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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-21, फरवरी, 2008

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।। संस्मरण ।।

 

 

कितने कमलेश्वर ?


 डॉ.  सी. जय शंकर बाबू

 

लमेश्वर... इस शब्द में कोई मुद्राराक्षस नहीं है, श्रद्धेय कमलेश्वर जी के प्रति यह मेरी कलम से निसृत श्रद्धापूर्ण संज्ञा है । कमलेश्वर नाम में तो ईश्वर है ही, मगर अनन्य कलमकार के रूप में कमलेश्वर जी इस संज्ञा के पात्र भी हैं । सामाजिक एवं मानवीय सरोकारों से परिपूर्ण उनके दायित्वपूर्ण लेखन के परिप्रेक्ष्य में कमलेश्वर जी के ईश्वरीय गुणों के प्रति यह सार्थक संज्ञा भी है ।

     

कमलेश्वर जी के लेखकीय सरोकारों के दायरों की अभिव्यक्ति उन्हीं की इन पंक्तियों में द्रष्टव्य है– “…मैं मनुष्य के लिए राजनीति में विश्वास करता हूँ, राजनीति के लिए मनुष्य में नहीं । ये दोनों स्थितियाँ उनती विरोधी नहीं हैं, जितनी कि आज के समय-संदर्भ में बन गई हैं । और जो स्थिति आज है, वही यथार्थ है - आदर्शों के सीमांत पर तो अंततः सब ठीक साबित हो सकता है । पर आदर्शों तक पहुँचने की राह में मनुष्य को कितना छला गया है, और कितना छला जाता है, इस नज़रअंदाज कैसे किया जा सकता है ? यातनाओं के जंगल से गुज़रते मनुष्य की इस महायात्रा का जो सहयोगी है, वह आज का लेखक है। सह और समांतर जीनेवाला, सामान्य आदमी के साथ।

     

वरिष्ठ कथाकार एवं उपन्यासकार कमलेश्वर जी के कृतित्व के संबंध में अथवा उनकी तमाम उपलब्धियों की व्याख्या करना यहाँ मेरा आशय नहीं है । उनके विराट व्यक्तित्व के संदर्भ में तथा अपने साथ उस मनीषी के संपर्क के परिप्रेक्ष्य में उनकी स्मृति में चंद पंक्तियाँ लिखना मैं अपना कर्तव्य मानता हूँ । आज से बारह साल पूर्व जब युग मानस के प्रवेशांक की सजावट में मैं व्यस्त था, तभी संपादकीय लेखन के बहाने साहित्यकारों के सामाजिक दायित्व के विषय पर गहरा चिंतन-मंथन करने लगा था । परणामतः प्रथम संपादकीय साहित्य एवं साहित्यकार के दायित्व पर केंद्रित हुआ । संपादकीय की चंद पंक्तियाँ ऐसी थीं – “अपने साहित्य के द्वारा जन मानस पर अमिट प्रभाव डालकर उनके मानस में कर्तव्यनिष्ठा जागृत कराना साहित्यकार का दायित्व है। समाज से अकर्मण्यता की जड़ को उखाड़ फेंकना साहित्य का उद्देश्य है । व्यवहारगत तथा वैचारिक प्रदूषण से समाज तथा जनमानस को बचाने की क्षमता रखनेवाला पारिस्थितिक विज्ञानी साहित्यकार ही है।  अतः समाज के प्रति उसका बहुत बड़ा उत्तरदायित्व है । वैचारिक संकट की समसामयिक परिस्थितियों से चुनौती लेकर आगे बढ़ना आज उसका परम कर्तव्य है ।  युग मानस के दूसरे एवं तीसरे अंकों में भी साहित्यकार के कर्तव्यों पर केंद्रित विचारधारा को जानबूझकर ही मैं स्थान देता रहा । दूसरे अंक की कुछ पंक्तियाँ ऐसी थीं – युग चेतना के द्वारा ही आज उपयुक्त साहित्यिक-शर संधान हो सकता है । ह्रासोन्मुख नैतिक मूल्यों के दौर में साहित्यकार का दायित्व और भी बढ़ रहा है । वह अपनी कर्तव्य-निष्ठा का पालन आज कुछ कहते हुए पूरा नहीं कर सकता, उसे क्रियात्मक कार्य भी करना पड़ेगा। मूल्यों की रक्षा उसका परम कर्तव्य  है ।... कुल मिलाकर अपने संपादकीयों के माध्यम से साहित्यकारों से मेरी अपेक्षा यही थी कि केवल वे कुछ कहनेवाले बनकर न रह जाए, कुछ करने वाले भी बनें । आरंभिक संपादकीय लेखों में अभिव्यक्त मेरे विचारों के प्रशंसक वरिष्ठ साहित्यकारों में से कमलेश्वर जी भी एक थे । हिंदीतर प्रदेशों से निकली एक लघुपत्रिका के प्रति ऐसे शीर्षस्थ साहित्यकारों की आत्मीयता प्राप्त होना पत्रिका या पत्रिका के संपादक अथवा उनके विचारों के प्रति अभिव्यक्त आत्मीयता के रूप में अवश्य मान सकते हैं । मगर इससे बढ़कर इसे उन उद्भट साहित्यकारों की उदारता एवं उदात्तता के पुट के रूप में कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ।  आज ऐसे कितने कलमेश्वर हैं, जो कनिष्ठों का सदा ख्याल रखते हैं ?

