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शरीर घड़ी ही चलाती है हमें
डॉ. विजय
कुमार उपाध्याय
प्रत्येक
मनुष्य के शरीर में मस्तिष्क के भीतर तथा आंखों के ठीक पीछे एक
सूक्ष्म ग्रन्थि पायी जाती है जिसे सुप्रा कियेस्मैटिक
न्युक्लियस कहा जाता है। यह न्युक्लियस हमारे शरीर में प्रकृति
द्वारा स्थापित एक घड़ी है जो हमारे शरीर के सभी प्रिया कलापों
को नियंत्रित करने का काम करती है। मानव द्वारा निर्मित घड़ी
का
12
घंटे या
24 घंटे का एक
पूर्ण चप्र होता है। इसी समय चप्र के अन्दर हमारी सारी दैनिक
प्रियाएं नियंत्रित होती हैं-
जैसे भूख,
प्यास,
हार्मोन चप्र,
मस्तिष्क की
सप्रियता थकावट,
निद्रा इत्यादि।
वैज्ञानिक इस प्राकृतिक घड़ी को शरीर से अलग कर सकते हैं,
इसे इलेक्ट्रोड से जोड़ सकते हैं तथा इसके टिकटिक को एक नियमित
इलेक्ट्रॉनिक हॉर्न में परिवर्तित कर सकते हैं।
परन्तु अफसोस की
बात यह है कि हमारे शरीर में स्थित इतनी अधिक महत्वपूर्ण,
उपयोगी तथा
संवेदनशील प्राकृतिक घड़ी हमारी कृत्रिम जीवन शैली के कारण
बिगड़ जाती है तथा इसके कारण अनेक समस्याएं पैदा होती हैं। आज
की भाग-दौड़
वाली ज़िंदगी
में अधिक व्यस्तता,
काम के अधिक घंटे
तथा काफी रात बीतने पर सोने की आदत के कारण हम लोग अपनी शरीर
घड़ी की सुरक्षा पर समुचित ध्यान नहीं दे पाते। इसके कारण इस
घड़ी के ऊपर कैफीन या ऐम्फेटामाइन की परत पर परत चढ़ती चली
जाती है। नतीजा यह होता है कि हमारे शरीर में ह्य्दय रोग तथा
हाइपर टेंशन पैदा होने की संभावनायें काफी अधिक बढ़ जाती हैं।
संयुक्त राज्य अमेरिका में सर्री विश्वविद्यालय में
इंडोप्रायनोलॉजी के प्राध्यापक डॉ.जी.आर्डेंट
ने अपने द्वारा किये गये अध्ययनों के आधार पर निष्कर्ष निकाला
कि यदि हम अपनी शारीरिक घड़ी के सामान्य प्रिया-कलाप
में किसी प्रकार का व्यवधान डालते हैं तो हम अनेक प्रकार के
रोगों के शिकार बन सकते हैं। उदाहरण के लिए मान लिया जाए कि
हमारी शरीर घड़ी के अनुसार रात में नौ बजे से सुबह पाँच बजे तक
सोने का समय निर्धारित है,
परन्तु हम अपने
कार्यों में अत्यधिक व्यस्तता के कारण उस निर्धारित समय के
दौरान नहीं सो पाते हैं। इसका नतीजा यह होगा कि हमारी शारीरिक
घड़ी की नियमित कार्य प्रणाली में व्यवधान पड़ेगा तथा हमारे
स्वास्थ्य पर इसका काफी अधिक बुरा प्रभाव पड़ेगा। जो लोग किसी
कारखाने में शिप्ट ड्यूटी करते हैं,
उनमें रक्त संचार
संबंधी रोग या ह्य्दय रोग से ग्रस्त लोग काफी
संख्या में पाये
जाते हैं। ऐसे लोगों के रक्त में वसा का परिमाण प्राय सामान्य
स्तर से बहुत अधिक पाया जाता है। इसके पीछे कारण यह है ऐसे
लोगों के खान-पान,
आराम तथा शयन
इत्यादि दैनिक क्रियाकलापों का समय सामान्य तौर पर निश्चित
नहीं रहता। असमय आहार,
असमय विश्राम एवं
निदा के कारण ऐसे लोगों की पाचन प्रिया में गड़बड़ियां पैदा हो
जाती हैं। इसके फलस्वरूप वे अनेक प्रकार के रोगों के शिकार बन
जाते हैं। वैज्ञानिकों द्वारा किये गये अध्ययनों से जानकारी
प्राप्त हुई है कि ऐसे लोग प्राय पेट के रोग तथा अल्सर से
ग्रस्त रहते हैं। ऐसे लोगों में प्राय एकाग्रता की कमी पाई
जाती है जिसके चलते ऐसे लोगों प्राय दुर्घटना के शिकार बनते
हैं। ये सामान्य तौर पर चिड़चिड़े स्वभाव के बन जाते हैं जिसके
कारण वे समाज तथा परिवार में समुचित सामंजस्य नहीं बैठा पाते।
इसके फलस्वरूप उन्हें अनेक प्रकार की पारिवारिक तथा सामाजिक
समस्याओं से जूझना पड़ता है।
वर्तमान समय में
अधिकांश लोगों की दिनचर्या अनियमित रहेगी यह मानते हुए अब
वैज्ञानिक
ऐसे शोध में लगे
हुए हैं जिससे शरीर घड़ी को इस प्रकार सेट किया जाए कि वह
हमारी अनियमित जीवन शैली के साथ ताल-मेल
बैठाकर चलती रहे। संयुक्त राज्य अमेरिका की सेना नौर्थ
वेस्टर्न यूनिवर्सिटी में कार्यरत डॉ.
