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चतुर्थ किश्त
हिंदी
लघुकथा का विकास
डॉ.
अंजलि शर्मा
(लघुकथा
हिंदी साहित्य की नवीनतम् विधा है । इसका श्रीगणेश छत्तीसगढ़ के प्रथम
पत्रकार और कथाकार माधव राव सप्रे के 'एक टोकरी
भर मिट्टी से होता है' । हिंदी के अन्य सभी
विधाओं की तुलना में अधिक लघुआकार होने के कारण यह समकालीन पाठकों के
ज्यादा करीब है । और सिर्फ़ इतना ही नहीं यह अपनी विधागत सरोकार की
दृष्टि से भी एक पूर्ण विधा के रूप में हिदीं जगत् में समादृत हो रही
है । इसे स्थापित करने में जितना हाथ लघुकथाकारों का रहा है उतना ही
कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, बलराम, आदि संपादकों का भी रहा है । खास कर
लघुपत्रिकाओं के संपादकों का ।
इंटरनेट पर भी सुकेश साहनी जैसे वरिष्ठ लघुकथाकार इसे विश्वव्यापी
लोकप्रियता के लिए कटिबद्ध हैं ।
हमने
अपने प्रिय पाठकों के लिए पहली बार हिंदी लघुकथा के विकास पर किसी शोध
ग्रंथ को धारावाहिक रूप से छापने का निर्णय लिया है ताकि इस लघु किंतु
गुरुतर विधा से सारी दुनिया के रचनाकार और पाठक भी अवगत हो सकें । हमें
खुशी है रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़ के शोध छात्रा और
हिदीं के प्राध्यापक डॉ. अंजलि शर्मा जी की सहमति से संपूर्ण शोध कृति
अंतरजाल पर प्रकाशित हो रहा है, जिस पर उन्हें पी-एच.ड़ी की उपाधि मिल
चुकी है । हिंदी अंतरजाल के इतिहास में शायद पहला अवसर है कि कोई शोध
कृति धारावाहिक प्रकाशित हो रही है ।
अभी तक आप
भाग 1,
भाग 2,
भाग 3
पढ़ चुके हैं ।
पिछले अंकों से आगे पढ़िए - संपादक )
(3) तृतीय उत्थान - (1936 से 1947)
यह युग हिन्दी कहानी के बहुमुखी विकास
की दृष्टि से महत्वपूर्ण है । इस युग में कहानी रचना का एक
नवीन रूप उभरकर सामने आया तथा जैनेन्द्र, यशपाल, अज्ञेय,
इलाचंद जोशी, भगवती प्रसाद बाजपेयी, भगवती चरण वर्मा
चंद्रगुप्त विद्यालंकार, उपेन्द्रनाथ अश्क, राधाकृष्ण, अमृतलाल
नागर आदि कहानीकारों ने अपनी दर्जनों कहानियों के द्वारा हिंदी
कथा साहित्य का भंडार भर दिया । इन कहानीकारों की प्रवृत्ति
मनोवैज्ञानिक विश्लेषण, हास्य व्यंग्य, घरेलू जीवन जीवन के
चित्रण तथा आध्यात्मिकता की ओर अधिक अधिक है । द्वितीय विश्व
युद्ध का प्रभाव जीवन के सभी क्षेत्रों पर पड़ा। युद्धोपरांत
उत्पन्न निराशा, महँगाई, बंगाल का अकाल एवं सांप्रदायिक दंगों
के कारण वर्ग चेतना का जोर वढ़ने लगा । इन परिवर्तनों का विशेष
प्रभाव मध्यम एवं निम्नवर्ग के वेतनभोगी मज़दूरों पर अधिक
पड़ा, इसलिए इस युग की कहानियों पर हम मध्यम वर्ग के जीवन की
समस्याओं का ही अंकन पाते हैं। उपर्युक्त कहानीकारों के
