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वर्ष-2, अंक-20, जनवरी, 2008

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।। त्रिलोचन अंक।।

 

 

सॉनेट का पथ


ध्रव शुक्ल

 

सॉनेट-इटेलियन शब्द sonetto का लघु रुप है । यह धनु के साथ गायी जाने वाली कविता है। ऐसी छोटी धुन जो मेण्डोलिन या ल्यूट (एक प्रकार का तार वाद्य) पर गायी जाती है। सॉनेट का जन्म कहाँ हुआ, यह कहना अनिश्चित-सा है । पर कुछ शोधकर्त्ताओं का यह मानना है कि सॉनेट ग्रीक epigram (सूक्तियों) से जन्मा होगा, लेकिन इसे पूरी तरह स्वीकार नहीं किया जाता। प्राचीन काल में epigram  का उपयोग एक ही विचार या भाव को अभिव्यक्त करने के लिए होता था । कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इंग्लैण्ड और स्कॉटलैण्ड में प्रचलित बैले से पहले भी सॉनेट का अस्तित्त्व रहा है।

 

ग्रीक epigram  इटैलियन सॉनेट के बहुत करीब जान पड़ता है । यह मान्यता भी प्रचलित है कि प्राचीन ode  (सम्बोधिगीत) का ही यह इटैलियन छायारुप है । यह सम्भावना भी प्रकट की जाती है कि सॉनेट का जन्म सिसली में हुआ होगा और इसे जैतून के वृक्षों की छँटाई करते समय गाया जाता था ।

 

सॉनेट का वास्तविक स्वरुप तेरहवीं शती के मध्य में प्रकट हुआ । इस अवधि की कविताएँ इटली के मिलान शहर में संग्रहीत की गयी हैं । सॉनेट जैसी इन कविताओं में लोक बोली का प्रयोग किया गया है । इन्हें इटली के अनेक प्राचीन कवियों ने रचा है ।

 

तेरहवीं सदी में पूरी दक्षता के साथ फ्रॉ गुइत्तोन (Fra Guittone) ने सॉनेट्स की रचना की जो सॉनेट के प्रणेता माने जाते हैं । इसके बाद इटली के पेट्रार्का (Fra Guittone) ने सॉनेट रचे । इस समय सॉनेट के स्वरुप निर्धारण को लेकर गम्भीर प्रयोग भी किये गये । किन्तु गुइत्तोन के सॉनेट ही आदर्श रुप में प्रस्तुत किये जाते रहे । पेट्रार्का और दान्ते ने गुइत्तोनियन सॉनेट में बदलाव भी किये । बाद में इसे तासो (Tasso) और इटली के अन्यान्य कवियों ने अपनाया और सॉनेट इटली की विरासत बन गया ।

 

कालान्तर में सॉनेट को फ्रांस के पूर्व कवियों तथा इग्लैण्ड में सरे (Surrey) और (Spenser) ने अपनाया लेकिन इस विधा में फ्रांस के कवियों का कोई महत्वपूर्ण योगदान नहीं रहा । स्पहानी कवियों ने भी सॉनेट लिखे । जर्मनी में भी पेट्रार्कन शैली के सॉनेट रचे गये और धीरे-धीरे अँग्रेज़ी के सॉनेट को मौलिक मानने की धारणा भी बनती गयी । इसे स्पेन्सर के अलावा सिडनी, शेक्सपियर, मिल्टन, वर्ड्सवर्थ, और कीट्स ने रचा । कहते हैं कि इटली में तो अब सॉनेट का शरीर ही रह गया है, वह तो कहीं और ध्यानावस्थित है ।

 

इटली के कवि केपल लॉप्ट ने सॉनेट की खोज के लिए फ्रॉ दुइत्तोन को काव्य साहित्य का कोलम्बस कहा है। चौदहवीं शती इटली के सॉनेट अपने परिपक्व रूप में स्थापित हो चुका था, जिसका श्रेय फ्रॉ गुइत्तोन को ही जाता है।

 