फिलिप जी.
को इस दिशा में
एक अनुसंधान योजना के संचालन हेतु आर्थिक सहायता उपलब्ध करा
रही है।
चूँकि हमारी शरीर
घड़ी के सभी सूक्ष्म अंग तथा इसके द्वारा समय-निर्धारण
की प्रप्रिया प्राय वंशगत होती है,
अत यह जेनेटिक
संरचना का एक अंग है। इसी बात को ध्यान में रखकर फिलिप
डी.एन.ए.की
उस लड़ी को अलग करने का पूरा प्रयास कर रही है जो इस शरीर घड़ी
को संचालित करती है। फिलिप जी ने एक ऐसे चूहे को ढूंढ निकाला
है जिसकी जेनेटिक घड़ी अन्य चूहों की जेनेटिक घड़ी की तुलना
में अलग है। अब वे उस जीन को ढूंढ़ने का प्रयास कर रही हैं जो
चूहे की जेनेटिक घड़ी में परिवर्तन के लिए जिम्मेदार है। यदि
इस प्रकार की जीन से मिलती-जुलती
हुई जीन मानव शरीर में भी ढूँढ़ ली जाये तो यह खोज बहुत ही
अधिक उपयोगी होगी। मनुष्यों में भी ऐसे कई लोग पाये जाते हैं
जो दो पाली या बहुत अधिक घंटे काम करने तथा कम सोने के बावजूद
पूरी तरह स्वस्थ रहते हैं। वैज्ञानिकों का विचार है कि ऐसे
लोगों की जेनेटिक घड़ी के चप्र में उपर्युक्त चूहे के समान ही
कुछ न कुछ परिवर्तन जाता रहता है जिसके कारण उनमें अधिक काम
करने की क्षमता का विकास होता है।
जिस प्रकार अलग-अलग
कम्पनी द्वारा निर्मित स्वचालित वाहनों की बनावट तथा चाल में
अन्तर रहता है,
उसी प्रकार अलग-अलग
व्यक्ति की शारीरिक घड़ी की संरचना तथा चाल में अन्तर पाया
जाता है। शारीरिक घड़ी संबंधी जीन के विश्लेषण से यह पता चल
सकता है कि किसी व्यक्ति की शारीरिक घड़ी की बनावट तथा चाल
कैसी है। यह धीमी है या तेज,
इसका चप्र
24 घंटे का है या
22 घंटे
का। साथ ही इस विश्लेषण से यह भी पता चल जायेगा कि इस घड़ी में
कितने घंटे काम के लिए निर्धारित हैं तथा कितने घंटे आराम या
निदा के लिए। इस घड़ी की चाल तथा लय को समझ कर आप यह पता लगा
सकते हैं कि दिन के किस समय पर आपका मस्तिष्क अधिक सप्रिय व
सचेत रहेगा तथा किस समय पर कम सप्रिय तथा कम सचेत। इसके आधार
पर आप पहले से ही अनुमान लगा सकते हैं कि किस समय पर कोई काम
हाथ में लेने पर आप उसे सही ढंग से कर सकते हैं तथा उसमें
सफलता प्राप्त कर सकते हैं। उदाहरणार्थ कुछ छात्र अपने पाठ को
सुबह में पढ़कर अच्छी तरह याद कर सकते हैं,
जबकि कुछ अन्य
छात्र रात्रि के सन्नाटे में अधिक एकाग्र होकर पाठ याद करते
है।
डॉ. विजय कुमार उपाध्याय
कृष्णा इनक्लेव,
राजेन्द नगर
पो.-जमगढ़िया,
व्हाया-जोधाडीह
चास,
जिला-बोकारो,
झारखण्ड
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