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विनय पत्रिका
: हमारे समय का क्रिटीक
परमानंद
श्रीवास्तव
निराला
और तुलसी के टेक्स्ट की अंतर्पाठीयता में प्रवेश करते हुए
विनयपत्रिका
की क्रिटिकलिटी किस तरह नए संदर्भ उजागर करती है। यह टिप्पणी
इस बात का विरल उदाहरण
है।
दुरित दूर करो नाथ
अशरण हूँ,
गहो हाथ
ऋऋऋ ऋऋऋ
जब तक शत मोह जाल
घेर रहे हैं कराल
जीवन के विपुल व्याल,
मुक्त करो,
विश्वनाथ!
निराला
जब भी हम तुलसी की श्रेष्ठ कृति विनयपत्रिका को अपने समय के
विमर्श या क्रिटीक
के रूप में पढ़ना चाहेंगे,
हमें निराला के परवर्ती प्रार्थना-गीतों
को उसके
बरक्स रखना होगा। यों ही नहीं है कि निराला ने अपने प्रिय कवि
'तुलसीदास'
पर एक सघन प्रबंध लिखा। यह भी उल्लेखनीय है कि वे
कुकुरमुत्ता को तुलसीदास के सानिध्य में देखते रहे। देखें कि
विनयपत्रिका का
प्रपत्ति भाव,
शरणागति,
जीवन-मृत्यु
द्वंद्व,
दैन्य,
आत्मक्षय,
भय निराला के प्रार्थना गीतों का सार-मर्म
है।
'जीवन
की गति कुटिल अंधा-तम-जाल/फँस
जाता हूँ,
तुम्हें नहीं पाता
हूँ प्रिय/आता
हूँ पीछे
डाल'।
निराला के यहाँ त्रास
का जो वर्णन है,
वह तुलसी के
यहाँ कलिकाल का
त्रास है 'शिशिर
की शर्वरी/हिंस्र
पशुओं-भरी'।
विनयपत्रिका में
'त्रिविधा
ताप,
संदेह,
शोक,
संशय'
जैसे अनुभवों की
लंबी श्रृंखला है। सभी
'संताप
के भाजन'
हैं। पराधीन हैं।
लोगों में असमंजस है,
दुचित्तापन है। कोटि-कोटि
जन्मों का संचित कीचड़ जमकर गहरे बैठ
गया है। भक्ति कठिन हो गयी है। जब कि वांछित है
'अविचल
भक्ति'।
विनयपत्रिका भक्ति ग्रंथ है।
यहाँ भक्ति
'साधाना'
है। एक भिन्न संदर्भ में वसुधा डालमिया लिखती
हैं 'भक्ति
'साधना'
है और
'मोक्ष'
से बड़ी चीज़ है। वह आत्म संघर्ष है।'
तुलसी के शब्द हैं
: ''भगति
दुरलभ परम संभु सुक मुनि मधुप प्यास पद
कंज मकरंद मधुपान की/पतितपावन
सुनत नाम विस्राम कृत भ्रमित पुनि समुझि चित ग्रंथ अभिमान
की''।
भक्ति दुर्लभ
है,
देवता भी उसे पाने के लिए
व्याकुल हैं। अहंकार की ग्रंथि से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं।
क्योंकि केवल आपके
नाम-स्मरण
से अहंकार का पाश कटने वाला नहीं है। कलियुग ज्ञान वैराग्य को
भगा देने वाला है। अनीति का वर्चस्व है। सामाजिक न्याय कठिन
