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विनोद कुमार शुक्ल का व्यवस्थित
पाठ
कमला प्रसाद
विनोद कुमार शुक्ल को साधारण में
असाधारण की महिला का कवि कहा जा सकता है। मुक्तिबोध के बाद
साहित्य में आई पीढ़ियों में से कुछ लोग चमके और तिरोहित हुए।
तूफ़ान की तरह दौड़ने वाले यश लोभियों में से जो
बचे-उत्तरोत्तर समृद्ध हुए, आस्वाद्य की घिरी-पिटी आदतों को
चुनौती दी, ज़िद की हद तक आत्मविस्वास अर्जित किया, उद्भावना
की निजी प्रगतिशील बारीक खूबियों से उत्प्रेरित हुए, उनमें
विनोद कुमार शुक्ल अप्रतिम हैं। तीस-पैंतीस साल की साहित्य की
दुनिया मैंने आँखों से देखी है। विनोद कुमार शुक्ल जो हैं,
उनका जिस तरह साहित्य है, वह एक ओर तथा उनके बारे में जो बातें
हुईं, लिखा गया, वह दूसरी तरफ़ है। बातें और आलोचनाएँ पराजित
हुईं। विनोदजी का लेखन जगमगा रहा है। उन्होंने कहानियाँ,
उपन्यास और कविताएँ लिखीं । अन्य विधाओं में शायद डायरी लिखते
हों। पत्र लिखे होंगे। कुछ साक्षात्कार छपे हैं। अपने बारे में
जीवन पर्यन्त इतने मौन आत्मरति से मुक्त कम देखे जाते हैं।
बातचीत में कदाचित खुले तो विनोद जी नर्म हैं। कविता संग्रह-
‘लगभग
जयहिन्द’,
‘सब
कुछ होना बचा रहेगा’,
‘कविता
से लम्बी कविता’
उपन्यास- ‘नौकर
की कमीज’,
‘खिलेगा
तो देखेंगे’,
‘दीवार
में खिड़की रहती थी’
तथा कहानी संग्रह- ‘पेड़
पर कमरा’
और ‘महाविद्यालय’
प्रकाशित हैं। समय गवाह है कि कहानी, कविता, उपन्यास में से जो
भी जब प्रकाशित हुआ, साहित्य जगत में हलचल हुई। आलोचना में
परम्पर विरोधी टिप्पणियाँ की गईं कलावादी और प्रगतिशील दोनों
प्रवृत्तियों में से आलोचकों को रास नहीं आए। नामवर सिंह को
छोड़ अन्य प्रगतिशील आलोचकों ने उनके रचना कर्म की व्याख्या
नही की। इसीलिए अभी भी यह आवश्यकता बनी हुई है कि उनके साहित्य
का विवेचनापरक व्यवस्थित पाठ प्रस्तुत किया जाए। इस दृष्टि से
आस्था तिवारी की पुस्तक
“कवि
कथाकार विनोद कुमार शुक्ल”
उल्लेखनीय है।
पुस्तक सुविधा की दृष्टि से सात अध्यायों में विभक्त है।
निश्चित क्रम है। आलोच्य कवि-कथाकार की रचना पृष्ठभूमि से लेकर
अब तक लिखी गई कृतियों
–
कहानी, उपन्यास और काव्य संग्रह का संश्लिष्ट आस्वाद्यपरक
विश्लेषण किया गया है। रचनाओं के भीतर से गुज़रने का परिणाम है
कि इसमें फतवों-निष्कर्षों की झड़ी नहीं लगी। क्रमशः कृतियों
की अन्तर्वस्तु खुलती जाती है। पाठकों को विश्वास में लेने और
कृति के साधारणीकरण के लिए तैयार करने का रास्ता बनता जाता है।
आस्था तिवारी ने इसके लिए विनोद जी की कृतियों के मर्म को
पकड़ने की कोशिश की है। रचनाओं से सीधा मुकाबला किया है। ऐसे
कितने रचनाकार होंगे-जो किसी भी विधा में लिखते हुई भी मूलतः
कविता लिखते हैं । मुक्तिबोध का यही स्वभाव था। कहानी-उपन्यास
जैसे साहित्य-रूपों में अनजाने वे कविता ही लिख जाते थे। कविता
