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सृजनगाथा

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-20, जनवरी, 2008

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।। त्रिलोचन अंक।।

 सबका अपना आकाश (गीत संग्रह)

 कविता क्रम

 
2

 

जोत नई उकसाओ

 

जोत नई उकसाओ पैर बढ़ाओ

 

देश देश की जनता आगे आई

देश देश की ध्वजा साथ फहराई

देश देश की गीत धार लहराई

पनी ध्वजा उठाओ गान गुँजाओ

 

देश देश की स्वतंत्रता मिल जाए

देश देश को प्राणशक्ति मिल जाए

देश देश मे मनुष्यता खिल जाए

नई मशाल जलाओ हर्ष मनाओ

 

कहीं एक भी दुःख न रहने पाए

अपना सत्य नागरिक कहने पाए

द्वंद्वरहित धारा में बहने पाए

इतना कर दिखलाओ स्वर्ग सजाओ

 

नई उषा आई है आज जगाने

हृदय हृदय में फूल नवीन लगाने

सब मनुष्य अपने हैं, नहीं बिराने

मन को शुद्ध बनाओ आगे आओ

 

  (रचना-काल - 06-11-48)

 ◙◙◙

 

बादल घिर आए

 नवजीवन के सिंहद्वार पर

फूलों भरी राह मिलती कहाँ है

मैं दीप जलाती हूँ

राका आई

शरद का यह नीला आकाश

दीप जलाओ

हरा भरा संसार है

अनोखी यह परिचित मुस्कान

हो गया मुझको विश्वास

गाओ गाओ गान

श्वास श्वास में गान

गान बन कर प्राण

आँसुओं में इस हृदय का

कब कटी है

तुम चले, चलते रहे

एक मधु मुसकान से

आ गई है रात

व्यूह बनते है दलों के

जो उठाई है ध्वजा

कौन विजयी है

अभी चला क्या

मुझको संदेश मिला है

मुझे बुलाता है पहाड़

सो गया था दीप

जोत नई उकसाओ

फूल देखा विजन में

खो गई थी गूँज

आ रही है दूर की

  स्निग्ध श्याम घन की छाया है

जब देखा सौंदर्य

मैं तुम्हें फिर फिर पुकारूँ

हे अनन्यगीत

स्नेह मेरे पास है

चाँदनी रात, नीरव तारे

मैंने भूलों पर भूले की

जीवन स्मृति के पथ

याद रहेगा

उषा आ रही है

न जाने हुई बात क्या

मुझे लगता है

धीरे धीरे पुरवैया लहरानेलगी

संभावनाएँ

आई जो हार

अभिनंदन

मैं तुम्हारा

बीन बजाओ

आँसू बाँधे है मैंने

मैं क्या क्या

दियना छू के तुम जगा दो

तूने आई लुटा दी अबोध

गाओ वही गीत कल के

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