है। तुलसी की आत्मपीड़ा
का आख्यान है विनयपत्रिका मुक्तक-प्रबंध
जैसी कृति है। तुलसी
कहते हैं क़लिकाल मुझे अंधा जान बाघिन के घी के अंजन को
आँख में
लगाने को कहता
है,
जो असंभव है।
विनयपत्रिका वह अर्जी है जो कलि-प्रेरित
त्रास से मुक्ति चाहते हुए लिखी
गयी है और हाथों-हाथ
आगे राम को भेजी जा रही
है।
याद आते हैं निराला
''दे,
मैं करूँ
वरण/जननि,
दु:ख
हरण पद-राग-रंजित
चरण/प्राण-संघात
के
सिंधु के तीर मैं/गिनता
रहूँगा न कितने तरंग हैं/धाीर
मैं ज्यों समीरण
करूँगा तरण''।
अगर तुलसी कहते हैं'ज़ाउं
कहां तजि चरण तुम्हारे',
तो निराला के शब्द हैं'उन
चरणों
में मुझे दो शरण/इस
जीवन को
करो हे मरण'।
तुलसी की
विनयपत्रिका हमारे समय का क्रिटीक इसलिए है कि इसमें ज्ञानकांड
की स्वीकृति है।
सामाजिक उत्पीड़न का जो विराट बिंब
यहाँ बनता है,
वह फंतासी नहीं,
यथार्थ है। इस भक्ति चेतना को सामंतवाद विरोधाी ठहराया जा रहा
है। यह भक्ति
सकर्मक है। वह निष्क्रिय नहीं बनाती,
सार्थक कर्म-जीवन
की प्रेरक है। वाक्य
ज्ञान-भर
काफी नहीं है। कलिकाल का
त्रास हमारे
समय का त्रास है। भयानक महँगाई है,
किसान आत्महत्याएँ कर रहे हैं। विषमता भयानक है। वर्गभेद,
वर्णभेद चरम पर हैं
:
''किसबी,
किसान कुल,
बनिक,
भिखारी,
भाट
चाकर चपल नट चोर चार चेटकी
ऊंचे नीचे करम धारम अधारम करी
पेट ही को पचत बेचत बेटा-बेटकी
तुलसी बुझाइ एक राम घनश्याम ही तें
आगि बड़वागि तें बड़ी है आगि पेट की''
यह पेट की आग आज भूख से मरने वालों की खबर है। आज आँकड़े बता
रहे हैं कि सुदूर
गाँवों में लोग भूख से मर रहे हैं। सत्ता इसे झुठला रही है पर
मीडिया इसे उजागर कर
रहा है। यह विषम समाज में मात्रा उत्पीड़न भुखमरी की अंत:कथा
है।
(2)
तुलसी को लोकवादी कहने वाले विश्वनाथ त्रिपाठी विनयपत्रिका के
एक पद के हवाले
से बता चुके हैं कि
यहाँ वह लोक चिद्दित है,
जिसमें असहाय,
पिछड़े,
अभागे,
निस्संबल,
गुणहीन,
अकुलीन और
पंगु हैं।
'सुमिरु
सनेह सों
तू नाम राम राय को/संबल
निसंबल को/सखा
असहाय
को/भाग
है अभागेहू को गुन
गुनहीन को/गाहक
गरीब को दयालु
दानि दीन को/कुल
अकुलीन
को।'
यह दृश्य है उस समाज का जो उत्पीड़ित
है,
शोषित है। वह भक्ति की
ऊंचाई तक जाय तो कैसे। इस दीन की विनयपत्रिका राम के दरबार में
जाएगी तो
कैसे !
