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सृजनगाथा

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-20, जनवरी, 2008

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।। त्रिलोचन अंक।।

 सबका अपना आकाश (गीत संग्रह)

 कविता क्रम

 
2

 

श्वास श्वास में गान

 

श्वास श्वास में गान भर दिया

गान गान में इस जीवन का

हर्ष शोकमय ध्यान भर दिया

 

तुमने ही तो पास बुलाया

मुसका कर नूतन जीवन भर

अनुभव का सागर दिखलाया

उमड़ रही थीं तान-तरंगें

प्राण प्राण की सजग उमंगें

मुग्ध तटस्थ पड़ा था यों ही

तुम ने नव आह्वान भर दिया

 

एक एक से बढ़ कर गायक

नव जीवन रच देने वाले

गान विश्व के कृती विधायक

कल्लोलित जिन की स्वर धारा

प्राण प्राण का बनी सहारा

फिर भी एक अकिंचन में क्यों

तुम ने स्वर संधान भर दिया

 

यह भी एक तुम्हारी लीला

नयन नयन के छवि संग्रह में

जगत्प्राण सी विहरणशीला

कब कुछ और कहाँ हो पाया

तम्हें घटित करना जो भाया

मिट्टी के पुतले में तुम ने

एक दिव्य अभिमान भर दिया

  (रचना-काल - 30-10-48)

 ◙◙◙

 

बादल घिर आए

 नवजीवन के सिंहद्वार पर

फूलों भरी राह मिलती कहाँ है

मैं दीप जलाती हूँ

राका आई

शरद का यह नीला आकाश

दीप जलाओ

हरा भरा संसार है

अनोखी यह परिचित मुस्कान

हो गया मुझको विश्वास

गाओ गाओ गान

श्वास श्वास में गान

गान बन कर प्राण

आँसुओं में इस हृदय का

कब कटी है

तुम चले, चलते रहे

एक मधु मुसकान से

आ गई है रात

व्यूह बनते है दलों के

जो उठाई है ध्वजा

कौन विजयी है

अभी चला क्या

मुझको संदेश मिला है

मुझे बुलाता है पहाड़

सो गया था दीप

जोत नई उकसाओ

फूल देखा विजन में

खो गई थी गूँज

आ रही है दूर की

  स्निग्ध श्याम घन की छाया है

जब देखा सौंदर्य

मैं तुम्हें फिर फिर पुकारूँ

हे अनन्यगीत

स्नेह मेरे पास है

चाँदनी रात, नीरव तारे

मैंने भूलों पर भूले की

जीवन स्मृति के पथ

याद रहेगा

उषा आ रही है

न जाने हुई बात क्या

मुझे लगता है

धीरे धीरे पुरवैया लहरानेलगी

संभावनाएँ

आई जो हार

अभिनंदन

मैं तुम्हारा

बीन बजाओ

आँसू बाँधे है मैंने

मैं क्या क्या

दियना छू के तुम जगा दो

तूने आई लुटा दी अबोध

गाओ वही गीत कल के

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