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पंचम किश्त
हिंदी लघुकथा का विकास
डॉ. अंजलि
शर्मा
(लघुकथा
हिंदी साहित्य की नवीनतम् विधा है । इसका श्रीगणेश छत्तीसगढ़ के प्रथम
पत्रकार और कथाकार माधव राव सप्रे के 'एक टोकरी
भर मिट्टी से होता है' । हिंदी के अन्य सभी
विधाओं की तुलना में अधिक लघुआकार होने के कारण यह समकालीन पाठकों के
ज्यादा करीब है । और सिर्फ़ इतना ही नहीं यह अपनी विधागत सरोकार की
दृष्टि से भी एक पूर्ण विधा के रूप में हिदीं जगत् में समादृत हो रही
है । इसे स्थापित करने में जितना हाथ लघुकथाकारों का रहा है उतना ही
कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, बलराम, आदि संपादकों का भी रहा है । खास कर
लघुपत्रिकाओं के संपादकों का ।
इंटरनेट पर भी सुकेश साहनी जैसे वरिष्ठ लघुकथाकार इसे विश्वव्यापी
लोकप्रियता के लिए कटिबद्ध हैं ।
हमने
अपने प्रिय पाठकों के लिए पहली बार हिंदी लघुकथा के विकास पर किसी शोध
ग्रंथ को धारावाहिक रूप से छापने का निर्णय लिया है ताकि इस लघु किंतु
गुरुतर विधा से सारी दुनिया के रचनाकार और पाठक भी अवगत हो सकें । हमें
खुशी है रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़ के शोध छात्रा और
हिदीं के प्राध्यापक डॉ. अंजलि शर्मा जी की सहमति से संपूर्ण शोध कृति
अंतरजाल पर प्रकाशित हो रहा है, जिस पर उन्हें पी-एच.ड़ी की उपाधि मिल
चुकी है । हिंदी अंतरजाल के इतिहास में शायद पहला अवसर है कि कोई शोध
कृति धारावाहिक प्रकाशित हो रही है ।
अभी तक आप
भाग 1,
भाग 2,
भाग 3
भाग 4 पढ़ चुके हैं ।
पिछले अंकों से
आगे पढ़िए -
संपादक )
हिंदी लघुकथा में निम्न
विशेषताएं परिलक्षित होती हैं-
(1) यथार्थताः-
लघुकथा में यथार्थ के उस पक्ष को उभारा गया है, जो सामजिक और
मानवीय स्थिति और नियति के भयावह संदर्भों और अस्तित्व की
बुनियादी समस्याओं से जुड़ा हुआ है । अस्तित्व की बुनियादी
समस्याओं से जुडे़ यथार्थ को उभारने के क्रम में लघुकथा का
स्वर प्रमुख रहा है । इस क्रम में सामाजिक यथार्थ को आक्रोश
तथा संघर्ष के रूप में उभारा गया है । लघुकथा का यथार्थ सिर्फ
समाज में सार्वजनिक रूप से घटित होने वाली घटना दुर्घटना में
ही निहित नहीं है, यथार्थता लघुकथा के प्रशासन तंत्र, राजनीति,
घर, आँगन, गलियारों तथा पारिवारिक जीवन की विसंगतियाँ,
विडम्बनाओं एवं व्यक्ति की मजबूरियों को भी स्थान दिया गया है
परिणामस्वरूप पाठक वर्ग की अधिकाधिक सहानुभूति प्राप्त हो रही
है लघुकथा को ।
व्यक्ति का यथार्थ हमारे अस्तित्व से जड़ी बुनियादी समस्याओं
से ही है । व्यक्ति से जुड़े संवेदनात्मक प्रश्नों, समस्याओं
को लघुकथा का कथ्य बनाया गया ।
लघुकथा की सबसे बड़ी विशेषता है वह किसी समस्या का समाधान करने