तुलसी के शब्द हैं
:
''विनय
पत्रिका दीन की बापु आपु
ही बांचो
हिये हेरि तुलसी लिखी सो सुभाय सही करि बहुरि पूछिए पांचो''
तुलसी इसी सामाजिक उत्पीड़न के शिकार हैं। सबकी पीड़ा उनकी पीड़ा
है। भक्ति ही
तुलसी की शक्ति है। निष्काम भक्ति है। शील साधाना प्रेरित
भक्ति है।
जहाँ तुलसी
अनिद्रा के शिकार हैं और कहते हैं'ड़ासत
ही गई बीति निसा
सब/कबहुं
न नाथ नींद भरि
सोयो',
वहीं सारा जीवन जल के
लिए सरोवर खोदते बीत गया'क़बहूँ
मन विश्राम न मान्यो/निसिदिन
भ्रमत बिसारि सहज सुख
जहं-तहं
इंद्रिन तान्यो/...निज
हित नाथ पिता गुरु हरि सों हरषि हृदै नहिं
आन्यो/तुलसिदास
कब तृषा जाय
सर खनतहिं जनम सिरान्यो'।
यह
दुस्सह दु:ख
विनयपत्रिका की अन्तर्वस्तु का प्रमुख अंग है। यही वह तथ्य है
जिसे पुनरुक्ति से बिना डरे बार-बार
कहा गया है। यही निराला के
यहाँ बहुविधा गाया उपाख्यान है 'बहुविधा
तुम्हारा उपाख्यान
गाया/फिर
भी कहा अंत अब भी न
पाया'।
विनयपत्रिका में प्रणति है,
समर्पण है,
शरणागति है और इनके विशेष आध्यात्मिक अभिप्राय हैं।
भक्ति की कोटियाँ हो सकती हैं पर भक्ति अपने आप में पर्याप्त
है। सारी व्याख्याओं
से परे। निराला के
यहाँ इसी दुनिया का दुस्सह दु:ख
और त्रास है।
राग में ही तनाव है। मुक्तिबोध इससे वंचित न थे
: 'वह
छिपा प्रत्येक उर में/प्रति
हृदय के कल्मषों के बाद/जैसे
बादलों के बाद भी है शून्य
नीलाकाश।'
तुलसी के यहाँ
'कल्मष'
बहुव्यंजक पद है। यही संशय है,
यही विविधा ताप है,
यही
'औगुन'
है,
यही मृषा सत्य या
अविद्या है। भवत्रास का कारण है। तुलसी की काव्यात्मक उक्ति
है
:
''बिटप
मधय पुतरिका सूत महं
कंचुकि बिनहिं बनाए/मन
महं
तथा लीन नाना तनु प्रगटत अवसर पाए/रघुपति
भगति बारि छालित चित बिनु प्रयास ही सूझै/तुलसिदास
यह चिद् विलास जग बूझत बूझत
बूझै''।
जैसे वृक्ष में
पुत्तालिका या कठपुतली है,
सूत में बिना बनाए कंचुकी है,
उसी तरह मन में अनेक भाव रूप हैं जो यथासमय प्रकट होते हैं। यह
दुनिया
चित्ता का विलास है,
इसे
समझना कठिन है। धार्मकीर्ति ने मन को जगत् प्रपंच का कारण
बताया है। यह चिद्विलास
तुलसी की समझ से परे है। यह भी जादुई यथार्थ है। यह एक तरह का
कपट-घर
है।
तुलसी कहते हैं 'राज
समाज कुसाज कोटि कटु कल्पत कलुष कुचाल
नई है'।
अन्यथा-
''मैं
तोहिं अब जान्यो संसार
बांधिा न सकहिं मोहि हरि के बल प्रगट कपट आगार
देखत ही कमनीय कछू नाहिंन पुनि किए विचार
ज्यों कदली तरु मधय निहारत कबहुं न निकसत सार''
यह
'मृग
जल
सरिता'
और
'सर्परज्जु'
जैसे कठिन भ्रमों की ओर संकेत है। कहीं
'सरल
तिकोन खटोले'
का रूपक है। कांट-कुराय
से लिपटा बाँस का खटोला जो क्षत-विक्षत
है।
''बांस
पुरान साज सब अठकठ सरल तिकोन खटोला
रे,
हमहिं दिहल करि कुटिल करमचंद मंद मोल बिनु डोला रे,
विषय कतार भार मद मात चलहिं न पाउ बटोरा रे,
मंद बिलन्द,
अभेरा दलकन
पाइअ दुख झकझोरा रे।''
एक शब्द
'अठकठ'
सृष्टि की विचित्रा गढ़न का सूचक है।
'शिव'
को भोरानाथ कहा है।
विनयपत्रिका का प्रसिद्ध पद
'केसव
कहि न जाइ का कहिए'
इस चिद्विलास जग की रहस्यमयता का संकेत
है।
'सून्य
भीति पर चित्रा
रंग नहिं तनु बिनु लिखा चितेरे/धाोए
मिटइ न मरइ भीति दु:ख
पाइय ऐहि तमु
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