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सृजनगाथा


 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-21, फरवरी, 2008

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।। पुस्तकायन ।।

 

 

सभी आयामों को उकसाने वाली आलोचना


(पद्मश्री)रमेशचन्द्र शाह

            

मेश दवे की आलोचना हमारे भीतर पैठे बौद्धिक आलसस्य को झँझोड़कर रचना को उसके सभी आयामों में देखने-परखने का उकसाने वाली आलोचना है। वे उन थोड़े से लोगों में हैं जिन्हेंने कृति की राह से सीधा संवाद रचने का सुदीर्घ अनुभव अर्जित करने के उपरान्त ही आधुनिक आलोचना के व्यापक सन्दर्भों में प्रवेश किया है, उनकी विशेषज्ञता हासिल की है। अभी तक जिन पाठकों को एक गम्भीर आस्वादक समीक्षक के तौर पर सृजन की कई विधाओं में उनकी अंतरंग पैठ और विवेचन-सामर्थ्य की परिचय मिला है, वे इस पुस्तक में उनके एक नये रूप, नयी क्षमता के कायल होंगे : स्वयं आलोचना विधा के साथ उनकी गहरी संसक्ति और अनभिज्ञता के। पढ़ना रमेश दवे के लिए एक उत्कट बौद्धिक व्यसन है। जीवनानुभव के समानान्तर; और लिखना उस पढ़े हुए को फिर से पढ़ने और आत्मसात करने-करवाने की अनिवार्य प्रक्रिया। जीवनानुभुतियों के समकक्ष और समानान्तर ही अपने अध्ययनानुभवों के बीच भी सार्थक सम्बन्ध बिठाने की सूझ-बूझ का प्रमाण इस पुस्तक में संकलित लेख देते हैं।
 

यह निरे संयोग से कुछ अधिक है कि साहित्यालोचकों के रूप में रमेश दवे की पहचान समकालीन अफ्रीकी साहित्य की उनकी विवेचना बनी थी। बल्कि यह कहना कदाचित और अधिक अर्थवान होगा कि एक आलोचक के रूप में अपनी वृत्ति और क्षमता की आत्मविश्वास भरी प्रतीति ही उन्हें समकालीन अफ्रीकी साहित्य के अवगाहन से हुई थी। दवे की विश्वविद्यालयीन दीक्षा अंग्रेजी भाषा और साहित्य में हुई थी, अतः अँग्रेजी और अँग्रेजी के माध्यम से यूरोपीय साहित्य की जानकारी तो उन्हें उपलब्ध ही थी, किन्तु जिस साहित्य ने उनके भाव-बोध को सर्वाधिक आकर्षित और सक्रिय किया, वह उनके अपने जीवन-बोध और परिस्थिति-बोध के निकट पड़ने वाला साहित्य थातीसरी दुनिया का साहित्यजिससे उनके तार सीधे जुड़ते थे इस प्रकार उनकी आलोचक बुद्धि ने साहित्यिक सृजन के दोनों आधारभूमियों-संस्कृति और परिस्थिति दोनोंको युगपद् रूप में साधने का सिलसिला कायम किया और इसी के भीतर से वह अनुशासन विकसित किया जो अनन्तर उनके साहित्यिक विवेक के एकाधिक रंगों के प्रस्फुटन में सहायक हुआ।
 

हम चाहें तो याद रख सकते हैं कि धर्म और दर्शन की अधोगति के इस युग में साहित्य और साहित्यलोचन पर एक अतिरिक्त जिम्मेदारी अनिवार्यतः आ पड़ी है; साहित्य में पुनर्रचित जीवन के स्पन्दों को मानवता के अन्तःप्रमाण को युगीन विचार-प्रवाह के भरे-पूरे परिप्रेक्ष्य में देखने-परखने की। आलोचक हैरल्ड ब्लूम का तो स्पष्ट ही अभिमत है कि चूँकि आज के हमारे सांस्कृतिक दृश्य में दार्शनिक मनीषा लगभग गायब हो गयी है, अतः साहित्यालोचक अपने स्वधर्म से ही अन्तर्विवश है उस रिक्त स्थान की पूर्ति करने और समाज को शिक्षित करने का वह सांस्कृतिक कर्म अपने हाथ में लेने कोजिसे कभी दार्शनिक लोग निभाया करते थे।
 

