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त्रिलोचन
के बहाने
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त्रिलोचन
लोक जीवन के अद्वितीय चिंतक-चितेरे
कवि थे । वे लोक की पक्षधरता
में ताउम्र संघर्षरत रहे । एक मानव के रूप अपनी समस्त
आकांक्षाओं, स्वप्नों, और लाभों-लोभों को पूर्णतः तिलांजलि
देते हुए । वे
भारतीय भावभूमि वाली सच्ची प्रगतिशीलता के भी अद्भूत गायक थे । वे जीवन भर
ऐसे प्रगतिशील मूल्यों के लिए अपनी कटिबद्धता रेखांकित करते रहे ।
दिव्य मानवीय सरोकार के प्रतिपालनकर्ता के रूप में समस्त
संभावित चुनौतियों, चतुराईयों और चालाकियों को सिरे से नकारते
हुए । सोचने में ये दोनों बातें परस्पर विरोधी प्रतीत होती हैं
पर यही वास्तविकता है - जिससे त्रिलोचन पहचाने जाते हैं ।
यही वह जीवन मूल्य है जिससे भारतीय कविता सदैव कई
वादों-प्रतिवादों, घातों-प्रतिघातों के बीच भी भारतीय मनीषा के
केंद्र में बनी रही है और
इसी तरह भविष्य में भी वह समूचे विश्व के
काव्य संसार में अपने वैशिष्ट्य के लिए जानी जाती रहेगी ।
'लोक' को कई बार समझते हुए आदिम
मान लिया जाता है । यह अति प्रगतिशीलता के दबाब की उपज या यूँ
कहें कि थोथी प्रगतिशील चेतना के
रंगीन चश्मा पहनने वालों की
बौद्धिक दिवालियेपन की निशानी मात्र है । लोक को जो आधुनिकता
या विज्ञान के विपरीत ध्रुव में मानते हैं, वे या तो ज़ड़मूर्ख
हैं या उन्हें समय, समय और समाज की ठीक से परख नहीं है । कम-से-कम हम भारतीय परिवेश के बारे में यह तो कह ही सकते हैं । दो
चार अक्षर पढ़े लिखे लोगों से अक्सर यह भूल हो जाती है और वे
लोक को आधुनिकता के लिए ऋणात्मक मान बैठते हैं । लोक का मतलब
बस्तर का जंगल नहीं होता ।
संथाल परगना की आदिम संस्कृति नहीं होती । वहाँ का अनपढ़ और तथाकथित सभ्य
लोगों की नज़रों में आदिवासी भी नहीं । उनकी थोथी और
अवैज्ञानिक परंपराओं का संग्रह मात्र भी नहीं । वह आधुनिकता के
साथ तत्कालीन समय में जन-समाज की अविरल और पावन धारा है ।
जीवन-शैली का पिटारा है । मूल्यों का चाँद-सितारा है । उसमें
केवल सभ्य, शिक्षित और सक्षम जन नहीं । उसमें गरीब, निरक्षर,
असहाय, पीड़ित, दलित, वंचित और उपेक्षित मन भी हैं । कुल
मिलाकर एक समय में सम्यक भूगोल, संपूर्ण नागरिकता, सारी
जीवन-विधि । वहाँ केवल पूजा घर ही नहीं होता । एक साथ
श्रमवीरों की भट्ठी भी होती है जहाँ इतमीनान से बैठकर लोग सरई
पान के दौने में सल्फ़ी से अपना गला तर करते हैं और आने वाले
दिन के अँधेरे से जूझने के लिए
क्षणिक नया विश्वास भी हासिल करते हैं
।
मैं लगे हाथ एक निजी अनुभव का बयान करने की अनुमति चाहता हूँ
। अक्सर ऐसे भट्ठी या ग्रामीण झोपड़ियों में अति शहरी और सभ्य
लोग महुए का ओरिजनल दारु पीकर उसे किसी तीर्थ से कम नहीं मानते
। इनकी संख्या कम नहीं । यह मात्र मेरा अनुभव ही नहीं, समकालीन
सभ्य नागरिकों की वास्तविकता भी है और और एक
वास्तविकता भी । मैं
