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मकान की खिड़की
मोहन राणा
साइकिल
की दुकान में अज़ीब सी गंध अभी भी आ रही थी,
यदि दूसरी बार मैं वहाँ गया था पता करने की मेरी साइकिल का
क्या हुआ?
मैंने आज फिर सेल्समैन को ध्यान दिलाया,
उसने फिर पहले जैसा आश्चर्य प्रकट किया... लहसुन की गंध है,
वह बोला
"नहीं
मुझे तो कुछ और ही लगती है",
पर मेरे प्रतिवाद का कोई असर उस पर नहीं हुआ,
वह शायद उस दुकान और उसमें टँगी साइकलों के साथ उस गंध का आदि
हो चुका है।
हम जब किसी अनुभव के आदी हो जाते हैं तो फिर उसके अनूभूति
व्याप्त कोलाहल में नगण्य हो जाती है।
पिछले साल दीपावली के दौरान शुभकामनाओं के ईमेल पहुँचे,
एक पुराने परिचित जो आजकल दक्षिण भारत में रहते हैं उनका संदेश
मिला- वीरान विदेश में दीवाली की शुभकामनाएँ!
उनकी बात एक हद तक सही ही लगी।
कल सुबह हुई पर दिन जैसा एक लंबी सुबह ही था पर समय बीत गया।
फिर सुबह हुई है इसकी पुष्टि घड़ी देख कर हो रही है,
एक चाय पी कर । मन हुआ कि यह दैनंदिन का नजारा लिखूँ। आकाश
रंगहीन और रोशनी जरा भी नहीं बदली है ना आकाश में कोई हलचल
गंदली सफेदी उस पर तनी है। घाटी के उस पर एक मकान में एक कमरे
में बत्ती जली हुई है शायद सारा दिन उसमें बत्ती जले फिर भी
अँधेरा दूर ना हो!
एक गीली ठंडक और गीली कालिमा सर्वव्याप्त है मकानों की ढलवाँ
छत्तों पर बची हुई हरियाली पर।
चाय का स्वाद चौथी चुस्की के बाद फीका हो गया। खिड़की पास जा
कर देखता हूँ ढलवाँ छतों के मकान जैसे हाथ बाँधे खड़े कुछ
सुनते कुछ छितराई हरियाली में छुपी किसी चिड़िया के आहट। अब
घाटी के उस पार बत्ते जले मकान की खिड़की में कोई आदमी खड़ा
दिखाई दे रहा है। शायद वह मेरी ओर ही देख रहा है।
जब तक मैंने उपरोक्त पंक्तियाँ पूरी कि कंप्यूटर ने काम करना
बंद कर दिया,
विचार क्रम उसके साथ ही विगत हो गया।
कि तभी बस एक विचार आया और आविष्ट कर दिया कि कैसे पिछले सालों
में लिखी कविताएँ,
ईमेल आदि को कैसे बचाया जाय। दो तीन दिन की अटकलों के बाद उसकी
हार्ड डिस्क को निकाल कर उसमें से रखी हुई कविताओँ,
तस्वीरों आदि को निकालना आरंभ किया। आजकल सबकुछ डिजिटल कर दिया
है कविताएँ,
फोटोग्राफ आदि को केवल एक डिस्क पर रख दिया है,
कागजों को रखने संभालने के लिए ना जगह बची है ना समय मिलता है,
और जो हैं उन्हें कई महीनों से छाँट छाँट कर कबाड़ी वाले के
लिए हर सप्ताह जमा कर घर के बाहर रख देता है पर अभी भी मेज पर
चीजें बिखरी हुई हैं।
डिस्क में संभाल कर रखने के भी अपने खतरे हैं।। कहीं खराब ना
हो जाए या भविष्य में जो उसमें है वह पढ़ा ही ना जा सके,
डिजिटल दराज के भी अपने लाभ और खतरे में हैं।
अब मैं किसी और मशीन पर बैठा हूँ,
कल रात मैंने काफी देर तक एक बड़ी ईमेल भेजे की कोशिश करता रहा
पर,
वह कहीं गई नहीं। शायद रात बहुत हो चुकी थी।
तीन बजे के बाद फिर बारिश शुरू हो गई लगातार चलती रही मौसम की
रिपोर्ट
15
मिमी पानी बरसेगा,
शायद ज्यादा ही बरसेगा।
नदी में पानी आवेग और ऊँची के साथ बह रहा था किनारे उसमें डूब
चुके थे अब यब बारिश रात भर चलती रहे तो पानी और चढ़ेगा और
शायद रेलवे स्टेशन के पीछे है और नदी के किनारे साइकिल की
दुकान में बाढ़ का पानी आ जाए। मैंने दुकान के लड़के को अपनी
शंका बताई थी पर
वह मुस्काराता रहा,
उसके दिमाग में बस धंधे की बातें थीं... वह साइकिल संविदा भाव
के कागज में मीन मेख कोजता रहा,
जबकि सबकुछ पहले से सहमत हो चुका है शायद वह मुझे अपने चातुर्य
से इंप्रैस करना चाह रहा था। मनो - प्रतिद्वंदिता अंग्रेजी
चरित्र का हिस्सा है और मुक्त बाजार से संपूरित समाज में
यह सामान्य ही लक्षण है।
मोहन राणा
221, Wellsway, Bath BA2 4RZ
England, UK
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