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साहित्यकारों की दावत
सुनील दीपक
जीवन की एक बात से दूसरी बात किस तरह जुड़ी होती है!
छोटी सी बात जो
उस
समय विषेश महत्वपूर्ण नहीं लगती,
एक दिन अचानक कुछ बड़ा कर देती है
।ऐसी ही छोटी सी बात
थी
मेरी जहूर से मुलाकात।
जहूर अहमद ज़रगार कश्मीरी हैं,
भारत में
उनका कारोबार था पर जब कश्मीर में स्थिति बिगड़ी तो वह अपनी
इतालवी पत्नी और बच्चों
के साथ इटली में आ गये
।
यहाँ वह उत्तरी इटली
में फ्राँस की सीमा की ओर के शहर सवोना में रहते हैं।
पिछले वर्ष जहूर नें पत्नी रेनाता के साथ मिल कर भारतीय
लोककथाओं पर आधारित
एक किताब लिखी जिसकी समीक्षा के लिए प्रकाशक ने मुझसे सम्पर्क
किया
।
इस तरह मेरा जहूर से सम्पर्क हुआ।
संयोग से उन्हीं दिनों जहूर को हमारे शहर बोलोनिया
में आना था तो उनसे मुलाकात का मौका मिला
।
जहूर बहुत अच्छे लगे।
उनके बात करने में
शिष्टता और सभ्यता दोनों झलकते हैं,
उर्दू और
पंजाबी से मिली जुली उनकी भाषा बहुत मीठी लगती है
।
जब जाने लगे तो कहा कि वह जब भी बोलोनिया वापस आयें,
मुझे सूचित करना न भूलें और अगर मुझे उनके शहर
सवोना की तरफ़ आने का मौका मिलेगा तो उनको मिलने अवश्य आऊँगा
।
फ़िर एक बार टेलीफ़ोन पर भी बात हुई पर दोबारा
मिलना नहीं हुआ।
सवोना इतना दूर है यहाँ
से,
आठ या दस घँटे की रेल यात्रा चाहिये वहाँ
पहुँचने के लिए,
तो शायद इतनी दूरी से नयी मित्रता बनाना आसान नहीं!
फ़िर अचानक कुछ सप्ताह पहले जहूर से एक अन्य तार जुड़ गया।
सवोना की ओर के शहर टूरिन में भारतीय साहित्यकारों
की गोष्ठी आयोजित करने का निर्णय हुआ तो उन्होंने जहूर को
आमंत्रित किया और उससे
पूछा कि इस गोष्ठी में अगर वे हिंदी की किसी साहित्यकार को
बुलाना चाहें तो किसे
बुलाना चाहिये
?
जहूर बोले कि अगर हिंदी
साहित्य की बात करनी है तो बोलोनिया में सुनील,
यानी मुझसे कीजिये।
और इस तरह इस गोष्ठी
के आयोजकों ने मुझसे सम्पर्क किया
।
टूरिन शहर की ग्रिनज़ाने फाऊँडेशन हर वर्ष इतालवी में लिखने
वाले साहित्यकारों
को पुरस्कार देती है।
इस पुरस्कार समारोह के
साथ साथ विश्व के किसी एक हिस्से को चुन कर उसके साहित्य के
बारे में गोष्ठी भी
आयोजित की जाती है
।
पिछले वर्ष की गोष्ठी चीनी
साहित्य पर थी पर अगली जनवरी की गोष्ठी के लिए भारतीय साहित्य
का विषय चुना गया
है।
किन भारतीय साहित्यकारों को बुलाया जाये इसका फैसला तो वह
अधिकतर कर ही चुके
थे,
यानी अँग्रेज़ी में लिखने वाले भारतीय
कथाकार जिनकी पुस्तकें इतालवी भाषा में पहले से ही अनुवादित हो
चुकी हैं और जिन्हें
इतालवी पाठक जानते हैं
।
जैसे कि शशि थरूर,
एम.जे.
अकबर,
तरुण
तेजपाल
,
थ्रिटी उमरीगर,
लावण्या शंकरन,
अलताफ टायरवाला,
आदि।
इन साहित्यकारों में केवल एक नाम था हिंदी में
लिखने वालों में से और वह था
,
अलका सरावगी का
जिनके सभी उपन्यास वेनिस युनिवर्सिटी में हिंदी की प्रोफेसर
मरियोला ने सीधा हिंदी
से इतालवी में अनुवादित किये हैं।
अलेसांद्रो,
इस गोष्ठी के आयोजक,
से मेरी हिंदी लेखकों के बारे में बात हुई।
मेरा विचार था कि शायद चार या पाँच लोगों को
बुलायें पर उन्होंने मेरे सुझाये नामों में से केवल दो नाम ही
चुने
+
उदय प्रकाश और भगवान दास मोरवाल।
मैंने अँग्रेज़ी में लिखने वाले कुछ भारतीय लेखकों को,
जैसे अरुंधती राय,
अमिताभ घोष,
उपमन्यू चेटर्जी
,
झुम्पा लाहिरी,
सलमान रश्दी या विक्रम सेठ आदि को पढ़ा है पर जो नाम अलेसांद्रो
ने मुझे
बताये,
उनमें से अधिकांश को नहीं जानता था
।
लावण्या शंकरन,
अलताफ टायरवाला जैसे लेखकों के बारे में इंटरनेट पर खोजा तो
पाया कि सभी
जवान हैं,
एक-एक किताब लिखी है
।
तो एक बार मन में आया कि यह कैसे लेखक हैं,
एक किताब लिखी,
तुरंत सफलता मिली और झट से जगप्रसिद्ध लेखक हो गये?
हिंदी के और अन्य भारतीय भाषाओं के लेखक सारा
जीवन लिखते रहते हैं,
पर उनके नाम भारत से बाहर
कोई नहीं जानता।
विमल मित्र,
आशापूर्णा देवी,
श्री लाल शुक्ल जैसे लेखकों की कोई किताब इतालवी भाषा में
अनुवादित नहीं हुई
है।
खैर इन दिनों उन्हीं नये लेखकों को जिन्हें नहीं जानता,
उनकी किताबें पढ़ रहा हूँ।
लावण्या शंकरन और अलताफ़ टायरवाला दोनों पढ़े हें और
दोनो ही मुझे बहुत अच्छा लगे हैं
।
उनसे मिलने
का मौका मिलेगा यह सोच कर मन में उत्सुकता है।
लगता है कि एक अनोखी साहित्यिक दावत का निमंत्रण मिला हो,
जहाँ हर तरह के पकवान चखने का मौका मिलेगा और पकवान
बनाने वालों को भी जानने का मौका मिलेगा,
बस
उसी दावत में भाग लेने के दिन गिन रहा हूँ
।
सुनील दीपक
Bologna,
Italy
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