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सृजनगाथा

 

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वर्ष-2, अंक-21, फरवरी, 2008

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।। मित्र-प्रसंग ।।

 

 

प्रतिबद्ध बौद्धिक रचनाकार


 उदय प्रकाश

 

एक

शैलेंद्र के साथ मेरी अब तक हुई मुलाकातों की कुल अवधि कितनी होगी? शायद सब कुछ को जोड़ा जाय तो चौबीस घंटे का पूरा एक दिन भी नहीं बनता। अब तक कुल जमा तीन-चार या पाँच मुलाकातें। सभी संक्षिप्त। ऐसी, जिनमें किसी बात का कोई एक सिरा कहीं से शुरू होता है और फिर बीच में ही कहीं छूट जाता है। हम कहीं गहरे डूबते चले जाते हैं। किसी शोक, पाश्चाताप या फिर किसी बेचैन अंतर्द्वंद्व से भरे गहरे कुए के जल में। अतीत के किसी भग्न खंडहर की प्राचीन बावड़ी का पाताल। इसके बाद अगर कोई बात होती भी है तो वह दो डूबे हुए लोगों का असंबंद्ध-सा संवाद होता है। बिखरता हुआ, गहरा, विकल करने वाला वार्तालाप, लेकिन शायद उस गहरे जल जैसा ही पारदर्शी, अतल तक जाने वाला, जिसमें हम उस समय एक दूसरे से बिल्कुल असंपृक्त अलग-अलग डूबे हुए हैं।

 

'अधूरी और सतही ज़िंदगी के गर्म रास्तों पर

हमारा गुप्त मन

निज में सिकुड़ता जा रहा....

दिल का खून

जो भीतर हमेशा टप्प-टपकर टपकता रहा

पिराते से ख़यालों पर...

कीमती मज़मून

गहरी, ग़ैर-कानूनी किताबों, ज़प्त परचों का....' (मुक्तिबोध)

 

शैलेंद्र को कवि और एक प्रतिबद्ध बौद्धिक रचनाकार के रूप में जानते हुए कई वर्ष हो गये। लगभग तीन दशक। जब उसने अपनी पत्रिका 'धरती' का त्रिलोचन अंक निकाला था, तब शायद पहली बार मैंने उसे पत्र लिखा। पोस्टकार्ड। पता नहीं शैलेंद्र को उस पत्र की आज याद भी है या नहीं। आज भी, जब हमारे अपने समय के वयोवृद्ध महाकवि त्रिलोचन स्मृति-क्षीण अपनी अंतिम शैया पर हैं, उनके सृजन पर केंद्रित 'धरती' का वह महत्वपूर्ण अंक अक्सर याद आता है।(लेख लिखते समय स्व. त्रिलोचन रुग्णावस्था में थे) शैलेंद्र का यही वह निजी गुण है, जो उसे बहुतों से अलग करता है। और यही वह वजह है, जिसके चलते फकत तीन-चार संक्षिप्त मुलाकातों के बावजूद उसे दोस्त मानने और कहने में मन के भीतर कोई दुविधा नहीं होती। इस लगातार छले जाते समय के बावजूद,जिसके बारे में हेनरी लेफेबेयर ने कभी कहा था -'एवरीवन इज़ डिसीविंग एंड एवरीवन इज़ डिसीव्ड', शैलेंद्र के होने पर एक भरोसा-सा होता है। अगर मैं उसकी निजता के उस खास गुण को पकड़ना चाहू तो वह है उसके भीतर हमेशा मौज़ूद रहने वाली एक विरल क़िस्म की संज़ीदगी, एक तरह की तल्लीन प्रतिबद्ध गंभीरता। चाहे वैयक्तिक संबंध हों या फिर सामाजिक विचार, वह कभी 'चलताऊ' या 'कैज़ुअल' नहीं हो पाता। उसके हाथों छले जाने का डर नहीं उपजता। निहत्था, बेलाग, निष्कवच उससे मिला जा सकता है और उससे जमकर वैचारिक लड़ाई की जा सकती है, बिना किसी किस्म की गांठ के बंधन जाने की आशंका के। उसकी बौद्धिकता और संवेदना के बीच, शब्द और कर्म के बीच, कहने और करने के बीच वैसी फाक नहीं मिलती, जिसे अपने समय में अक्सर बहुतायत में देखने के हम आदी हो चुके हैं। कोई मुखौटा नहीं है उसके पास, वह जैसा है, वैसा ही है। अपनी तरह का अक्खड़ और फक्कड़ और व्यग्र।

 

दो

अभी हाल में ही उसकी एक कविता 'कबीर' पर प्रकाशित हुई है, उसी के कुछ शब्द लेकर कहू तो, '.....