यहाँ कहना यही चाहता हूँ कि लोक में ग्राम और शहर या नगर
विलग नहीं है । वे तो उसमें वैसे मिले हैं जैसे दाल में नमक और
हल्दी । जो लोग ग्राम या वनग्राम तथा शहर या महानगर को एक
दूसरे से विलगाते हैं वे सिर्फ़ मक़ानों, सड़कों की बनावट,
वेशभूषा की बुनावट और लोगों की सहायता में प्रयुक्त मशीनों की
सजावट को देखकर ही ऐसी मानसिकता बना लेते हैं । यह केवल
स्थूलता है । यह सच्चे प्रगतिशीलों की सिद्धि नहीं कुबुद्धि है जो लोक को
पिछड़ा समझते हैं ।
लोक तो सदैव समय की गति में लीन रहता है । कोई भी सभ्यता या समाज लोक रहित न तो कभी
रहा है न होगा । जिसे हम जनपद कहते हैं वह ग्रामों का समूह
नहीं, ग्रामीणों का जन संकूल नहीं । वह अपनी समस्त इतिहास,
परंपरा, जीवन मूल्य का अस्मितावान् अवधारणा है । जिसमें
छोटे-मोटे शहर भी होते हैं और शहर जैसे बड़े-बड़े गाँव भी ।
तो त्रिलोचन ऐसे जनपद के
हितैषी कवि थे जिसमें भारत
अपने समस्त सुख-दुःख के साथ निवसता है । मन
में उमंग हो तो मेला रचाता है । औरों को
ख़ुशी बाँटता है । ज़रा-सी
अड़चन आ जाये तो चौपाल में मिल बैठकर नयी राह ढूँढ लेता है ।
नियति से हार मानना
भी पड़े तो भी चिखता-चिल्लाता नहीं । ऊधो
करमन की गति न्यारी जैसे अमर पदों को गुनगुनाने लगता है ।
बाँटना लोक का स्वभाव है । लोक बाँटता है । नगर बटोरता है ।
लोक जब भी बाँटता है तो उसे चिंता लगी रहती है कि उसकी सुरभि
कहीं बासी न हो जाये ।
कहीं कोई उसे दुषित न कर दे । त्रिलोचन यही तो कहते हैं-
फूल मेरे जीवन में
आर रहे हैं/सौरभ
से दसों दिशाएँ/भरी
हुई हैं/मेरा
जी विह्वल है/मैं किस से क्या कहूँ
---------
पत्र-पुष्प जितने भी चाहों/अभी
ले जाओ/जिसे
चाहो, उसे दो/
लो/जो भी चाहो
लो
एक अनुरोध मेरा मान लो/सूरभि
हमारी यह हमें बड़ी प्यारी है/इस
को सँभाल कर जहाँ जाना
ले जाना/ इसे तुम्हें
सौंपता हूँ
( तुम्हें सौपता
हूँ )
वैसे भी भारत जन प्रदेश
नहीं वह लोक प्रदेश है । कम से कम उसकी असली तासीर लोक में
दिखाई देती है । वह बिना लोक के एक प्रशासनिक इकाई के अलावा है
भी क्या । जब हम जन
कहते हैं तो कई बार भूल जाते हैं कि जन केवल एक मानवीय इकाई है
। जन कभी अपने लोक के बगैर रहा कहाँ है?
तो त्रिलोचन ऐसे भारत के निवासियों के पक्ष में लिखते
रहे जो लोकवासी है । यदि ऐसा नहीं होता तो त्रिलोचन को क्योंकर काशी
भी गाँव सी
लगती-
काशी मुझे गाँव
सी लगती है, शहराती
हवा यहाँ कम से
कम है, सब आसपास से
घुले मिले रहते
हैं, अपना रंग दिखाती
प्रकृति
मनुष्यों में है, धरती से अकास से
सहज मुक्त संबंध
बना है, चोरी डाका
यहाँ न हो यह बात नहीं, दुर्गुण सारे
(अनकहनी
भी कुछ कहनी है)
त्रिलोचन ने कभी कवि केदारनाथ जैसे बड़े कवि
को अपने साक्षात्कार मे कहा था कि -
"उनमें पहले-पहल कविता का
संस्कार लोक साहचर्य से जाग्रत हुआ ।" वे किसी शहरी
और मंचीय कवि की
कविता सुनकर, किसी पत्र-पत्रिका में फोटू सहित कविता प्रकाशित
हुआ देखकर, आज के किसी फ़ेमस (?)