इस पुस्तक के आरंभ में दवे ने आलोचना-समय की बात उठाते हुए कुछ रोचक सामान्य स्थापनाएँ की हैं, कुछ प्रश्न भी खड़े किये हैं जिनका खुलासा फिर आगे के लेखों में होता है। आलोचना और सृजनशील समाज इस सिलसिले में एक विचारोत्तेजक और मननीय लेख है जिसमें अफ्रीकी कविता की लोक-ग्रह्यता का बखान करते हुए यह संकेत उभरता है कि आलोचना की उस जमीन को पकड़ना होगा जिस पर हर परिवर्तन हो सकता है, लेकिन जो खुद नहीं बदलती। साथ ही, इसी लेख में आगे वे यह जता देना भी नहीं भूलते कि, ‘किस तरह अति सामाजिकता का प्रमाद सृजन को विश्रृंखलित कर सकता है। दोनों ही बातें समकालीन साहित्याकारों और समीक्षकों के लिए अत्यन्त प्रासंगिक और मननीय हैं। दवे आलोचना के लिए आलोचना के कायल नहीं; आलोचना-कर्म को किन्हीं शास्त्रीय या विचारधाराई आग्रहों के आधीन कर देने के। लेखकों की सन्दर्भ-बहुलता हमें इसी बुनियादी विवेक के चलते बिदकाती नहीं, बल्कि उकसाती हैउन तमाम प्रचलित प्रत्ययों को ठीक-ठीक समझने तथा उनके अतिरिक्त आतंक की झांड़-फूँक करने के लिए। ताकि हम अवसरानुकूल न केवल उन्हें साधिकार बरत सकें, बल्कि एतद्देशीय सन्दर्भों में उनकी उपयोज्यता या अनुपयोज्यता के बारे में भी खुद ही स्वाधीन विवेक से निर्णय ले सकें। इसी के चलते उनकी यह बात खासतौर पर बोलती है किआलोचना का सौन्दर्य सृजन की शक्ति की पहचान में है इसलिए वह समयबद्ध और समययुक्त एक साथ हैं क्योंकि उसे तो दोनों तरह से साहित्य में प्रवेश करना होता है।
 

कहना अनावश्यक है कि दवे की आलोचक-बुद्धि जहाँ जागतिक परिस्थिति के प्रति सचेत है, वहीं वह उसके एतद्देशीय सन्दर्भों को भी आँख से ओझल नहीं होने देती। यह आकस्मिक नहीं कि जहाँ इस संकलन के पहले ही निबन्ध ने अपनी उड़ान मिलान कुंदेरा के हवाले से भरी है, वहीं अगले ही निबन्ध की अन्तर्वस्तु आलोचक राष्ट्र की परिकल्पना को सर्वप्रथम देशवासियों के सम्मुख रखने वाले सर्जक-विचारक अज्ञेय से प्ररेणा ग्रहण करती है। आलोचना-कर्म की प्रेरणाओं और प्रक्रियाओं में जरूरी सन्तुलन बनाये रखने की यह कोशिश इस पुस्तक में आद्योपान्त दिखाई देती है।(किताब की भूमिका से)

    रमेशचन्द्र शाह

भोपाल

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कृति

आलोचना, समय और साहित्य

लेखक

रमेश दवे

प्रकाशक

भारतीय ज्ञानपीठ

नई दिल्ली

मूल्य

15 डॉलर

पृष्ठ

192

समीक्षक

रमेशचन्द्र शाह


 

 

 

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