अतिरिक्त रांगेयराय व अमृतराय, नागार्जुन एवं मन्मनाथ गुप्त भी
इस युग के प्रमुख कहानीकार हैं । रांगेयराय राघव की कहानियाँ
यथार्थवादी परंपरा से जुड़ी हुई हैं । मन्मथनाथ गुप्त ने
आर्थिक और यौन संबंधों की व्यवस्था का जो चित्रण किया जो
विश्लेषणात्मक नहीं केवल वर्णनात्मक ही रहा । नागार्जुन के
पात्र गरीब और शोषित वर्ग के हैं । अमृतराय की कहानियों में
मध्यम वर्गीय शोषण का चित्रण अधिक है । श्री जैनेन्द्र की
कहानियों से चित्रण प्रधानता से अधिक सूक्ष्मता तथा गहनता
प्राप्त हुई ।
जैनेन्द्र जी ने सन 1928 में लिखना
प्रारंभ कर दिया था । उनको हिन्दी का दार्शनिक कथाकार कहा जा
सकता है । वे अपनी रचनाओं में पाश्चात्य मनोविश्लेषण
शास्त्रियों से अधिक प्रभावित प्रतीत होते हैं । आचार्य
नंददूलारे बाजपेयी जैनेन्द्र के योगदान पर लिखते हैं-
जैनेन्द्र कुमार की कहानियों से हिन्दी में एक नया उत्थान आरंभ
हुआ । कला की दृष्टि से कहानी अधिक सुंदर हो गई । एक ही दृश्य
या केंद्रीय घटनाओं से जुड़े हुए कथानक की योजना करते समय और
स्थान के संकलन का पूरा निर्वाह उन्हीं की कहानियों से प्रारंभ
हुआ ।
जैनेन्द्र जी ने प्रेमचंद के सामाजिक
दृष्टिकोण के साथ परंतु व्यक्ति मन के आंतरिक संसार के चित्रण
को प्रधानता दी, और कहानी में किस्सागोई के प्रचलित मार्ग को
त्यागकर वस्तुओं को स्वयं घटित होने की प्रक्रिया स्वीकार की ।
डॉ. रामदरश मिश्र जैनेन्द्र की कहानियों की विवेचना करते हुए
लिखते हैं-
‘जैनेन्द्र
ने प्रेमचंद की परंपरा को आगे बढ़ाने के स्थान पर उससे टकराहट
अनुभव की । उन्होंने एक दार्शनिक मुद्रा में व्यक्ति की
संक्रान्त मनः स्थिति को उजागर करना चाहा । इसके लिये उन्होंने
हल्का-हल्का बाहरी परिवेश भी लिया, किंतु मूलतः मानसिक परिवेश
ही प्रधान था ।’
अज्ञेय और इलाचंद जोशी पाश्चात्य
मनोविश्लेषण शास्त्रियों से अधिक प्रभावित रहे । अज्ञेय का
दृष्टिकोण व्यापक है और विश्लेषण साफ सुथरा जिसमें मार्मिकता
और गहरी संवेदना है । अज्ञेय की कहानियाँ प्रेमचंद की कहानियों
से सर्वथा भिन्न है । इलाचंद जोशी की कहानियाँ सैद्धांतिक
विश्लेषण की ओर अधिक झुकी हुई है, जबकि श्री भगवती चरण वर्मा
की कहानियों में सामाजिक एवं राजनैतिक मान्यताओं के प्रति
व्यंग्य है । वे अपने व्यंग्य को हास्य में लपेटे रहते हैं,
जिससे व्यंग्य की सांकेतिकता भी झलकती रहती है ।
मानव जीवन के चिरंतन सत्यों का उद्घाटन
करने में अज्ञेय की कहानियाँ अत्यंत सफल है । अज्ञेय की
कहानियों में मनुष्य की संस्कारगत, वर्गगत, समाजगत लाचारी का
चित्रण है, परंतु वे मार्क्सवादी चिंतन धारा पर विश्वास न करके
व्यक्ति के अपने अहं की सत्ता पर विश्वास करते हैं। डॉ.