कवि की कविता संग्रह पढ़कर,
कवि नहीं हुए ।
उन्हें होली, फाग के ढोलक बजाने वालों ने ताल दिये ।
पेड़ पर बैठे पंडूक, मैंना, सुग्गे ने छंद दिये । खेत-खलिहान
में धान रोपते और साथ-साथ कज़री चैती गाते किसान और मजदूर की
बानी ने लय दिया । कलकल-छलछल गाती नदियों ने संगीत दिये उन्हें
गाँव की गलियों में बतियाते लोगों ने मुहावरे दिये । और उससे
बढ़कर लोकसत्य ने उन्हें कविता रचने की अनुप्रेरणा दी ।
लोकसत्य ने ऐसा रचा कि
'वासुदेव'
होने का अंहकार भी जाता रहा और 'सिंह'
को खरगोश में तब्दील हो गया । मन गिलहरी का हो गया । डॉ. नामवर
सिंह ने ठीक ही तो कहा है कि -
"त्रिलोचन लोक-बोली का संस्कार
करते हैं और इस मामले में वे तुलसी के अनुयायी हैं ।"
सच कहें
तो निराला जी के बाद यदि किसी में लोक का जितना आत्मीय और
गंभीर संस्कार गहराई तक भरा है तो वह हैं त्रिलोचन । सिर्फ़
त्रिलोचन । उनके यहाँ जिस तरह कविताई ठंडक, उद्बोधनपरकता,
सूक्तिपरकता और सामान्य से सामान्य जीवन रूपों का उद्घाटन हुआ
है हिंदी लोक मानस और मनीषा का अपना जातीय प्रतिरूप है । वहाँ
निष्कुलष परंपराओं की अनुगूँज है । पुरातन किंतु शाश्वत -सफेद
संस्कारों का कलरव है । आत्मीय संस्कृति की चहचहाहट है । उनकी
कविता में लोक का आवास है । शब्दों में। अर्थों में । शब्दों
और अर्थों के बाहर भी । यह लोक प्रकारांतर से ज़मीन की आराधना
है । वे चाहें जहाँ कहीं भी रहे लोक और उनकी ज़मीन उनकी कविता
में और सघन होकर पैठती रही ।
त्रिलोचन जैसे महान् और दिव्य भावी कवियों को
पढ़ने-गुनने के बाद लगता है कि प्रगतिशील होना परंपराओं के
विरूद्ध जाना नहीं है । दरअसल प्रगतिशील होने का मतलब जीवन से
जुड़ना है । उन्हें प्रगतिशील आंदोलन से संबंद्ता उतना ज़रूरी
नहीं लगा जितना सामान्य मनुष्य से जुड़े रहना । शायद यही कारण
है कि जीवन की सानिध्यता ने उन्हें सबसे सहज कवियों में ला
खड़ा किया । इस सहजता को लोग कई मायने में देखते रहे हैं । पर
जिसे ऐसे लोग उनकी कमजोरी समझते हैं वे भूल नहीं तो और क्या
करते रहे ? त्रिलोचन सामान्य होकर विराट हैं । आज के कई
प्रगतिशील विराट (उनके अपने टेबिल पार्टनर और थोथे आलोचक की
राय में ) होकर भी
उतने सामान्य नहीं है । अब भगवान जाने वे कैसे
सामान्य लोगों सरोकार रखते हैं और सामान्य जन के लिए हो हल्ला
मचाते फिरते हैं । दूर क्यों जाते हैं । अभी हाल की बात है -
सारे देश के प्रगतिशीलों-बुद्धिजीवियों ने बस्तर में नक्सलियों के प्रति हो
रहे दमन के लिए राज्य की राजधानी में आकर धरना दिया ।
वे पूरी तरह भूल गये कि बस्तर के सैकड़ों निर्दोष आदिवासियों की
हत्या भी मानवाधिकार का मुद्धा