या उपदेश देने की अपेक्षा ज़िंदगी की धागे की तरह कोमल भी हो
सकती है । लघुकथा
के
यथार्थता का ही परिणाम है कि वह जीवन और जगत से जुड़ी हुई है ।
लघुकथा में सामाजिक विसंगतियाँ, धार्मिक पाखंड़, राजनैतिक
प्रपंच और चारित्रिक विरोधाभास आदि संपूर्ण परिवेश परिलक्षित
होते हैं । पंड़ा पुरोहित से लेकर नेता तक, बाबू से लेकर चपरसी
तक, बनिये महाजन से लेकर पटवारी तक के यथार्थ का चित्र लघुकथा
की विशेषता है ।
लघुकथाएँ समय में माँग के अनुरूप यथार्थ के धरातल पर मानव
मूल्यों की जीवंत तस्वीरें खींचती हैं, जो जीवन संग्राम में
उचित दिशाबोध कराते हुए मावन जीवन के यथार्थ प्रसंगों पर मूल
रूप से केंद्रित होता है । लघुकथाओं के पात्र कहीं और कल्पना
लोक में विचरण करने की अपेक्षा हमारे आसपास से ही होते हैं,
जिससे लघुकथा परिपक्व मस्तिष्क वाले शिक्षितों तक ही सीमित न
होकर एक कम, पढ़े लिखे काम चलाऊ भाषा जानने वाले व्यक्ति भी
समझ पाता है ।
चांद शर्मा ने अपनी लघुकथा
‘दर्द’
में एक गरीब बाप के विद्यार्थी बेटे का यथार्थ खींचा है-
लघुकथांश उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत हैं- ‘मैं
समय पर स्कूल पहुँच गया हूँ, स्कूल लगने का समय हो गया है,
चपरासी अभी तक नहीं पहुँचा न ही अभी तक हेडमास्टर पहुँचा है ।
..... इसी तरह हर रोज़ ही मेरा स्कूल लगता है, मैं गरीब बच्चा
हूँ, मझे पढ़ने का बहुत शौक है, मेरे गरीब माँ बाप से मेरी
फ़ीस नहीं दी जाती..... बड़ी कठिनाई से जुटा पाता हूँ, बाप
मेरी फीस...... मेरि किताबें.... मैं बड़ा मेहनती हूँ, पढ़
लिखकर कुछ बनना चाहता हूँ, पर मेरा स्कूल ।’
(2) व्यंग्यात्मकता-
व्यंग्यात्मकता या बेधकता लघुकथा की दूसरी विशेषता है ।
व्यंग्य के माध्यम से कम शब्दों में अधिक उपलब्धि पाठकों को
होती है । व्यंग्य के सहारे से लघुकथा में निखार आता है ।
व्यंजना की सूक्ष्मता से लघुकथा से शिल्प गठन में चुस्ती आती
है । व्यक्ति समाज या राष्ट्र की ख़ामी, विकृत वेशभूषा, विकृत
चेष्टा कार्यकलाप जहाँ हास्य का आधार बनते हैं, वहाँ व्यंग्य
के लिये भी गुंजाइश छोड़ते हैं । समाज के साथ राजनैतिक
भ्रष्टाचार, धार्मिक ढोंग, नैतिक मानव मूल्य व्यंग्य का
उपजीव्य सिद्ध होते हैं । लघुकथाकार व्यंग्य का सहारा लेकर
व्यक्ति समाज या राष्ट्र की विकृति दूर करना चाहते हैं, पाठकों
तक इन विकृतियों की सूक्ष्मता को पहूँचाते हैं । ऐसे लघुकथाओं
का शिल्प विशेष आकर्षण का केंद्र होता है । विक्रम सोनी की
लघुकथा ‘नयी
लुगड़ी’
पति की गरीबी और शराबखोरी से पीड़ित स्त्री का गाँव के समाज
सेवक, गिरिधारी बाबू की ठकुर सुहाती, मिथ्या हमदर्दी एवं नयी
लुगड़ी के द्वारा वशीभूत होना स्त्री की बेबसी और लोभ का चित्र
जहाँ उपस्थित करता है, समाज सेवक की नग्नता का भी बोध व्यंग्य
