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सृजनगाथा
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वागर्थ प्रतिपत्तये
वर्ष-2, अंक-20, जनवरी, 2008
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।। कविता ।।
किताब
उस तरह मैं नहीं पढ़ सका
जिस तरह चाहिए इस किताब में लिखी इबारत यह किताब जैसी भी बनी हो जिस किसी भी भाषा में लिखी गयी हो लेकिन जब कभी पढ़ी जाएगी बहुत कुछ विलुप्त हो जाएगा मैं ही कभी गा-गा कर पढ़ने लगूँगा कभी अटक-अटक कर मैं ही बदल दूँगा उद्दण्तापूर्वक कभी कुछ हँसने लगूँगा इस तरह शब्दों के हिज्जे लिखे देख कर बहरहाल उस तरह नहीं पढ़ूँगा जिस तरह चाहिए बदल-बदल कर पढ़ने से किताब का कुछ भी नष्ट नहीं होगा बच जाएगा जितना बच सकता है।
नंद चतुर्वेदी
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हिंदी कविता
- नंद चतुर्वेदी
- शरद रंजन शरद
- शीला गुजराल
- डॉ. राजेन्द्र सोनी
संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति
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