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मूषक-कथा
:
एक विमर्श
चूहे अथवा चुहिया को
मंत्र-शक्ति से ऋषिवर चाहे सिंह या सिंहनी बना दें
पर
अपने मूषकत्व से तो खुद उन्हें ही लड़ना पड़ेगा।
क्या दैवी फर्मानों से ही अस्तित्व और अधिकारों की लड़ाइयां
लड़ी जा सकती हैं?
या उसके लिए तप और साधना की आवश्यकता भी है
?
इस गहन विषय पर चिंतन और चर्चा की अनगिन शताब्दियां बीत गईं।
अचानक एक अ-लक्षित सुबह हमने सुना
दैवी फर्मानों की कृपा वाले बैनरों को हाथ में लिए एक विशाल
जन-समूह
सड़कों पर मार्च-पास्ट कर रहा है।
बेतहाशा धूल उड़ रही है।
धूल से बचने के लिए हमने अपने दरवाज़े उढ़का लिए
तो बवंडर-दर-बवंडर धूल से, वे जाम हो गए।
जैसे कभी खुलेंगे ही नहीं
क्या हमेशा के लिए बंद हो गए
?
हमने अपनी धूमिल और छोटी बनती जा रही खिड़कियों से
बाहर का नज़ारा देखा तो चौंक गए
सिंह-अनुभव से गुज़रने के बाद
फिर से अपने मूषकत्व में लौट आए
ये चूहे,
धीरे-धीरे बड़े आकारों वाले हो गए।
उनके मुँह हमारी खिड़कियों तक पहुँच चुके थे।
हमारे बाहर निकले सरों और चेहरों को वे अपने विशाल हुए
मूषक-मुखों से कुतरने लगे।
हमने घबराहट के मारे
अपनी खुली खिड़कियां बंद कर दीं।
धूल उन पर भी सील की तरह चस्पां हो गई।
बाहर सड़कों पर मूषक-विजय की दुंदुभियाँ
बड़े हास्यास्पद तरीके से बज रही थीं।
उन पर हँसने के पूर्व ही हमें वे हवा-दान दिखे
जिनसे हो कर हमारी हँसी अगर बाहर पहुँची
तो, दैवी-फर्मानों से लैस यह सेना निश्चय ही हमारे घरों में
प्रवेश कर जाएगी।
फिलहाल हमने हँसने का इरादा छोड़ दिया है।
या कहें
भविष्य के लिए सुरक्षित रख दिया है।
और अब सोच रहे हैं कि
ऋषिवरों और देवताओं की उदार परंपरा को बनाए रखें या नहीं।
क्या अब हमें
वाक् और परा शक्ति से चमकते अपने अस्त्रों को याद कर लेना
चाहिए?
रंजना अरगड़े
23-1-2008
एच-901, साम्राज्य फ्लैट्स,
मेमनगर, अहमदाबाद- 380052
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