इंद्रनाथ मदान अज्ञेय की कहानियों के विषय में अपना मत व्यक्त
करते हुए लिखते हैं-
‘अज्ञेय
की कहानियाँ, आधुनिक संवेदना, व्यक्ति चिंतन, यथार्थ, व्यष्टि
सत्य से अनुप्राणित होने का परिचय देती हैं।’
श्री उपेन्द्रनाथ अश्क ने सन् 1933 से
लिखना आरंभ किया था। उनकी कहानियों में प्रेमचंद एवं सुदर्शन
दोनों की शौलियों का सुंदर समन्वय है। अश्कजी ने अपनी कहानियों
के माध्यम से दैनिक जीवन की सामान्य समस्याओं का हास्य
व्यंग्यपूर्ण शैली में वर्णन-विश्लेषण किया है।
प्रेमचंद की परंपरा में सबसे सशक्त और
सफल कहानीकार श्री यशपाल हैं। उन्हें मार्क्सवादी चिंतन धारा
का प्रतिनिधि प्रवक्ता कहा जा सकता है। यशपाल ने अपनी कहानियों
के माध्यम से सामाजिक खोखलेपन को उजागर किया है। उनकी सामाजिक
एवं राजनैतिक कहानियों में विद्रोह का स्वर प्रबल है। उन्होंने
प्रेमचंद के सामाजिक यथार्थ को आगे बढ़ाने हुए सामाजवादी
यथार्थ को ग्रहण किया, इललिये उन्हें समाजवादी कथाकार भी कहा
जाता है, परंतु प्रेमचंद की कहानियों की तरह यशपाल की कहानियों
का अंत एक आदर्शात्मक निष्कर्ष के स्थान पर एक तीखे व्यंग्य से
होता है। इस तीखे व्यंग्य के माध्यम से उन्होंने सामाजिक
विसंगतियों पर कठोर प्रहार किये हैं। डॉ. हरिशंकर शुक्ल लिखते
हैं-
‘यशपाल
ने प्रेमचंद द्वारा स्थापित उन परंपराओं और मान्यताओं की रक्षा
की जो जैनेद्र की व्यक्तिवाद और इलाचंद जोशी के अंतर्द्वंद्व
के आकर्षक आवरणों में दृष्टि ओझल होती जा रही थी।’
इस प्रकार हम देखतें हैं कि तृतीय
उत्थान के अंतर्गत कहानी के क्षेत्र में मार्क्सवाद,
मनोविश्लेषणवाद एवं गांधीवाद का परोक्ष रूप से गहरा प्रभाव
पड़ा है। इन्हीं दिनों हिंदी काव्य जगत् में छायावाद की
प्रतिक्रिया के रूप में प्रगतिवाद का आर्विभाव हुआ ।
प्रगतिवादी दर्शन का मूल आधार कालमार्क्स के द्वंद्वात्मक
भौतिकवाद में निहित था। इसकी प्रमुख विशेषता थी आदि दैवीय तथा
आध्यत्मिक सत्ता में अविश्वास, शोषितों के प्रति सहानुभूति,
वर्ग संघर्ष की अनिवार्यता, जीवन के सामाजिक तथा आर्थिक पक्ष
प्रबल, धर्म, ईश्वर तथा भाग्य के प्रति अनास्था। इस प्रगतिवाद
के आर्विभाव ने कहानी के रचना स्वरूप को भी प्रकाशित किया
जिससे कालान्तर में नई कहानी के नाम से हिंदी कहानी के क्षेत्र
में एक क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ।
(4)
चतुर्थ उत्थान-(1947 से 1960 तक)
हिंदी कहानी का चतुर्थ उत्थान स्वाधीनता
के उपरांत प्रारंभ होता है। डॉ. सावित्री सिन्हा इस संबंध में
लिखती है - सन् 1950 के बाद का समय इस पुनरुत्थान का
उत्तरार्द्ध है, जो भारतीय इतिहास में लगभग तीस-चालीस वर्ष
पहले आरंभ हुआ था, और जिसकी परिणति मानवतावाद और विश्वबंधुत्व
की वैचारिक और काल्पनिक चेतना में हुई थी। वस्तुत स्वतंत्रता
प्राप्ति के उपरांत हिंदी साहित्य में एक सर्वथा नवीन प्रकार
की कहानी रचना, कथा तथा कथन दोनों दृष्टियों से स्वातंत्रय