तांत, तुम्हारी रगें' और....'तन, तुम्हारा रबाब'

किसी दस्तकार की तरह, कुम्हार या जुलाहे की तरह शैलेंद्र एक ऐसा हुनरमंद दोस्त कवि है, जिसकी चेतना और देह को, उसके भौतिक और प्रकट अस्तित्व को उस काम से अलगाया नहीं जा सकता, जो काम उसने अपने हाथ में ले रखा है। अगर उसे पहचानना हो तो उस चादर के ताने-बाने को गिनो, जिस चादर को वह पूरी तन्मयता के साथ अपने पुराने करघे पर चढ़ाकर चुपचाप बुनने में लगा है। दत्त-चित। किसी बच्चे जैसी अबोध तन्मयता के साथ। अगर उसके जीवन के लय और संगीत को सुनना चाहते हो तो उसके घूमते हुए चाक पर रखी सुराही और उसकी व्यस्त उगलियों को गौर से देखो, तुम्हारे कान में कोई धुन ज़रूर सुनाई देगी।

 

हिंदी कविता में लगभग भुला दिये गये कवि शील जी के बारे में जब वह बात करने लगता है, तो अचानक गुस्से और प्रेम में डूबे एक छोटे-से बच्चे की तरह हो जाता है। 'साइकिल के पेडल मारते आते थे शील जी! कड़क चाय बनाते और पिलाते थे। अपना पूरा जीवन उन्होंने उन स्वप्नों और विचारों को समर्पित कर डाला, जिन्हें अब सब लोग इस तथाकथित उत्तर-आधुनिक समय में एक 'असंभव रोमेंटिक यूटोपिया' कहने लगे हैं। मनुष्यों के बीच बराबरी का, समता का, शोषण-विहीन, वर्ग-विहीन, उत्पीड़न और पूजी की हिंसा से मुक्त एक समाज के निर्माण का स्वप्न।' उसकी आँखें डबडबा जाती हैं। आवाज़ थरथराती है।

 

'शील जी जनकवि थे। सचमुच के अर्थों में। उन्होंने अपनी कविता को जनसमूह तक ले जाने के लिए, उसे बहुत परिश्रम और कठिन साधना के साथ 'डी-क्लास' किया था। आज के बहु-पुरस्कृत, आलोचक-संस्थान-प्रिय,शहरी उच्च-मध्यवर्गीय जुगाड़बाज कवियों की तरह वे भी बहुत आसानी से विश्वविद्यालयों के अध्यापकों द्वारा बनाई गई प्रगतिशील कविता की सूची में प्रतिष्ठित हो सकते थे। किसी गर्हित दारूपार्टी में शरीक होकर, साहित्य के रसिक अफसरों के साथ माक्र्सवाद और जनवाद की लफ्फाजी कर सकते थे। तमाम तरह के समझौतों के लगातार अवसर उनके सामने थे। कौन था उस समय उन जैसा लोकप्रिय और प्रतिबद्ध कवि ? उनके नाटकों के सौ से ज्यादा मंचन सोवियत रूस में लेनिनग्राद में हुए। उनमें से एक नाटक था -'किसान'! अब तो न सोवियत संघ रहा और न लेनिनग्राद....! पृथ्वी थियेटर ने उनके लिखे नाटकों को जगह-जगह खेला...! राज कपूर ने उनमें अभिनय और निर्देशन किया ...! क्या हुआ उनकी स्मृति को? हम उन्हें भूल क्यों गये? ...कौन से वे घुन और दीमक हैं, जो उनकी स्मृतियों के ऊपर खुद अपने कबीले-कुटुंब के साथ छा गये हैं? शील को उनका श्रेय देने की जगह, जिन्होंने ख़ुद को प्रतिष्ठित करने के लिए उसी संगठन को जरिया बनाया, शील जी ने जिसके लिए अपना जीवन होम कर डाला।'