छलांग लगाकर कहानी के वेश मे उतर आयी या कहानी ने कविताओँ में
प्रवेश कर लिया । कथा-साहित्य में कविता खोलने वाली कुँजी छप
गई। ठीक से कविताएँ समझनी है, फंतासी के निहित यथार्थ का वर्णन
करना है तो कथा के पास जाइए । छोटी-बड़ी कहानियाँ पढ़िए। डायरी
देखिए, विपात्र पढ़िए। ब्रह्मराक्षस जैसी कविता का आस्वाद्य
ब्रह्मराक्षस कहानी पढ़ने से सध पाएगा, कहानी भी कविता जैसी
लगेगी।
विनोद जी के उपन्यास
में कविता की कुँजी छिपी है। खोज सको तो खोज लो। विनोद जी ने
एक साक्षात्कार में अपने सृजन विश्वास को व्यक्त करते हुए कहा
कि यदि कोई रचनाकार कविता, कहानी उपन्यास
या अन्य विधाओं में लिखता है तो उन्हें एक ही रचना समझकर पढ़ा
जाना चाहिए। सच्चे कृति की कभी भी एक ही रचना समाप्त नहीं
होती। महान रचनाकारों में यह संगति विशेष रूप से दिखती है।
रवीन्द्रनाथ टैगोर ने जितना लिखा, निराला या प्रसाद ने जितना
लिखा, मुक्तिबोध ने जो लिखा-इनके समूचे लेखन में एक छन्द और एक
लय है। उनके विस्तृत रचना-व्यापार को आन्तरिक रुपसे-दृष्टि
बाँध लेती है। जीवन और रचना-दृष्टि रचनाकार को यदि एक लय में
बाँध लेती है। जीवन और रचना-दृष्टि रचनाकार को यदि एक लय में
बाँध पाये तो वह कलावादी नहीं हो सकता। कलावादी जीवन-दृष्टि से
लय कभी नहीं जोड़ पाता। रूप साधता है तो जीवन से विच्छिन्न हो
जाता है, रुपक उसकी प्रायोजित मंशा और कौशल से बनते हैं,
जीवन-राग से नहीं। ज्ञान-विज्ञान और चिन्तन का भार रचनाकार की
स्वतः स्फूर्तता का अंग न हुआ तो व्यक्तित्व हमेशा विभाजित
रहता है। नयी कविता के दौर मे बुद्धिवाद का ढिंढोरा खूब पीटा
गया पर तथाकथिक बुद्धिवादी या तो कविता ही नहीं लिख पाए या
बुद्धि का राग अलापते रहे। उनकी कविताओं में रोमानियत भरी पड़ी
है। स्वतः स्फूर्तता विचारों से रिश्ता नहीं बना पायी । वे
विचार और सृजन में विभाजित हैं। विनोदकुमार शुक्ल का इस तरह से
बुद्धिवाद से नाता कभी नहीं रहा। सहजता से वे मुक्तिबोध और
हरिशंकर परसाई के उत्तराधिकारी बने हैं। अन्तर देश-काल तथा
अगले क्रम का है। इस पुस्तक की लेखिका ने उनमें उत्तर-आधुनिकता
की यत्किंचित छाया का आभास किया है पर लगता है कि इस पर
पुनर्विचार करना होगा। विनोदजी की रचनाओं की कथावस्तु और
रूपगठन में बहुत गहरा और आत्मीय रिश्ता है। रूप का
टेढ़ा-मेढ़ापन कथ्य की भंगिमा का हिस्सा है। कविता की प्रकृति
के नाते उनके कथा लेखन में भी अमूर्त-मूर्त की द्वन्द्वात्मकता
है बूँद और समुद्र जैसा । इसे समझने के लिए नाराला के निबन्ध
‘रूप
और अरूप’
निबन्ध को देखना चाहिए।
पुस्तक की इस स्थापना में दम है कि विनोद जी का रचना कर्म
साधारण को असाधारण में बदलता है। थोड़ी-सी अन्वीक्षण शक्ति हो
तो दिख जाता है कि साधारण में ही वे तत्व मौजूद होता हैं, जो
असाधारण तक जाते हैं । दोनों जुदा नहीं है। रचना-अवयव के रक्त