पूर्व की अबोध, यशपाल तथा अश्य की कहानियों से सर्वथा भिन्न
है। इस स्वातंत्र्योत्तर के कहानीकारों ने हिंदी कहानी को
पुरानी तथा रूढ़ियों और नुस्खों से मुक्त करके उसे वास्तविकता
से जोड़ने का प्रयास किया, व परंपरागत मूल्यों, जीवन
पद्धतियों, रूढ़ संस्थानों तथा भौतिक मान्यताओं को अस्वीकृत
करके साहित्य के क्षेत्र में नये प्रतिमान स्थापित किये।
आचार्य नंद दुलारे बाजपेयी इस नई कहानी का वैशिष्ट्य बतलाते
हुए लिखते हैं-
‘आज
की कहानी वास्तविकता का सच्चा आभास देती है । पुरानी कहानी
उद्देश्य को प्रमुख मानकर विस्मयजनक कथा के सहारे अपने
उद्देश्य की व्यंजना कर देती थी। उपदेश दे डालती थी, किंतु
नवीन कहानी शैली या साधनों को सजाने में अधिक व्यस्त रहती है।
सच तो यह है कि वर्तमान कहानी अधिक कलापूर्ण और विश्वसनीय रूप
में अपना कार्य पूरा करती है।’
वस्तुतः स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत
अंतर्राष्ट्रीय और राष्टीय परिस्थितियाँ तेजी से बदलती चली
गईं। दो महायुद्धों की विभीषकाएं विभाजन और दिन दूनी रात
चौगुनी बढ़ती महँगाई के कारण पुराने मूल्य झूठे पड़ने लगे इसके
कारण कहानीकारों की दृष्टि में भी परिवर्तन हुआ भिन्न-भिन्न
दृष्टिकोणों से व्यक्ति और सामाजिक संदर्भों को देखा-परखा जाने
लगा नये-नये कथानक गढ़े जाने लगे और मानव के अंतर्मन के अछूते
प्रदेशों की व्याख्याएं प्रारंभ हो गई। जीवन को ईमानदारी से
प्रस्तुत कर देना ही कहानियों का प्रमुख लक्ष्य निर्धारित किया
गया। स्वतंत्रता के उपरांत देश की राजनीति वयस्क राजनेताओं के
हाथ में चली गई और देश का नवयुवक आर्थिक तंगहाली महसूस करने
लगा। सिन्हा लिखती है-
‘इतिहास
में शायद यह पहला अवसर था, जब मध्यम वर्ग के जागरूक युवा वर्ग
देश की सांस्कृतिक, राजनैतिक व्यवस्थाओं से बिलकुल कट गया।’
वास्तव में स्वातंत्र्योत्तर कहानी नई दृष्टियों में से किसी न
किसी रूप में अवश्य जुड़ी हुई है। डॉ. नामवर सिंह इस विषय में
लिखते हैं-
‘जीवन
और यथार्थ को पकड़ने के लिये एक युग में जो सूत्र ढूंढ़ा जाता
है, वह थोड़े ही दिनों में एक और मुर्दा फार्मूला साबित होता
है, और जीवन में गहरे जाने के लिये बेकार नहीं, बाधक हो जाता
है।’
स्वाधीनता के पूर्व प्रयोगवादी और
प्रगतिवादी यशपाल कहानी के प्रमुख स्तंभ माने जाते थे, परंतु
स्वाधीनता के उपरांत मूल्यों के बदल जाने से परिस्थितियाँ बदल
गयी । स्वतंत्रता के उपरांत नई-नई प्रतिभाएं सामने आने लगीं और
उन्होंने कहानी को भाषा, शिल्प और वस्तु के क्षेत्र में एक नया
मोड़ दिया । कहानी के उद्भव के विषय में श्री राजेंन्द्र यादव
लिखते हैं -
‘सन्
50 के आसपास से ही वैचारिक और एप्रोचगत स्वरूप के स्तर पर एक
नितांत नई तरह की कहानी हिंदी में आने लगी थी, भले ही उसका
नामकरण दो चार वर्षों बाद हुआ हो। तब से आज तक की कहानी को हम
नई कहानी के ही रूप में जानते हैं।’
कहानी के इस चतुर्थ उत्थान की सबसे बड़ी
विशेषता यह थी कि इसमें प्रत्येक कहानीकार ने अपने अपने परिवेश
