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आकांक्षा
यादव की
तीन कविताएँ
एस.एम.एस.
अब नहीं लिखते वो खत
करने लगे हैं
एस.एम.एस
तोड़ मरोड़ कर लिखे शब्दों के साथ
करते हैं खुशी का इजहार
मिटा देता है हर नया
एस.एम.एस
पिछले
एस.एम.एस.का
वजूद
एस.एम.एस
के साथ ही
शब्द छोटे होते गए
भावनाएँ सिमटती गईं
खो गयी सहेज कर रखने की परम्परा
लघु होता गया सब कुछ
रिश्तों की कद्र का अहसास भी।
सिमटता आदमी
सिमट रहा है आदमी
हर रोज अपने में
भूल जाता है भावनाओं की कद्र
हर नयी सुविधा और तकनीक
घर में सजाने के चक्कर में
देखता है दुनिया को
टी.
व्ही.
चैनल की निगाहों से
महसूस करता है फूलों की खुशबू
कागज़ी
फूलों में
पर नहीं देखता
पास-पड़ोस का समाज
कैद कर दिया है
बेटे को भी
चहारदीवारियों
में
भागने लगा है समाज से
चौंक उठता है
कॉलबेल की हर आवाज़
पर
मानो
खड़ी हो गयी हो
कोई अवांछित वस्तु
दरवाजे पर आकर।
लड़की
न जाने कितनी बार
टूटी है वो टुकड़ों-टुकड़ों में
हर किसी को देखती
याचना की निगाहों से
एक बार तो हाँ कहकर देखो
कोई कोर कसर नहीं रखूँगी
तुम्हारी
ज़िंदगी
संवारने में
पर सब बेकार
कोई उसके रंग को निहारता
तो कोई लम्बाई मापता
कोई उसे चलकर दिखाने को कहता
कोई साड़ी और सूट पहनकर बुलाता
पर कोई नहीं देखता
उसकी ऑंखों में
जहाँ प्यार है,
अनुराग है
लज्जा है,
विश्वास है।
आकांक्षा यादव
प्रवक्ता,
राजकीय बालिका इण्टर
कॉलेज
नरवल,
कानपुर नगर,
उत्तरप्रदेश-209401
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