गुइत्तोन ने सॉनेट की जो संरचना निर्धारित की उसमें दो भाग होते हैं। पहली अष्टपदी () और दूसरी पष्ठपदी() कहलाती है। इस प्रकार कुल चौदह चरण बनते हैं। अष्टपदी में पहली से चौथी की, चौथी से पाँचवीं की ओर पाँचवीं से आठवीं पंक्ति की तुक मिलायी जाती है। इसी तरह दूसरी से तीसरी की, तीसरी से छठवीं की और छठवीं से सातवीं पंक्ति की तुक मिलती है। इस व्यवस्था में सुसंगत समस्वरता प्राप्त होती है। दो तुकों के बीच कोई खटपट न होने से मनोहरी ध्वनि सन्तुलन पैदा होता है। जैसे कोई शान्त लहर किनारे से कुछ दूर जाकर फिर लौट आती है।

 

षष्ठपदी में प्रायः पहली से चौथी की, दूसरी से पाँचवीं की ओर तीसरी से छठवीं पंक्ति की तुक मिलायी जाती है। यह तीन-तीन चरणों में विभाजित रहती है। इसकी तुकान्त योजना में कुछ भिन्नताएँ भी हो सकती हैं। गुइत्तोन के अलावा पेट्रार्का ने भी इसके लिये तीन तुकें निर्धारित की हैं। लेकिन इटली के कुछ सॉनेट रचनाकारों ने दो तुकों को अधिक प्रभावशाली माना है। वे आपस में इस तरह जुड़ी हुई हों जैसे ज्योति में पीली और उसी से लिपटी बैगनी प्रभा आलोकित होती है।

 

इटैलियन सॉनेट की संरचना में अंतिम द्विपदी की तुक मिलाने की सम्भावना क्षीण है जिबकि अँग्रेज़ी सॉनेट  में यह तुक बखूबी मिलायी जा सकती है और भावों के अनुरूप चरणों की व्यवस्था भी सहजता के साथ की जा सकती है। अँग्रेज़ी कवियों ने जो सॉनेट गुइत्तोन की तरह लिखे हैं, वे द्विपदी से समाप्त होने पर कमजोर सिद्ध हुए है। इसमे सिर्फ़ शेक्सपियर अपवाद हैं।

 

सॉनेट  को विशेष रूप से तीन आयामों में देखा-परखा गया है-

1.       आकृति की विशिष्टता

2.       भाव की विशिष्टता के साथ वैयक्तिक अभिव्यक्ति।

3.       सर्वांगपूर्णता, कल्पना, प्रेरणा और माधुर्य।

इटली में प्रमुखतः सॉनेट  के पाँच रूप भेद मिलते हैं-

1. Twelve-syllabled lines- इसे द्वादश मात्रिक चरण का सॉनेट कह सकते हैं । इसमें एक पंक्ति में द्वादश मात्रिक ध्वनियाँ होती हैं। और एक पंक्ति दूसरी पंक्ति में फिसलती हुई आगे बढ़ते है। स्वर पर जोर नहीं होता, अन्त्याक्षर से तुक मिलायी जाती है।

 

2. Caudated or Tailed - इसे पुच्छल सॉनेट कह सकते हैं। इसमें दो या पाँच या इससे अधिक प्रक्तियों का अनपेक्षित विस्तार होता है ।

 

3.Mute- इसे मुक सॉनेट कहना उचित होगा या नहीं ? पर यह एकाक्षरी तुकान्त वाला सॉनेट हास्य और व्यंग्य के लिए उपयुक्त होता है। इसमें परिहास के लिए दो अक्षर के तुकान्त भी होते हैं।

 

4.       Linked or Interlaced- इसे अन्तर्ग्रथित सॉनेट कह सकते हैं। इसमें कोई कथा, भाव या विचार संगुम्फित होता है।

5.       Conutinuous or Iterating- इसे अविच्छिन्न सॉनेट कह सकते हैं। इसमें ज़्यादातर सप्रवाह एक ही तुक की पुनरावृत्ति होती है और कभी दो तुकें भी मिलायी जाती हैं।

 

फ्रॉ गुइत्तोन ने यह स्थापित किया कि सॉनेट की प्रत्येक पंक्ति में दस मात्रिक ध्वनियाँ होना चाहिए। यह माधुर्य की निरन्तरता के लिए आवश्यक है। गुइत्तोन और उसके पहले के सॉनेट  रचनाकारों ने Guido Bonatti द्वारा ग्यारहवीं सदी में स्थापित सांगीतिक अनुशासन को अपनाकर सॉनेट की संरचना को गढ़ा । पर गुइत्तोन अंध भक्त नहीं था, वह एक प्रयोगशील कवि भी था। उसका मानना था कि कोई भी सॉनेट  लेखक अपनी सांगीतिक पद्धति भी बना सकता है।