है जिससे हर प्रगतिशील को सरोकार रखना ज़रूरी हो सकता था।
हमारे प्रगतिशील कवि, आलोचक, बुद्धिजीवी द्वारा जिस तरह से
बस्तर का चित्र रखा जा रहा है वह वायवी है । संवेदनाशून्य है ।
टेबिल राइटिंग है । एक फ़ैशन है जिसे बिना देखे, बिना समझे हर
कोई अपनाना चाहता है । इसके लिए लोक में प्रचलित एक मुहावरा
में कहें तो - एक लोमड़ी हुँआ-हुँआ-सब लोमड़ी हुँआ-हुँआ । चलिए
हम तो त्रिलोचन जी पर बात करना चाहते हैं । कहाँ उलझ गये
आत्ममुग्ध विचारधारकों को चिमनी दिखाने में !
उन्होंने यदि त्रिलोचन को रिकमंड नहीं किया तो उसमें त्रिलोचन
का कुछ नहीं बिगड़ा, उस आलोचना का मस्तक ही झुका जिसके बदौलत
कुछ शब्दजाल फैलाने वाले अपनी दुकान सजाते हैं ।
त्रिलोचन और सॉनेट एक दूसरे
के पर्याय हैं । उनके सॉनेट में विविधता है । रूप विधान के
हिसाब से ही नहीं, भाव-विधान में भी । उनके सॉनेट पेट्रार्की
तो हैं ही, स्पेंसर, शेक्सपीयर और मिल्टन के सॉनेट जैसे भी हैं
। और इतना ही नहीं, उन्होंने सॉनेट में सर्वधा मौलिक प्रयोग भी
किये हैं । ये प्रयोग सिद्ध करते हैं कि वे इतालवी और
अँग्रेज़ी की अभिजात्यता से दूर हटाकर सॉनेट को हिंदी का जातीय
छंद बनाना चाहते थे । यह एक ऐसा परिवर्तन है जिसमें आधुनिकता
को लोक की भाखा-बानी सिखाया गया न कि लोक को पिछड़ा मानकर
आधुनिकता का आत्मसातीकरण । यदि ऐसा न होता तो उनके सॉनेट में
आम जीवन की हँसी-ठिठोली, भाव-भंगिमा, शब्द- मुहावरे क्योंकर
लोकप्रिय होते। त्रिलोचन जी ने हिंदी खड़ी बोली के साथ-साथ
अपनी संस्कृत और अवधी शब्द संपदा का चमत्कार भी सॉनेट में
दिखाया है और यह उनकी प्रसिद्धि और योगदान का सबसे अहम् तथ्य
है कि हिंदी के किसी भी कवि को यह प्रवीणता अब तक हासिल नहीं
हुई है ।
तो क्या त्रिलोचन लोकरूढ़ता
के शिकार थे, जैसा कि कुछ स्वनामधन्य आलोचकों ने समझा, कदापि
नहीं । वे ऐसे तमाम वरिष्ठ और अपने समकालीन कवियों में कहीं
अधिक आधुनिक थे जिन्हें परंपरा के बरक्स आधुनिकोन्मेषी घोषित
किया जाता रहा है । वे जनपद के कवि थे जब कहते थे तो उसका अर्थ
समूचा भारत होता था । जहाँ नगई महरा भी हो तो दूसरी ओर
फेरीवाला भी । उनके यहाँ चन्द्रमुखी गोर्की की तसवीर निहारती
है तो ठीक उसके बाद गोविन्द की याद भी है, चित्रा जाम्बोरकर
जैसी बच्ची की कहानी भी । वे भोरई केवट के घर भी चले जाते हैं
और ग़ालिब की बोली भी अपना लेते हैं । त्रिलोचन एकमात्र ऐसे
कवि हैं जो आधुनिकता को उस हद तक ही स्वीकारते हैं जहाँ तक
परंपरा की पावन धारा प्रदूषित होने से बची रह सकती थी । परंपरा
को वे आधुनिकता के विपरीत कोण से नहीं अपितु उसकी उदात्तता के
