vbn

SRIJANGATHA.COM

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच

सृजनगाथा

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-20, जनवरी, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। त्रिलोचन अंक।।

 कविता क्रम

 
2

बादल घिर आए

 नवजीवन के सिंहद्वार पर

फूलों भरी राह मिलती कहाँ है

मैं दीप जलाती हूँ

राका आई

शरद का यह नीला आकाश

दीप जलाओ

हरा भरा संसार है

अनोखी यह परिचित मुस्कान

हो गया मुझको विश्वास

गाओ गाओ गान

श्वास श्वास में गान

गान बन कर प्राण

आँसुओं में इस हृदय का

कब कटी है

तुम चले, चलते रहे

एक मधु मुसकान से

आ गई है रात

व्यूह बनते है दलों के

जो उठाई है ध्वजा

कौन विजयी है

अभी चला क्या

मुझको संदेश मिला है

मुझे बुलाता है पहाड़

सो गया था दीप

जोत नई उकसाओ

फूल देखा विजन में

खो गई थी गूँज

आ रही है दूर की

  स्निग्ध श्याम घन की छाया है

जब देखा सौंदर्य

मैं तुम्हें फिर फिर पुकारूँ

हे अनन्यगीत

स्नेह मेरे पास है

चाँदनी रात, नीरव तारे

मैंने भूलों पर भूले की

जीवन स्मृति के पथ

याद रहेगा

उषा आ रही है

न जाने हुई बात क्या

मुझे लगता है

धीरे धीरे पुरवैया लहराने लगी

संभावनाएँ

आई जो हार

अभिनंदन

मैं तुम्हारा

बीन बजाओ

आँसू बाँधे है मैंने

मैं क्या क्या

दियना छू के तुम जगा दो

तूने आई लुटा दी अबोध

गाओ वही गीत कल के

 सबका अपना आकाश

गीत संग्रह

(त्रिलोचन)

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google