 

सर्वविदित है कि चौदहवीं शती तक सॉनेट  अपनी परिपक्व अवस्था में इटली में स्थापित हो चुका था। लगभव एक सदी के अन्तराल के बाद आगे जाकर सोलहवीं सदी में Thomas wyat और Henry Howord (सरे) ने सबसे पहले अँग्रेज़ी में सॉनेट लिखे । ये दोनों कवि किसी समय इटनी में निवास कर चुके थे और ये पेट्रार्का की कविताओं से प्रभावित हुए। यह भी उल्लेखनीय है कि स्पेन्सर, मानलोव और शेक्सपियर के सॉनेट की सुन्दरता का कारण भी इतालवी स्त्रोत ही रहे हैं।Thomas wyat इटैलियन मॉडल को अपना कर सॉनेट  लिखते रहे परन्तु Henry Howord को इससे सन्तोष नहीं हुआ । उन्होंने चौदह पंक्तियों की इतालवी संरचना के साथ एक संगीतकार की तरह निरन्तर प्रयोग किये और अपने अपने सॉनेट्स में दो तुकान्त वाली व्यवस्था अपनायी। यह व्यवस्था अँग्रेज़ी भाषा के लिए अधिक उपयुक्त थी-

 

A-b-A-b

C-D-C-D

F-F-F-F

G-G

स्पेन्सर ने सॉनेट को परिवक्व अभिव्यक्ति दी है लेकिन वे व्याट और हावर्ड के चतुष्पदों से संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने लगातार प्रयोगशील रहकर सॉनेट के अँग्रेज़ी और इतालवी, दोनों रूपों में परिवर्तन किया। इसी बदले हुए सॉनेट  रूप के साथ उन्होंने अपने प्रेम सॉनेट Amoretti शीर्षक से लिखे। पर अँग्रेज़ी में स्पेन्सर का सॉनेट संक्रमण की स्थिति में ही रहा। स्पेन्सर के समकालीन इससे बहुत प्रभावित नहीं हुए। स्पेन्सर के बाद एलिजाबेथ काल में सॉनेट लेखकों का हुजूम उमड़ पड़ा। फिलिप सिडनी ने इन्हें पूर्णता और सुन्दरता प्रदान करने में योगदान दिया। पर इसका चरमोत्कर्ष शेक्सपियर की सॉनेट रचनाओं में ही हुआ । मिल्टन के सॉनेट  चारित्रिक रूप से अष्टपदी और षष्टपदी के बीच नैरन्तर्य के लिए जाने जाते हैं। इन तीनों कवियों के सॉनेट  इतालवी स्वरूप से भिन्न हैं। हालांकि इनमें अष्टपदी और षष्टपदी के बीच अक्सर अन्तराल दिखाई पड़ता है लेकिन दोनों बँटे हुए नहीं है।

 

शेक्सपियर के सॉनेट अष्टपदी और षष्टपदी के बजाय तीन चतुष्पदियों और एक द्विपदी लय से बँधे हैं। भले शेक्सपियर के समकालीनों ने सॉनेट लिखे हों पर सॉनेट को साहित्यिक गरिमा शेक्सपियर ने ही दी है। सॉनेट संगीतज्ञ रोजेटी कहते हैं कि- कोई भी सॉनेट परिपूर्ण है यदि उसे शेक्सपियर ने रचा है।

 

 

स्पेन्सर ने इटैलियन और आरंभिक अँग्रेज़ी सॉनेट संरचनाओं को मिलाकर नया सॉनेट फॉर्म तैयार किया। जिसे शेक्सपियर और मिल्टन ने नहीं अपनाया क्योंकि इसमें छांदिक स्वान्त्रय नहीं था। जैसे पेट्रार्का के लिए गुइत्तोन ने मार्ग बनाया उसी तरह शेक्सपियर ने, सरे स्पेन्सर और सिडनी के रचे सॉनेट्स को मार्गदर्शक के रूप में देखा। दरअसल डेनियल और ड्राइटन के सॉनेट ने वह ढाँचा तैयार किया जिसे शेक्सपियर ने अपनाया।

