता लेता है। त्रिलोचन
शास्त्री को सम्मानित कर, उसने निश्चय ही, अपने को, अपनी
संज्ञा को, सार्थक यहाँ अक्षरश, यथावत् पुनः प्रकाशित किया जा
रहा है।–उ.
श्री त्रिलोचन शास्त्री
काशी के महान् ठलुआ। भारतीय संविधान द्वारा स्वीकृत 16 भाषाओं
के पण्डित हैं साथ ही 16 विदेशी भाषाओं के अच्छे जानकार हैं।
आप कवि, कहानीकार, कोशकार, पत्रकार, नाट्यकार, लेखक, वक्ता,
आलोचक और व्यास हैं। महाकवि निराला का अधिकांश काव्य आप उदरस्थ
कर चुके हैं और मौज में आने पर उसे उगलते रहते हैं। आप सर्वगुण
सम्पन्न एकमात्र ऐसे ठलुआ हैं जो अपना अभिनन्दन-पत्र लेने नहीं
आये, बल्कि उसे आपके घर पहुँचाने जाना पड़ा। आज-कल आप हिन्दी
शब्द-सागर के सहायक सम्पादक हैं.
अभिनन्दन-पत्र
हे ठलुआ प्रवर,
आपको सशरीर और सगुण रूप में पाकर आज वस्तुतः ठलुओं का यह समाज
गुड़ खाये गूँगे की भाँति मन ही मन फूल उठा है। इस प्रसन्नता
को व्यक्त न कर पाने कारण हम मन ही मन आनन्द ले रहे हैं। आपका
निठल्लूपन सर्वोच्च स्वर में सर्वत्र व्याप्त है। कौन नहीं
जानता कि आप सिंह होते हुए भी परम अहिंसक, द्विलोचन होते हुए
भी त्रिलोचन हैं, राजकुमारी चंद्रवंशी होते हुए वासुदेव(यादव
कुलचन्द्र) हैं। आप जन्म से सिंह हैं या शास्त्री, इसे कोई
नहीं जानता । आप के नाम, काम और स्थान का पता किसी-किसी को
रहता है। और रहत भी है तो महान् ठलुआ अनतर्यामी सर्वव्यापी
ईश्वर के अस्ति और नास्ति दोनों के बीच। घर पर पूछिये तो पता
चलता है कि सभा मे गये हैं। सभा में पूछिये तो मासूम होता है
कि आज छुट्टी पर हैं । रेस्तराँ में पूछिये तो पता चलेगा कि
रेती में या मालवीय ब्रिज पर होंगे । इस प्रकार अनिश्चित,
अनियमित, अनियंत्रित, अनियोजित अगर एक साथ कोई है तो हमारे
ठलुआ शिरोमणि पं. वासुदेव सिंह शास्त्री त्रिलोचनजी हैं जिनके
दर्शन से गली का खौरवहा श्वान भी मस्त होकर पूँछ हिलाने लगता
है, शिव का वाबन दाँत निपोरते हुए प्रसन्नता प्रकट करता है ।
और रजक का अनन्य साथी गर्दभ दार्शनिक मुद्रा अपना लेता है ।
आप साहित्य तीर्थ के महान यात्री हैं। आपके अन्दर, बाहर, नीचे,
ऊपर सर्वत्र साहित्य ही साहित्य है । आपकी कीर्ति क्षमता
यत्र-तत्र-पंचतंत्र की कथाओं की तरह लोगों की ज़बान पर रियाज़
मारती है । कोई कहता है आप हिन्दी के शेक्सपियर हैं ।
अँग्रेज़ी के शेक्सपियर के सॉनेट और हिन्दी में आपके सॉनेट
प्राप्त हुए हैं । कुछ लोगों का विश्वास है कि आपमें व्यास का
पांडित्य और गणेश की लेखन क्षमता है, पर यह सब सामग्री बनारस
के उन मुहल्लों में दबी पड़ी है जहाँ-जहाँ आप किराये की कोठरी
लेकर रहते थे । जब बनारस की खुदाई होगी तभी आपकी प्रामाणिक
जीवनी लिखी जा सकेगी ।
आप परम कौशिक है । कौशिक अर्थात् जुलाहा या उल्लू नहीं, सिर्फ़
कोशकार । सुना जाता है कि आपको अण्ड से लेकर ब्रह्मांड के सभी
कोशों का ज्ञान है । अपना नाम बताइये, शास्त्रीजी से
व्युत्पत्ति सुन लीजिये । वे आपके नाम का इतिहास, व्याकरण और
प्रयोग तक बता देंगे । अपने नाम के पीछे इतने कलामों का कलाम
सुनकर आप सन्न रह जायेंगे और बरबस आपके मुँह से निकल पड़ेगा कि
यह आदमी ज्ञान का कुँजड़ा है, व्याकरण का अढ़तिया है, दर्शन का
व्यापारी है और साहित्य का दूकानदार है ।
आज आपको ठलुआ क्लब की ओर से सम्मान
‘महानिठल्लू’
की उपाधि देते हुए हम अपनी बिरादरी में रख ले रहे हैं ताकि और
कोई आपको नाध न सके ।
(स्थापना (छै) 1970 से साभार)
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