साथ देखते रहे । और भारतीय परिवेश में सच्ची आधुनिकता का
पैमाना सत्य के अधिक निकट भी रहा है जिसे सभी मानवशास्त्रियों,
विचारकों, दार्शनिकों, संतो सिद्ध करते रहे हैं । केदारनाथ
सिंह के शब्दों में कहें तो -
"दरअसल वे आज
की हिंदी-कविता में उस धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो
आधुनिकता के सारे शोर-शराबे के बीच हिंदी भाषा और हिंदी जाति
की संघर्षशील चेतना की जड़ों को सींचती हुई चुपचाप बहती रही ।"
सच ही है कि त्रिलोचन उन आधुनिकतावादी जीवन मूल्यों की ओर कभी
लपके जो चाटुकारिता, टुच्चाई और काइयाँपन की ओर प्रस्थान करने
को बाध्य करती है । वे ऐसा प्रगतिशील कदापि नहीं बनना चाहते थे
। और उन्हें बखुबी पता था कि वे अपने सत्य के द्वारा ही युग के
लिए कुछ रचनात्मक भेंट दे सकते थे- वे तो 'सागर'
लाँघना चाहते थे और उन्होंने बाकायदा हिंदी का सागर नापा-
प्रगतिशील
कवियों की नई लिस्ट निकली है
उस में कहीं
त्रिलोचन का तो नाम नहीं था ।
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तुम
सागर लाँघोंगे? -
डरते हो चहले से ।
सृजनगाथा की दिली तमन्ना थी
कि उनके रहते हुए ही यह अंक अंतरजाल पर आ जाये, जैसा कि हमने
पहले से ही इसकी घोषणा की हुई थी । पर नियति को मंज़ूर न था ।
हम उनके चरणों में कुछ पुष्पांजलि भेंट करना चाहते थे विवश
इतने कि हमें उन्हें श्रदांजलि भेंट करना पड़ रहा है । हमें
खेद है कि अंतरजाल पर हिंदी का लेखक समाज उतना सक्रिय नहीं है
जितना वह दावा करता है । यदि ऐसा होता तो हमें त्रिलोचन पर
सार्वजनिक तौर पर लिखने वाले सैकड़ों लेखक मिल जाते । हमें
सिर्फ दो ही रचनायें अंतरजाल के माध्यम से मिलीं । यह दीगर बात
है कि ब्लॉगों पर निजी लेखादि लोगों ने रखने का प्रयास किया है
। जो भी हो हमने त्रिलोचन अंक में हमने ऐसी पर्याप्त सामग्री देने का प्रयास
किया है जिससे त्रिलोचन को उनकी समग्रता के साथ समझा जा सके ।
अंतरजाल पर कदाचित् यह पहला प्रयास भी हो ।
हम भाई महावीर अग्रवाल, संप्रेषण के संपादक सहित उन लेखकों का
आभार मानते हैं जिनकी रचनायें आपको इस विशेषांक में पढ़ने को
मिलेंगी । यदि पाठकों की राय का हम आग्रह करें तो
शायद कोई कठिन काम उन्हें नहीं
सौप रहे हैं ।
इस अंक में हम
नियमित सामग्री नहीं दे सके । इसका हमें खेद है । अगले अंक में
भी शायद कुछ ऐसा ही हो... हमारे सभी लेखकों, स्तम्भकारों सहित
पाठकों से धैर्य की अपेक्षा के साथ ।
नये साल
आपको चेतनावान बनाये, वास्तविक समृद्धि की सौगातें दे, इन्हीं
शुभकामनाओं सहित...
जयप्रकाश मानस
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