 

पैट्रर्का का सॉनेट उस हवा की तरह है जो उठकर धीरे-धीरे शांत होती है। जैसे कोई धुन धीरे-धीरे तिरोहित हो रही हो। पेट्रार्का की मान्यता थी कि सॉनेट का अन्त शुरूआत से अधिक लयात्मक होना चाहिए।

 

शेक्सपियर के सॉनेट के बाहर चरण गर्म लोहे की उस छड़ की तरह है जिसे लुहार लगातार घन से पीटता रहता है और अंत में द्विपदी इस तरह आती है कि जैसे आखिरी घन की चोट से गर्म लोहा कोई रूप पा गया हो।

 

उपरोक्त विवेचन के पश्चात् सॉनेट रचना की चार कोटियाँ निर्धारित की जा सकती हैं-

1.       पेट्रर्कन

2.       स्पेन्सरियन

3.       शेक्सपीरियन

4.       मिल्टानिक

हिन्दी में सॉनेट बीसवीं सदी में आया। इसे हिन्दी के कुछ कवियों ने अपनाया। पर वह इनके कविता कर्म के केन्द्र में नहीं रहा। त्रिलोचन जी ही एकमात्र कवि हैं जो बीसवीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर इक्कीसवीं सदी में प्रवेश करते हुए सॉनेट के पथ पर दौड़े चले आ रहे हैं-

 

इधर त्रिलोचन सॉनेट के ही पथ पर दौड़ा

सॉनेट सॉनेट सॉनेट सॉनेट क्या कर डाला

वह उसने भी अजब तमाशा। मन की माला

गले डाल ली। इस सॉनेट का रस्ता चौड़ा

अधिक नहीं है। कसे कसाये भाव अनूठे

ऐसे आयें जैसे किलों आगरों में जो

नग है, दिखलाया है पूरे ताजमहल को।

गेय रहे, एकान्विति हो। उसने तो झूठे

ठाट-बाट बाँधे हैं। चीज़ किराये की है।

स्पेंसर, सिडनी, शेक्सपियर, मिल्टन की वाणी

वडर्सवर्थ, कीट्स की अनवरत प्रिय कल्याणी

स्वरधारा है। उसने नई चीज़ क्या दी है

सॉनेट से मज़ाक भी उसने ख़ूब किया है,

जहाँ तहां कुछ रंग व्यंग का छिड़क दिया है।

-दिगन्त, कविता संग्रह से

त्रिलोचन जी के अब तक प्रकाशित सॉनेट्स की संख्या कुल 530 है। दिगन्त, शब्द, फूल नाम है एक, उस जनपद का कवि हूँ और अनकहनी भी कुछ कहनी है, ये पाँच उनके सॉनेट संग्रह हैं। महाकुम्भ पर लिखे गये उनके सॉनेट अरघान कविता संग्रह में मिलते हैं । तुम्हें सौंपता हूँ और ताप के ताये हए दिन कविता संग्रहों में भी कुछ सॉनेट संग्रहीत हैं ।

 

सॉनेट के जितने रूप भेद स्थिर किये गये हैं प्रायः उन सभी को त्रिलोचन जी ने आज़माया है । पर ज़्यादातर सॉनेट उन्होंने पेट्रार्कन और शेक्सपीरियन शैली के ही लिखे हैं।

 

फ्रॉ गुइत्तेन के सॉनेट के माधुर्य और उसके संरचनात्मक नैरन्तर्य के लिए प्रत्येक चरम में दस मात्रिक ध्वनियाँ निर्धारित की थीं। बाद में द्वादश मात्रिक ध्वनियाँ निर्धिरित की गयीं। त्रिलोचन जी के सॉनेट के प्रत्येक चरण में चौबीस मात्रिक ध्वनियाँ पायी जाती है जिसे हिन्दी में रोला छन्द कहते हैं।

 

रोला मात्रिक छन्द है और जो चौबीस मात्राओं का होता है। यह मात्रिक सम छन्द है। इसके चारों चरमों में मात्राओं का क्रम समान होता है। इसके प्रत्येक चरण में ग्यारह और तेरह के विश्राम में चौबीस मात्राएँ होती हैं।