 

शैलेंद्र की आँखें छलछला जाती हैं। यह स्वीकारने में मुझे कोई झिझक नहीं कि 1990 के बाद, जब आवारा विश्वपूँजी का साम्राज्य सारी दुनिया में तेजी से फैलने लगा और उसने तमाम मानवीय और सामाजिक मूल्यों को चट करना शुरू कियाशैलेंद्र उन कुछ गिने-चुने दोस्तों में से एक था, जिसने अपनी चेतना को इस तेज अंधड़ के हवाले नहीं किया। किसी पतित अवसरवादी की तरह किसी हाक़िम-मंत्री का चापलूस बनकर उसने कवि या लेखक के रूप में अपना कैरियर बनाने की कोशिश नहीं की। भूमंडलीकरण की तेज चपेट मे हमारे अपने साथियों और मित्रों के 'चाल-चेहरे और चरित्र' तेजी से बदल रहे थे। वे तेजी से नव-उपभोक्तावादी 'ग्रेट इंडियन मिडिलक्लास' का हिस्सा बने हुए सत्ताधारी दलों के नेताओं-मंत्रियों और सरकारी अधिकारियों के दरबारी बनने की होड़ में लग गये थे। साहित्य के जनतांत्रिक इलाके में गिरोहबाज लुटेरे, दया नायक और बंजारा जैसे 'फर्जी एनकाउंटर' करने वाले पुलिस अफसर, सुपारी उठाकर ईमानदार और प्रतिबद्ध रचनाकारों की हत्या करने वाले डोमा जी के वंशज आलोचक गश्त लगा रहे थे। ऐसे में नागार्जुन, ज़रुल, मुक्तिबोध और शील जैसे कवियों को याद करना, दरअसल एक ऐसे 'क्रिटीक' के निर्माण का प्रयत्न था, जिसके माध्यम से स्वयं हम अपनी छिन्न-भिन्न होती आस्थाओं और विचारों को बचाये रख सकते थे।

 

शैलेंद्र कहता है : 'शील जी से बात करने पर पता चलता था कि कविता के सौंदर्यशास्त्र की कितनी मर्मज्ञता उनके भीतर थी। लेकिन उन्होंने अपने स्वप्नों, मूल्यों और विचारों के लिए अपने 'एस्थीट' की बलि दे दी। दस-दस हज़ार लोगों के जन-समूह को घंटों अपनी कविताओं के प्रभाव से बांधे रखना कोई मामूली बात नहीं। कानपुर के औद्योगिक कामगारों और खेत-मजूरों के भीतर वर्गचेतना पैदा करने के लिए उन्होंने अपनी कविता को उस महायज्ञ की समिधा बना डाला। लगता है जैसे मुक्तिबोध ने उन्हीं के लिए लिखा था -

 

तुम्हारे पास, हमारे पास, / सिर्फ एक चीज़ है-/ ईमान का डंडा है, /

बुध्दि का बल्लम है/ अभय की गेंती है/ हृदय की तगारी है-तसला है/नये नये

बनाने के लिए भवन/ आत्मा के मनुष्यों के.../ हृदय की तगारी में ढोते हैं हमीं

लोग/ जीवन की गीली और महकती हुई मिट्टी को..../'

 

शैलेंद्र के जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा गाँवों के जीवन की गीली और महकती हुई, सूखती और दरकती हुई मिट्टी के बीच ही बीता है। उसका बचपन किसी नगर-महानगर के एम.आइ.जी., एच.आइ.जी. फ्लैट के कलात्मक टेराकोटा के नक्काशीदार गमलों में रोपे गये प्रदर्शनकारी पौधों की तरह कभी नहीं था। जब वह अपने बचपन की स्मृतियों में लौटता है तो मेरे सामने मेरे अपने अतीत की बिल्कुल जानी पहचानी दुनिया के दरवाज़े खुलते हैं। ननिहाल पहुँचने का रास्ता, रेलगाड़ी, बस, बैलगाड़ी....कच्ची-पक्की पगडंडियाँ, जंगलों, अमराइयों और खेतों के बीच या मेड़ों पर से जाती हुईं। सफर में साथ माँ और साथ के झौआ में पूरियों, अचार और आलू की सब्जी की पुटली। और फिर गाँव...! वहाँ का जीवन, मिट्टी-पानी, कीचड़, आंसू-पसीने और त्यौहारों के रंगों-स्वादों में सना-पगा जीवन।