 

वैसे विगत एक दशाब्दी की अवधि में सैकडों छोटे-बड़े साहित्यकारों से मेरी मुलाक़ातें हुईं। कई शीर्षस्थ साहित्यकारों के साक्षात्कार लेने का भी मुझे सौभाग्य मिला । सबसे बड़ी बात यह है कि चंद शीर्षस्थ साहित्यकारों की आत्मीयता मुझे बराबर प्राप्त होती रही है । ऐसी आत्मीयता से सदा मुझे उत्तेजित एवं उत्साहित करनेवाले साहित्यकारों में कमलेश्वर जी भी एक थे । थे कहते हुए मेरी आंखें सजल बन जाती हैं । शिखर कथाकार कमलेश्वर जी के स्वर्गवास होने की ख़बर जैसे ही रेडियो के माध्यम से मुझे मिली, तत्काल उसे मानने के लिए मैं तैयार नहीं हुआ । सदा सक्रिय एवं गतिशील रहनेवाले कमलेश्वर जी के आकस्मिक निधन की खबर जब सच निकली, मैं निस्तब्ध रह गया । यह भी बड़ी विडंबना रही कि इधर दक्षिण के कई अखबारों में न ही उनके निधन की कोई ख़बर छपी मिली, न उनका चित्र ।

 

हिंदी के प्रति मेरे अल्पतम प्रयासों के प्रति भी कमलेश्वर जी के मन में बड़ी श्रद्धा थी ।  युग मानस का प्रकाशन जब से शुरू हुआ, तभी से कमलेश्वर जी के आत्मीय पत्र मुझे मिलने लगे थे ।  हर कोई पत्र वे स्वयं लिखते थे, उनकी सुंदर लिखावट से एवं उनकी आत्मीयतापूर्ण अभिव्यक्ति से परिपूर्ण पत्र आज मेरे लिए धरोहर हैं । उनके एक पत्र का उल्लेख यहाँ मैं करना चाहता हूँ ।

 

प्रिय जय शंकर जी,

      युग साहित्य मानस मिला । इस पत्रिका ने राहुल जी की अवधारणा को पुष्ट किया है कि हिंदी मात्र एक भाषा नहीं बल्कि एक भाषा मंडल है । इस विकसित हिंदी का श्रेय उन्हें है जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं है... यही वह दकनी हिंदी है जिसने खड़ी बोली को स्तरीय भाषा में ढाल कर बोलचाल और साहित्य लेखन के अनुरूप बनाया है । खड़ी बोली जन्मी तो उत्तर में पर उसे दकन (दक्षिण) ने ही भाषा बनाया है... आप बड़ा काम कर रहे हैं – गुंतकल से पत्रिका निकाल कर भी आप पूर्वोत्तर भारत की हिंदी परंपरा को रेखांकित कर रहे हैं – इस तथ्य और प्रयास का पता मुझे पाठकों के पत्रों से चला... क्योंकि पिछला अंक मैं नहीं देख सका हूँ । काज़ी नज़रुल इस्लाम के जिन समय शोधित शब्दों से आपने पत्रिका की शुरूआत की है, वही इस देश की आत्मा का सारतत्व है ।..

शेष शुभकामनाएं

सस्नेह

कमलेश्वर

इधर-उधर से मेरे बारे में कुछ भी पढ़ने को मिल जाए, उसका जिक्र करते हुए अवश्य पत्र लिखते थे । उनकी सुंदर लिखावट की चिट्टियाँ बार-बार पढ़ने के लिए मन करता है । जब मुझे मैसूर विश्वविद्यालय से पीएच.डी. की उपाधि मिली, तब मेरी श्रीमती राधिका के नाम से मिली कमलेश्वर जी की चिट्टी की कुछ पंक्तियाँ यहाँ उद्धृत हैं – श्री जय शंकर बाबु को मैसूर वि.वि. से डाक्टरेट की उपाधि मिलने के उपलक्ष में मेरी समस्त शुभकामनाएं । दक्षिण भारत की हिंदी – पत्रकारिता विषय पर यह निश्चय ही मानक ग्रंथ होगा, और शायद पहला ग्रंथ भी । उन्हें मेरी ओर से बहुत-बहुत बधाई ।