से कराता है । इसी तरह कुलदीप जैन की लघुकथा ‘देवली’
एक राजस्थानी लड़की जो अपने पति के रिक्शे बनाने वाला मिस्त्री
को बचाने में अपने भाई द्वारा मार डाली जाती है । व्यंग्य से
प्रेम से लिए उत्सर्ग का संदेश देती है । ईश्वर चंद की लघुकथा
‘परोपकार
का फल’
में जहाँ व्यंग्यात्मकता के सहारे जहाँ लेखक परोपकारी व्यक्ति
को सचेत करता है, वहीं ट्रक ड्राइवर एवं उसके साथियों की
प्रतिक्रिया का चित्र हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है । इसी
प्रकार ‘कफ़न
चोर’
लघुकथा में लेखक व्यंग्यात्मकता की सूक्ष्मता के सहारे समाज
में व्याप्त गरीबी की ओर संकेत करता है । कफ़न वस्तुतः समाज के
दिवंगत लोगों के लिये प्रतिष्ठा संकेत का सूचक है, जब इसके साथ
खिलवाड़ किया जाता है, तो समाज के चरमराते मूल्य का बोध होता
है । सिद्धेश्वर की लघुकथा
‘भविष्य’
में लेखक तीन माँओं के द्वारा अपने बेटे को क्रमशः डॉक्टर,
व्यापारी और क्लर्क बनाने पर जोर देता है, और व्यंग्य से कहता
है, क्लर्क लोग काफ़ी घूसखोर होते हैं, क्लर्कों की उपरी आमदनी
को संकेत से बतलाया जाना ही लघुकथा का अभिष्ट है ।
व्यंग्य का तात्पर्य यहाँ स्वाभाविक व्यंग्य से है, कृत्रिम
व्यंग्य से नहीं । आरोपित व्यंग्य के ताने-बाने में बनी लघुकथा
सफल लघुकथा नहीं मानी जा सकती । उदाहरण के तौर पर सनत मिश्र ने
अपनी लघुकथा ‘गिद्ध’
में मुख्य पात्र गिद्ध अपने शिशु से कहता है हम केवल मनुष्य का
माँस खाते हैं । यानी नेता मनुष्य की श्रेणी में नहीं आते ।
उपरोक्त कथा के माध्मम से मिश्र जी आज के अवसरवादी राजनीति के
प्रति एक गहरी वितृष्णा जगाते हैं, और एक स्वाभाविक व्यंग्य की
स्थिति पैदा करते हैं । दूसरी ओर शंकर पुणतांबेकर द्वारा
संपादित श्रेष्ठ लघुकथाएँ में राजस्थान के गौरव महाराणा प्रताप
को जंगल के एयर कंडीशन्ड गुफा में बैठाकर जनता के समर्थन के
लिए तिकड़में लगाते हुए दिखाया है, जो निंदनीय है । वर्तमान
राजनेताओं पर ऐसे तेजस्वी जुझारु व्यक्ति को फिट करना फूहड़ता
है ।
(3) थोड़े में अधिक कथन-
लघुकथा सतसैया के दोहरे जैसे गागर में सागर और जीवन की लंबी
फ़िल्म में टाइटिल म्युजिक की तरह हुआ करती है, छोटी होते हुए
भी इतनी तैयारी, इतनी सफाई, और कल्पना विस्तार अपने आप में
समेटे रहती है, यही महत्वपूर्ण विशेषता है । लघुकथाएँ इतनी
प्रभावी होती है कि पाठक को अनछुए, अनजाने, अद्भुत अनुभव और
एहसास क्षण भर में करा देती है । डॉ. अशोक अग्रवाल की लघुकथा
‘चयन’
के उदा. देखिये- ‘क्या
तुम तस्करी करते हो ?
नहीं । कभी कोठे पे गये हो ?
नहीं । ?
शराब पीते हो ?
नहीं । भाँग, चरस, गाँजा, अफीम खाते हो?
नहीं । सिगरेट तो पीते होगे ?
नहीं । और पान?
नहीं । तो फिर चुनाव क्यों लड़ना चाहते हो?