 

शैलेंद्र के लिए लोकजीवन किसी सेमिनार या किताब के जरिये सीखा गया शब्द नहीं है। लोकधर्मिता अपने बचपन के साथ उसकी शिराओं में बहने वाली एक अदृश्य नदी का नाम है। ऐसा बचपन जिसमें चॉकलेट और मल्टीप्लेक्स नहीं हैं, वीडियोगेम्स, मोबाइल्स और साइबर कैफे नहीं हैं, टाई, जूते, रंगीन बैग, टिफिन और स्कूल बसेज़ नहीं हैं। वहाँ एक प्रायमरी पाठशाला है, कच्ची-पक्की पहली कक्षा है, जिसमें एक चकित-सा बेहद संवेदनशील बच्चा है, जो अपनी काठ की पट्टी को घोंटना और चमकाना सीख गया है, जो बर्रू से वर्णमाला लिखना सीख रहा है। घर के ओसार या स्कूल के आसपास किसी पेड़ के नीचे सबसे अलग बैठा हुआ ब्लेड से कलम की नोक छील रहा है। जितनी अच्छी कलम की नोक होगी, अक्षर और शब्द उतने ही सुंदर बनेंगे।

 

तीन

मिटटी, पानी, काठ और उगलियों से बने अक्षर पाटी पर जन्म लेते हैं। खपरैल की छत से धूप और बारिश पाठशाला के अंदर आती है। पंडित जी बारह खड़ी रटाते हैं। नाना जी का हुक्का गुड़गुड़ाता है। गाँव में गन्ने की पेराई होती है, कड़ाह में गुड़ खदबदाता है और उसकी गंध भविष्य तक पहुंचती है। शैलेंद्र अपने बचपन की स्मृतियों पर कुछ नोट्स तैयार कर रहा है। लगता है जैसे उसके मस्तिष्क में एक कोई बेहद संवेदनशील कैमरा लगा हुआ है जो स्मृतियों के असंख्य उजले-अंधेरे बिबों को धीरे-धीरे, शब्दों और भाषा के परदे पर तल्लीनता के साथ दर्ज़ कर रहा है। क्या यह कोई नयी किताब बन रही है? डॉ. रामविलास शर्मा की 'अपनी धरती अपने लोग' जैसी या फिर बर्गमेन की 'जादुई लालटेन' जैसी या फिर हरिवंश राय बच्चन की 'क्या भूलूं क्या याद करू' जैसी। या अभी हाल में पढ़ी गई मार्क्वेज़ की 'लिविंग टु टेल दि टेल' जैसी। मैंने अभी-अभी शैलेंद्र के बचपन के बेतरतीब नोट्स पढ़े हैं। उनमें स्मृतियों का जादू है।

 

शैलेंद्र के पिता प्रायमरी स्कूल के मामूली अध्यापक थे। शायद शैलेंद्र ने अपनी बेलाग अक्खड़ता अपने पिता से ही विरासत में पाई है। जैसे शैलेंद्र एक के बाद एक नौकरियां बदलता-छोड़ता रहा, उसी तरह उसके पिता को लगातार ऐसे दुर्गम पिछड़े इलाकों और गांवों में तबादलों पर भेजा जाता रहा, जहाँ न सड़कें थीं, न सिनेमा हाल, न लकदक बाज़ार। कभी किसी बस अड्डे के पास खाली पड़ी धरमशाला, कभी गाँव के किसी नेक किसान का घर, कभी कहीं और......! मां किसी कोने में ईंटे जोड़ कर अपना चूल्हा बना लेतीं और पतीले में भात-दाल खदबदाने लगता। तिनका-तिनका जोड़ कर, इस डाल से उस डाल, इस जंगल-गाँव से उस जंगल-गाँव का बसेरा.... गाँवों के हाट-बाज़ार, रामलीला के हनुमान और राम रावण, गली की पंसारी की दूकान में मिलते 'लेमंचूस' और मीठी गोलियां, खेतों के साथ दिन रात जूझते किसान, उनके कठिन जीवन के ब्यौरे। कजलैयां, फाग, दशहरे, दीवाली का उल्लास। पहली पहली बार गाँव में पहुँचने वाला रेडियो। बजरंग सिंह की क्रूरताएँ, दीवालों और आहातों के साथ-साथ गाँवों-मोहल्लों में लगातार मज़बूत होते जाते वैमनस्य और कटुताओं के संवेदनशील किस्से। ....अगर शैलेंद्र ने ज़ल्दबाजी नहीं की और इत्मीनान से, धैर्य और अपेक्षित संलग्नता के साथ उसने इन स्मृतियों को कागज़ पर उतारा, तो यह उसका बहुत बड़ा योगदान होगा। 'अकाल वेला', 'हरिजन गाथा', 'ठाकुर का कुआँ', 'ताई', 'कफन' या 'गोदान' शैलेंद्र के लिए किन्हीं किताबों में देखी-पढ़ी गईं साहित्यिक रचनाओं भर के नाम नहीं हैं, ये सब उसकी अपनी आखों के सामने, उसके बचपन से लेकर आज तक के जीवन के इर्दगिर्द घटती घटनाओं के प्रत्यक्ष आख्यान हैं।