के माध्यम से व्यक्ति के अंर्तमन का उद्घाटन करने का प्रयत्न
किया है, अतः इस उत्थान के अंतर्गत लिखी जाने वाली कहानियाँ को
दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है, एक तो वे कहानियाँ जो
उन लेखकों द्वारा लिखी गयी है, जो स्वतंत्रता के पूर्व कहानी
के क्षेत्र में स्थापित हो चुके थे, इनमें अज्ञेय, जैनेन्द्र,
यशपाल, अमृतराय, विष्णु प्रभाकर, उपेंद्रनाथ अश्क, भीष्म
साहनी, भैरव प्रसाद गुप्ता, राधाकृष्ण आदि हैं । दूसरे वर्ग
में उन लेखकों की कहानियाँ है, जिनका लेखन स्वतंत्रता के
उपरांत ही स्थापित हो पाया तथा जो नई कहानी के प्रवर्तक माने
जाते रहे हैं । इन नये कहानीकारों में प्रमुख हैं
–
श्री राजेंद्र यादव, कमलेश्वर, मोहन राकेश, शैलेष मटियानी,
फणीश्वर नाथ रेणु, डॉ. धर्मवीर भारती, निर्मल वर्मा, मन्नू
भंडारी, अमरकांत, राजकमल चौधरी, शिवाजी, श्रीकांत वर्मा,
मार्कण्डेय, शेखर जोशी आदि ।
नई कहानी के प्रवर्तन का श्रेय मोहन
राकेश, कमलेश्वर और राजेंद्र यादव को देते हैं । डॉ. सुरेश
सिन्हा नई कहानी के प्रवर्तन का श्रेय डॉ. राजेंद्र यादव को
देते हैं । डॉ. धनंजय वर्मा यादव जी के कहानी के विषय में
लिखते हैं
–
‘अपने
आपको पुरानी परंपरा से पृथक रखने या उसका विकास करने वाली एक
सायास और जागरुक चेतना राजेंद्र यादव में है । राजेंद्र यादव
की कहानियों में वर्तमान सामाजिक व्यवस्था के प्रति तीखा
आक्रोश अभिव्यक्त हुआ है । श्री मोहन राकेश की कहानियों में
सामाजिक जीवन की संश्लिष्ट परिस्थितियों के परिवेश में व्यक्ति
के आतंरिक और वाह्म जीवन का चित्रण किया गया है ।’
डॉ. इंद्रनाथ मदान उनका मूल्यांकन करते हुए लिखतें हैं-
‘मोहन
राकेश की कहानी कला में जीवन दृष्टि का नया स्वर हैं ।’
श्री
कमलेश्वर ने अपनी कहानियों के माध्यम से बीसवीं सदी में जीते
हुए व्यक्ति की सीमा परिस्थितियों में पूरी तरह डूबकर युग की
संवेदनों को वाणी दी है, उनकी पहली कहानी कामरेड 1951 में
प्रकाशित हुई थी ।
श्री धनंजय वर्मा उनकी कहानियों की
समीक्षा करते हुए लिखते हैं -
‘यथार्थ
परिवेश में उन्होंने आदमी की ज़िंदगी को बड़ी संजीदगी से देखा
परखा है, और खुले रूप में कहानियों में उपस्थिति किया है ।’
श्री फणीश्वर नाथ रेणु ने प्रमुख रूप से
अपनी कहानियों में आँचलिक जीवन के चित्र प्रस्तुत किये हैं ।
उनकी पहली कहानी बटबाबा 1946 में
‘कहानी’
पत्रिका में प्रकाशित हुई । डॉ.इंद्रनाथ मदान उनकी कहानियों का
विवेचन करते हुए लिखते हैं -
‘रेणु
ने आँचलिकता के परिवेश में नवस्वच्छंदतावाद के धरातल पर
आधुनिकता को अभिव्यक्ति दी है ।’
रेणु के उपरांत आंचलिक कथाकारों में
श्री शैलेश मटियानी का नाम महत्वपूर्ण है, उनकी कहानियों में
कर्मांचल के जीवन को अभिव्यक्ति मिली है, श्री धनंजय वर्मा
मटियानी जी की कहानियों पर अपना मत देते हुए लिखते हैं-
‘मटियानी
की कहानियों में वैविध्य है, ज़िंदगी के हर क्षेत्र का नज़दीकी