(4) एकात्मकता-
एकात्मकता लघुकथा की महत्वपूर्ण विशेषता है । लघुकथा के कथानक
की एकात्मकता के कारण इतनी सघनता रहती है, कि उसमें अतिरिक्त
वर्णन विस्तार के लिए कोई स्थान नहीं रहता । उसका लघु कलेवर
कथ्य में निहित एकात्मकता का परिणाम है ।
दूसरी ओर विषय का एकत्व लघुकथा के तत्वों को एकोन्मुखता की ओर
प्रेरित करता है । फलतः समय व कालसत्य के किसी अंश की गहनतम्
अभिव्यक्ति रहती है । एक ही विषय को कथ्य की गरिमा प्रदान करने
के साथ-साथ एक घटना या एक मनोभाव के नज़दीक पहुँचना और मानवीय
सत्यों को जोड़ना लघुकथा की अपनी विशेषता है । लघुकथा में विषय
या कथानक की एकात्मकता के साथ-साथ अभिव्यक्ति किसी एक पात्र
अथवा एक चरित्र विशेष में केंद्रीभूत हो जाती है, अन्य पात्रों
के समग्र चित्रण का लघुकथा में अभाव होता है।
लघुकथा में प्रायः जीवन के किसी एक समस्या का चयन करना होता
है, वहीं दूसरी ओर किसी एक सत्य को अभिव्यक्ति देने का प्रयास
होता है । परंतु कहीं-कहीं विशिष्ट परिस्थिति का चित्रण होता
है ।
किसी एक ही लघुकथा में विषय, कथानक और जीवन के एक समस्या का
चित्रण हमें एक साथ ही देखने को मिल जाता है । उदा. के रूप में
सुरेश उनियाल की लघुकथा
‘वजह’
देखिये-
‘वह
एक केले वाला था, सड़क के किनारे बैठा था, उसके सामने ठेले पर
केले रखे हुए थे । हमारे पास समय था, और हल्की-सी भूख भी लगी
थी, लिहाज़ा हमने उससे छह केले ले लिये और वही खड़े होकर खाने
लगे, तभी केले खाकर जाते दो लड़के को उसने रोका था । छोटा-सा
पैकेट जो वो वहीं ठेले पर छोड़ जा रहे थे उन्हें दे दिया । इस
पर हमारी प्रशंसात्मक नज़रों से उत्साहित होकर वह बताने लगा-
साहब हम गरीब हैं ज़रूर किसी की चीज़ पर नज़र नहीं रखते । कल
ही एक सरदार जी अपना बटुआ छोड़कर चले गये थे, जैसे ही मैंने
देखा मैं उनके पीछे भागी बस स्टैंड पर जाकर उन्हें पकड़ा और
बटुआ लौटा आया । मैंने यह भी कहा कि पैसे गिनकर देख लो कहीं कम
न हों, तो उन्होंने कहा जब तुम बटुआ लेकर यहाँ आ सकते हैं तो
पैसे कम नहीं हो सकते । हम तो साहब ईमानदार आदमी हैं, ईमान की
खाते हैं ।’
तुम्हारे फटेहाली देखकर अविश्वास की गुंजाईश नहीं रह जाती मेरा
साथी बुदबुदाया ।
(5) सांकेतिकता-
सांकेतिकता लघुकथा की महत्वपूर्ण विशेषता है । लघुकथा अनर्गल
विस्तार से दूर मात्र संकेत करती नहीं वरन् स्वयं एक संकेत हैं
। घटना का संगठित स्वरूप कथा के कथानक के आधार बनकर आता है ।
लघुकथा का रूप गठन और शब्द गठन सांकेतिक है । लघुकथा का लेखक
यह यों हैं का समूचा कथ्य उसी पर खड़ा करता है । इस प्रकार
आधारभूत विचार द्रवीभूत होकर संपूर्ण लघुकथा के रूप में चलता
हुआ आकार पा लेता है । स्थिर और स्पष्ट प्रभावान्विति को
सांकेतिक बनाने का श्रेय लघुकथा को है । सांकेतिकता के कारण
लघुकथा की प्रभावोत्पादकता अधिक बढ़ जाती है । फ़जल इमाम
मल्लिक की लघुकथा ‘झूठ’
का संकेत देखिये-
‘वह
ज़िंदगी भर झूठ बोलता रहा । और लोग उसे सच समझते रहे । आज उसने
पहली बार सच बोला था, और लोगों को उसकी बात पर यकीन नहीं आया ।’