 

अभी सात-आठ साल पहले, जब मैं दिल्ली के रोहिणी इलाके में रहता था, एक दिन उसका फ़ोन आया, 'मेरी पोस्टिंग फरीदाबाद में हो गई है। तुमसे मिलना है।'

 

वह शायद पहला मौका था, जब मैंने उसे ठीक से देखा। मैं उन दिनों भी अनिश्चितताओं से भरी ज़िंदगी से गुज़र रह । हमने देर तक बात की। दुनिया एक ध्रुवीय हो चुकी थी। विकास का एक ही मॉडल सभी सरकारों के पास था। देश में कोई ऐसा राजनीतिक दल नहीं रह गया था, जो कहीं न कहीं सत्ता में न हो। अब तक की सभी सामाजिक-राजनीतिक शक्तियाँ सत्तासीन थीं। दूसरी तरफ किसान आत्महत्याए कर रहे थे, बेरोजगारी हर रोज बढ़ती जा रही थी, हमारे बीच के लोगों के चेहरे बदल गये थे। लेखक-कवियों के बीच कटुता और द्वेष, प्रतिद्वंद्विता और होड़ कई तरह के नैतिक स्खलन और चारित्रिक लंपटता को जन्म दे रहे थे।शैलेंद्र के चेहरे पर चिंताओं की गहरी लकीरें थीं। मैंने तभी ध्यान दिया था कि उसकी आंखों में से बचपन अभी तक विदा नहीं हुआ है। वह अभी भी बर्रू से पाटी पर नये युग की नयी वर्णमाला लिखने का स्वप्न देखता है।वे आँखें स्वप्न देखती आँखें हैं।

 

इसके बाद मैं उससे एक बार ही और मिल सका। नागपुर के 'पहल' कार्यक्रम के अवसर पर। हम लोग तीन दिनों तक मिलते रहे। मैं अपने बचपन के दोस्त नामदेव लाघवे के घर पर रुका था। परशुराम हरने पॉल और नायडू वहीं आ जाते थे। तब तक मैंने 'मैंगोसिल' कहानी नहीं लिखी थी। इस कहानी की मूल अवधारणा पर पॉल, लाघवे और शैलेंद्र के साथ कई बार बातचीत होती रही। बाद में 'पहल' में 'मैंगोसिल' प्रकाशित हुई। यह कहानी लाघवे, शैलेंद्र और पॉल को ही समर्पित है। पॉल उस कहानी को पढ़ने का बेसब्री से इंतजार कर रहा था। कहानी 'पहल' में प्रकाशित हुई और तभी हमें नियति की एक मार्मिक विडंबना का सामना करना पड़ा। चंद्रपुर के इलाके में दलितों और भूमिहीनों की एक मीटिंग में बोलते हुए पॉल अचानक गिर पड़ा। उसे ब्रेन हैमरेज हो गया था। पॉल अब हमारे बीच नहीं है। वह मेरी कहानी, जो उसे ही समर्पित थी, कभी नहीं पढ़ सका। लेकिन नामदेव लाघवे और मैं अभी हैं। शैलेंद्र भी है। और हम अभी मिटे नहीं हैं। हमारे साथ बहुतेरे हैं।