ज्ञान है । अनुभूत यथार्थ को रचनात्मक संदर्भ देने में
कहानीकार समाज की स्वीकृतियों के बोध से संयुक्त है ।’
महिला कथाकारों में श्रीमती मन्नू
भंडारी चतुर्थ उत्थान के काल की प्रतिनिधि महिला लेखिका है ।
मन्नू भंडारी ने नर-नारी जीवन का चित्रण उसके पारिवारिक और
सामाजिक परिवेश को ध्यान में रखकर किया है । उनका दृष्टिकोण
विशुद्ध यथार्थवादी है, उन्हें भ्रम और सेक्स के दोहरे जटिल
शोषण के संस्कारों के ज्ञान में, नारी के स्वतंत्र एवं मौलिक
व्यक्तित्व को कहानियों के माध्यम से अन्वेषित करने का प्रयत्न
किया है ।
स्वातंत्र्योत्तर कहानी की एक बड़ी
उपलब्धि यह है कि इसमें चतुर्थ उत्थान के अंतर्गत व्यंग्य की
बौद्धिकता को स्वीकार किया गया और व्यंग्यात्मक कहानियाँ लिखना
प्रारंभ किया गया । व्यंग्य की बौद्धिकता को उजागर करने का
श्रेय हरिशंकर परसाई जी को है । परसाई जी, ने 1994 से कहानी
लिखना प्रारंभ कर दिया था, परंतु व्यंग्य कहानियों के श्रेत्र
में उनका मूल्यांकन 1955 के उपरांत ही हुआ । उनकी कहानियाँ
सामाजिक जीवन की विश्रृंखलताओं और असंगतियों पर करारी चोट करती
है। श्री कमलेश्वर के शब्दों में
‘परसाई
जी की हर कृति जीवन के यथार्थ की कृति है ।’
श्री धर्मवीर भारती मार्कण्डेय, अमरकांत, राजकमल चौधरी, निर्मल
वर्मा एवं श्रीकांत वर्मा इस उत्थान के अन्य महत्वपूर्ण
कहानीकार हैं । श्री धर्मवीर भारती की कहानियों में समाज के
परंपरागत और अधुनातन मूल्यों के बीच संघर्ष का चित्रण
अभिव्यक्त हुआ है । डॉ. देवीशंकर अवस्थी डॉ. धर्मवीर भारती की
कहानियों
की समीक्षा करते हुए लिखते हैं
-
‘भारती
की कहानियों का संसार उसी पुराने का बढ़ाव है, जो पिछले पचास
वषों से हिंदी कहानी में व्यक्त होता आया है ।’
श्री मार्कण्डेय की कहानियाँ ग्राम्य
जीवन पर आधारित है । श्री अमरकांत जी का कहानी लेखन भी इसी
उत्थान के अंदर विकसित हुआ है । उनकी कहानियों में सामाजिक
व्यवस्था के प्रति, गहन आक्रोश अभिव्यक्त हुआ है । श्री निर्मल
वर्मा की कहानियों में नवस्वच्छंतावादी दृष्टि है, परंतु उनकी
कहानियों का परिवेश विदेशी है । इन कहानीकारों के अतिरिक्त और
बहुत से नाम हैं, जिन्होंने चतुर्थ उत्थान के अंतर्गत हिन्दी
कहानी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया । श्री शिवप्रसाद
सिंह, शरद जोशी, रामकुमार, नरेश मेहता, हिमाँशु जोशी, मनहर
चौहान तथा शानी के नाम इस दृष्टि से उल्लेखनीय है ।
(5) पंचम उत्थान- (सन् 11960 से उपरांत)
सन् 1960 के बाद जो नई पीढ़ी अपने सशक्त
स्वर को लेकर हिन्दी कहानी के क्षेत्र में उतरी, उसमें
श्रीकांत वर्मा, दूधनाथ सिंह, रमेश वक्षी, ज्ञानरंजन गिरिराज
किशोर, महीपसिंह, रवीन्द्र कालिया, पानू खोलिया, कैलाश नारद,
गंगा प्रसाद विमल, विजय चौहान, कृष्णा सोवती, महेंद्र भल्ला,
गुरुवचन सिंह, कृष्ण बलदेव वैद आदि को इस उत्थान का प्रमुख
कहानीकार माना जा सकता है ।
सन् साठ के बाद नई कहानी के समानान्तर
दो और आंदोलनों का उद्भव स& |