(6) आधारगत लघुता-
आधारगत लघुता के कारण लघुकथा में स्थूल जगत की विवृत्ति अधिक
नहीं होती । आधुनिक लघुकथा की कथावस्तु प्रायः किसी एक व्यक्ति
को केंद्र मानकर निर्मित की जाती है । यह व्यक्ति जनसाधारण में
से कहीं से भी हो सकती है । प्रमुख पात्र एक प्रकार से लघुकथा
में नियामक का कार्य करता है । प्रमुख पात्र की असाधारण
संघर्षशक्ति या विवशता में मूल्यों को तोड़ता-छोड़ता हुआ वह
नैतिकता के बदले मूल्यों की व्याख्या कर जाता है । और इस सारी
संघर्ष यात्रा में व्यक्तिगत खोज के साथ-साथ सामाजिक तत्व भी
संलग्न रहते हैं । भगवती प्रसाद द्विवेदी की लघुकथा ‘जीवित
होने का दुख’
आधारभूत लघुता की विशेषता को दर्शाता है-
‘पत्र
पढ़कर रोने बिलखने के बजाय वह मुस्कुराने लगा । नौकरी की
जुगाड़ में वह महानगर आया था, मगर अभी तक भटकाव और डाट-डपट के
अलावा कुछ भी हाथ नहीं लगा था । चलो आठ बरस की बेटी मर गई तो
ठीक ही हुआ । भगवान ने एक बहुत बड़े बोझ से अपने आप छुट्टी
दिला दी । कम से कम उसके ब्याह में पंद्रह बीस हजार तो लगते ही
। खुशी से झुमता हुआ वह पास के ढाबे में पहुँचकर स्वादिष्ट
व्यंजनों के आर्डर यों देने लगा, जैसे उसके नाम लाटरी निकली
हो।’
तभी उसकी नज़र सामने के मेज पर झुके मथुरा काका पर पड़ी ।‘काका
गाँव से कब आए आप?
मथुरा काका को अचरज हुआ उसे ढाबे में देखकर पहले यह बताओ मेरी
बेटी को क्या हुआ था, उसकी आवाज़ यों निकल रही थी जैसे अभी रो
पड़ेगा ।
नहीं बबुआ बिटिया ससुरी इतनी जल्दी थोड़े ही मरती है । उसके
सिर पर कागा बैठ गया था । कहते हैं कि मौत की ख़बर अपने लोगों
से सुना देने पर मौत का डर ख़त्म हो जाता है, इसी कारण
तुम्हारे पास चिट्ठी पठाई गई थी । और मथुरा काका उसे वह पत्र
देने लगे, जिसमें मुनिया के मौत की ख़बर का खंडन किया गया था ।
इकलौती बेटी के जीवित होने की ख़बर सुनते ही उसके चेहरे पर
एकाएक मुर्दानी छा गई ।
(7) आधिकारिक कथा की प्रधानता-
आधिकारिक कथा की प्रधानता या कथानक की केंद्रीयता लघुकथा की
विशेषता है । लघुकथा विभिन्न बिंदुओं में, घटनाओं में, पात्रों
में बिखरी न होकर केंद्रित होती है । कहानी में जिस प्रकार से
मुख्य कथानक के अतिरिक्त सहयोगी सूत्रों, प्रासंगिक कथाओं और
वातावरण की व्याख्या, उपकथाओं और अंर्तकथाओं आदि उपकरणों से
कहानी का कैनवास विस्तृत बनाया जाता है । जबकि लघुकथा के कथानक
में उपर्युक्त उपकरणों में से कई प्रयुक्त नहीं होते । लघुकथा
की आधिकारिक कथा अपने गहन लिये विवश हो जाता है, उदा. देखिये-
‘मेहमानों
का जमघट लगा था । लड़की पसंद है । ज़्यादा नहीं तिलक में दस
हजार ? तब
तो रिश्ता मजबूत होगा । इतना रकम दस हजार कहाँ से लाऊँ इस
छोटी-सी नौकरी में घर का ख़र्च ही चलना मुश्किल है । तिलक नहीं
लगा सकते तो लड़की बैठाये रखो ।’
ये बातें प्रेमा सुन रही थी, वह बाहर आ गयी, उसने कहा पिताजी
मुझे तलुए चाटने के लिए कुत्ता नहीं पति चाहिए ।
(8) सामयिकता-
लघुकथाकारों द्वारा समय की माँग के अनुकूल लघुकथाओं का सृजन