प्रवाही रेशे साधारण में ही होते हैं। विनोदजी वस्तुलोक के
टुकड़ो-किनारे-गलियों को ठीक से देखकर समग्रता के दरवाज़े
पहचानते हैं। समग्रताएँ रचना में भाषायी संकेतों से उतरती हैं,
फंतासियों में कैद होती है। समग्रताओं को वे नहीं पकड़ सकते
जिनके अनुभव में लघुताएँ नहीं आती। लघुता से समग्रता की छलांग
का कौशल वे साधते हैं, जिनमें जीवन की दृष्टि और रचना की लय
में निरन्तरता हो। लेखिका की यह स्थापना सही है कि विनोद जी का
स्वभाविक दुनिया को रूपात्मक दृश्यों में देखता हैं। दुनिया एक
रचना लगती है। कविता या कथा साहित्य इसी रूपात्मक लोक के
दृश्यखण्ड हैं। भाषा इन दृश्य खण्डों का वर्णन कैसे करे, कहाँ
लक्षणा-व्यंजना में साधे, कहाँ पुनरावृत्ति ज़रूरी है और कहाँ
पंक्तियों के बीच अर्थध्वनियाँ कोंपलों के बीच फुनगी की तरह
छिप सकती हैं-विराट के इस रहस्य को पहचाने तथा फिर रचना की
आकृति बनाए-यही स्वस्थ रचना प्रक्रिया है और इसी को समर्पित है
व्युत्पत्ति और अभ्यास।
मुक्तिबोध के शब्दों में अभ्यन्तरीकरण और बाहरीकरण की
प्रक्रिया है यह। लेखिका ने विनोद जी के रचना-रहस्य को
शब्दबद्ध करते हुए अपने विस्तृत विवेचन के दौरान बीच-बीच में
जिस तरह की पंक्तियों में निष्कर्ष सूत्रबद्ध किया है, वह उचित
प्रतीत होता है। एक उदाहरण पर्याप्त होगा,
“उनकी
(विनोद जी) रचनाओं मे स्वरूप परम्परागत विधा के स्वरूप में
असाधारण रूप से भिन्न है, परम्परागत और अधीर पाठक के लिए वे
आरंभ में जटिल प्रतीत होती हैं और पहेली का कौतूहल पैदा करती
हैं लेकिन समग्रता में धैर्य से पढ़ने और पढ़ने से अधिक मनन का
आग्रह हो तो अन्ततः इनमें विलक्षण संतुष्टि मिलती है।
विलक्षणता, सांकेतिकता, सूत्रात्मकता, दार्शनिकता और
काव्यात्मकता, विनोद कुमार शुक्ल की निजताएँ हैं जो उनकी
कृतियों को औरों से उन्हीं की तरह भिन्न बनाती है। श्रेष्ठ
बनाती हैं। इसकी छाप उनकी रचनाओं के शीर्षकों में ही देखी जा
सकती है।”
किसी भी महत्वपूर्ण रचनाकार की कृतियों का पाठ एक ही बैठक में
पूरा नहीं होता, उसे-बार-बार पढ़ना होता है। सृजनकाल के बाद तक
आने वाली पीढ़ियों को पढ़ना होता है। श्रेष्ठ रचना में सपाट
पाठ औक वक्रपाठ की विशेषताएँ होती हैं। कार्ल मार्क्स इसे सघन
वस्तु कहते थे। उनकी निगाह में शेक्सपियर सघन वस्तु के रचनाकार
थे। इसी सघन वस्तु आस्वाद्य के लिए हार्दिक-विदग्ध दृष्टि की
ज़रूरत होती है। नज़दीक की आँखों से देखने पर ऐसी रचनाओं की
व्यंजनाएँ खुल पाती हैं। विनोद जी की रचनाओं के पाठ के लिए
धैर्य की जरूरत होती है। केवल किस्सा सुनने नहीं उसकी मौन
अनुगूँज अनुभव करने के लिए विनोद जी की कविताओं-उपन्यासों से
साक्षात्कार आवश्यक है। आस्था तिवारी की पुस्तक इसमें मददगार
सिद्ध होगी।
कमला प्रसाद
एम-31, निराला
नगर, दुष्यन्त मार्ग
भदभदा रोड,
भोपाल-462003
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