 

त्रिलोचन जी सॉनेट रचना में पूरे वाक्य को अपनाते हैं और वाक्य एक चरण से दूसरे चरण में फिसलते हुए चलते हैं। त्रिलोचन जी रोला छन्द के चौबीस मात्रिक अनुशासन को तो अपनाते हैं किन्तु वहाँ कुछेक अपवादों को छोड़कर प्रत्येक चरण में ग्यारह और तेरह पर विश्राम नहीं है। यह यदि भंग भी नहीं है, निरन्तर चौबीस मात्रिक लय है जो सॉनेट के चौदहवें चरण में जाकर ही विश्राम पाती है। अनेक अष्टपदियों के चौथे और आठवें चरणान्त पर विश्राम आता है। कुछेक षष्ठपदियों के तीसरे चरणान्त पर भी विश्राम की झलक उनके सॉनेट्स में मिलती है। इसी तरह बारहवें चरणान्त पर भी विश्राम आता है और फिर द्विपदी आती है। द्विपदी में भी कुछेक अपवादों को छोड़कर पहला चरण दूसरे में फिसलकर ही विश्रान्ति पाता है।

 

सॉनेट इतालवी आभिजात्य के वातावरण में ही रचा गया। वह एक नागर काव्य रचना है जिसे अँग्रेज़ी के उच्चकोटि के कवियों ने भी अपनाया। पेट्रार्का ने उसे करुणा का और स्पेन्सर ने उसे प्रेम का मूल्य दिया। शेक्सपियर ने उसे निवैयक्तिकता से मुक्त किया। मिल्टन ने अपनी प्रिया की मृत्यु पर उससे विछुड़ने की पीड़ा को सॉनेट के माध्यम से ही प्रकट किया।

 

त्रिलोचन जी के सॉनेट भाव, विचार, कथा, चरित्र-चित्रण और दर्शन की भूमियों पर रखे गये हैं। जो गोचर है वह तो यहाँ दृश्यमान है ही, अगोचर भाव रूपों की छाया भी है-

 

चौदह चरणों में मैंने चौदह भूवनों को

यथा शक्ति नापा है। यह केवल बातूनी

की बकवास नहीं है। समझ के लिए दूनी

शक्ति चाहिए। दौं दौं गिरते हुए घनों को

क्या मालूम, निहाई में कितनी दृढ़ता है।

भूमि गर्भ में कसमसा रही जो ज्वाला,

धवलधाम अभ्रंकष हों या पर्वत माला,

कभी किसी को कब गिनती है। यदि चिढ़ता है

क्षुद्र मनुष्य अहंकृति-हुंकृति में अपनी तो

क्या कर लेगा। विश्व यथाक्रम चला जा रहा,

संस्कृति-स्त्रोत इसी  छाया मे ढला जा रहा,

सबको ही हैं नयीं तपस्याएँ तपनी तो।

जो जो गोचर रहे चराचर वे सब आए

और अगोचर भाव रूप छाया से छाए।

-अनकहनी भी कुछ कहनी है, से

उपरोक्त सॉनेट पर गौर करें तो स्पष्ट होगा कि त्रिलोचन जी ने सिर्फ़ हिन्दी खड़ी बोली से ही सॉनेट नहीं रचे हैं, उनके पास संस्कृत और अवधी की भी शब्द सम्पदा है। जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है कि सॉनेट इतालवी और अँग्रेज़ी के आभिजात्य में पली-बढ़ी रचना है, उसे त्रिलोचन जी ने ईंट बनाने के साँचे की खोज में उन्होंने संस्कृत और हिन्दी के छन्दों के साथ सॉनेट को भी अपने लिए सिद्ध किया है जिसमें सबकी बोली-ठोली, लाग-लपेट, टेक, भाषा,मुहावरा, भाव, आचरण और भोली-भूली इच्छाएँ समाहित हैं । आवारा, गृही, सभ्य-असभ्य, शहराती और देहाती, सभी तरह के मनष्यों को त्रिलोचन जी अपने चौदह चरणों के काव्य गृह में सादर निमंत्रित करते हैं

महल खड़ा करने की इच्छा है शब्दों क&#