करना भी इसकी विशेषता है।लघुकथा की सार्थकता उसकी सामायिकता
में निहित है । लघुकथा के सामने एक सुनिश्चित दिशा है, एक
व्यापक जीवन दृष्टि है । सामाजिक विकृति को कम समय में पढ़ने
लायक उद्घाटन की क्षमता है । इस मशीनी सभ्यता में लोगों के पास
व़क्त के लाले पड़ रहे हैं, आदमी स्वयं मशीन हो चुका है,
मोटे-मोटे आख्यान पढ़ने का समय किसी के पास नहीं है । आज का
व्यक्ति छने हुए सत्य को लघु रूप में पढ़ना चाहता है, जाहिर है
कि लघुकथाएँ साहित्य की अन्य विद्याओं की तुलना में अधिक
धारदारी से काम कर सकती है, बशर्तें कथानक प्रभावी हो । लघुकथा
समय की माँग के अनुकूल मानव मन की अतल गहराईयों को स्पर्श करती
है, और अंर्तमन को झंकृत कर देती है। लघुकथा की विशेषता है, वह
व़क्त छीनकर पाठक पैदा करती है।
(9) पाठकों के मन पर अमिट प्रभाव छोड़ने वाली-
जीवन के हर पहलू में घटित होने वाली घटनाएँ-सामाजिक धार्मिक,
आर्थिक, राजनैतिक या वैयक्तिक किसी भी विषय की सूक्ष्मता से
अवलोकन करने के उपरांत लघुकथा का सृजन किया जाता है । आदमी की
आदमीयता, उद्वेलन, उत्कंठा पाठकों के मनोमष्तिस्क में बिजली की
तरह कौंध पैदा करती है, यह कौंध क्षणिक नहीं अपितु मनोमष्तिस्क
पर अमिट प्रभाव छोड़ने वाली होती है । लघुकथा किसी भी अर्थ में
दनदानाती हुई गोली नहीं है, वह पाठकों के मन में सर्र से कभी
नहीं गुजरेगी, लघुकथा पढ़ते-पढ़ते झंकझोरती है, लघुकथा हमारे
जेहन पर अमिट छाप छोड़ जाती है । चंद्रप्रकाश गुप्ता की लघुकथा
‘कुत्ता
नहीं पति’
आज के सामाजिक संदर्भों को रेखांकित करती है, जिसे पढ़ने के
पश्चात मन कुछ सोचने को विवश हो जाता है । लघुकथा में बहुत कुछ
अनकहा भी होता ।
(10) गौण का संचालन-
गौण का संचालन लघुकथा की प्रमुख विशेषता है । गौण का संचालन
अर्थात रचना में गौण तथा गंभीरता होना आवश्यक है । गौण का
तात्पर्य भाषा की मसखरी न होने से है । लघुकथा में संकेतों की
जिज्ञासा अधिक होती है । रचना के अंत में संकेत की जिज्ञासा को
समाधान में परिणति दी जाती है । गौण का संचालन में परिवर्तन का
मोह होने पर लघुकथा के शिल्प को कमजोर बनायेगा ।
(11) संक्षिप्तता की बाहुल्यता-
संक्षिप्तता की बाहुल्यता लघुकथा
की विशेषताओं में से एक है । संक्षिप्तता की बाहुल्यता से
तात्पर्य में जिस घटना चक्र की विषय वस्तु बांधनी हो, उसमें
शाब्दिक प्रहार नहीं होती, बल्कि फ़ोटो कैमरा सी क्रिया अंकित
होती है । संक्षिप्तता से तात्पर्य वर्णनात्मक प्रवृत्ति का
नहीं होना है, वरन् लघुकथा छह से दस पृष्ठों की भी हो सकती है
। लघुकथा में वर्णनात्मक प्रवृत्ति, मिश्रित कथ्य एवं कथोपकथन
का मज़मा खड़ा नहीं किया जाता । लघुकथा में आडम्बरों से संधि
नहीं की जाती । विभिन्न पात्र एकत्रित नहीं किये जाते। यही
लघुकथा की अपनी महत्वपूर्ण विशेषता है । सूत्रों की वज़ह से
कहानी के विस्तृत कैनवास के बावजूद लघुकथी की प्रभावोत्पदकता,
ग्राह्मता और लोकप्रियता की दृष्टि से समर्थ है ।
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