 

आज ऐसे कितने साहित्यकार हैं, जो अपने समय के एक साधारण साहित्य-प्रेमी तक का ख्याल रखते हैं, उनके सुख-दुःख में भी साथ रहने का आश्वासन जगा देते हैं । कमलेश्वर जी सच्चे अर्थों में ईश्वरीय गुणों के प्रतीक थे । आज दूसरों की प्रगति देखकर आँखों में अंगार डालने की मानसिकता बढ़ती जा रही है, ऐसे परिवेश में भी कमलेश्वर जी जैसे उदार स्वभाव के साहित्यकारों के रहते स्थिति कुछ आशावह नज़र आती थी । अपने पाठकों को, किसी प्रकार के भेदभाव के बिना उनके हर किसी पत्र का बड़ी निष्ठापूर्वक जवाब लिखने की परंपरा में अग्रगण्यों के रूप में मैं वरिष्ठ साहित्यकार पर श्रद्धेय विष्णु प्रभाकर जी, एवं वरिष्ठ पत्रकार पूज्यवर श्री मुनींद्र के नाम यहाँ आदर के साथ लेना चाहता हूँ । विष्णु प्रभाकर जी अपनी पचानवे वर्ष की आयु में आज भी इतनी निष्ठा के साथ इस नियम का पालन करते हैं कि उनकी तत्परता, निष्ठा एवं आत्मीयतापूर्ण पत्र पाकर उनके तमाम पाठक बड़ी तन्मयता का अनुभव करते हैं । ऐसी आत्मीयता के शिखर पुरुषों के प्रति सदा पाठक जगत के मानस पटल में श्रद्धा के सुमन विकसित होते रहते हैं । कमलेश्वर जी भी इसके अपवाद नहीं हैं ।

 

दक्षिण के कुछ साहित्यकारों के साथ साहित्यिक चर्चाओं के दौरान कई बार यह बात सामने आई कि साहित्यकारों की उपलब्धियों के आकलन में लिखे जाने वाले लेखों में एक साहित्यकार अपने समकालीन वरिष्ठ साहित्यकारों का जानबूझ कर ख़्याल नहीं रखता है, क्योंकि कहीं उनकी वरिष्ठता को चोट न पहुंच जाए । ऐसे दूषित माहौल का सही जवाब देने में विष्णु प्रभाकर जी, कमलेश्वर जी सबसे आगे रहे हैं । जब मैंने डॉ. बालशौरि रेड्डी जी पर केंद्रित अंक निकालने का संकल्प लिया, तभी रेड्डी जी के बारे में बड़ी उदारतापूर्वक कमलेश्वर जी ने जो राय दी थी, उसे पढ़कर रेड्डी जी आज भी अभिभूत हो जाते हैं । कमलेश्वर जी मुझे संबोधित पत्र में लिखा था — डॉ. बालशौरि रेड्डी एक व्यक्ति नहीं – संस्था हैं । उन्होंने हिंदी की जितनी सेवा की है और जो उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं,  वे एक वीतराग भाषा-संत की उपलब्धियाँ हैं – निष्काम, निःस्वार्थ काम करनेवाले भारतीय की अनुपम मिसाल हैं – डॉ. बालशौरि  रेड्डी । वर्तमान तो उन्हें सम्मान देता ही है पर भविष्य उन्हें उस इतिहास पुरुष के रूप में याद करेगा, जिसने हिंदी के माध्यम से इस देश को जोड़ा है ।

     

कमलेश्वर जी की इन पंक्तियों में रेड्डी जी की उपलब्धियों की जितनी गरिमा के साथ व्याख्या की गई है, उसमें कमलेश्वर जी का बड़प्पन ही नहीं, अपने समकालीन साहित्यकार के प्रति उनके मन में छिपी आत्मीय भावनाएं भी सहज ही उजागर हो जाती हैं । कमलेश्वर जी साहित्यिक क्षेत्र के जितने बड़ी हस्ती थे, उससे बढ़कर आत्मीयता के उतने ही विशिष्ट प्रतीक थे । ऐसे उदारचेता साहित्यकार कमलेश्वर जी का आकस्मिक निधन से साहित्यिक जगत निश्चय ही काफ़ी शोकाभिभूत हुआ है । मुझ जैसे उनके श्रद्धालुओं को तो आंसू भरी आंखों से दुखियारे बनकर पछताना ही पड़ रहा है । कमलेश्वर जी के स्वर्गस्थ आत्मा को चिर शांति मिलने की कामना के साथ... श्रद्धांजलि सहित...

  डॉ. सी. जय शंकर बाबु

संपादक, युग मानस

18/795/एफ/8-

तिलक नगर, गुंतकाल, आंध्रप्रदेश - 515801

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

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