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सृजनगाथा

 

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वर्ष-2, अंक-21, फरवरी, 2008

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।। कथोपकथन ।।

 

 

आज तुलसी और कबीर को विरोधी बना दिया है - विश्वनाथ त्रिपाठी


साक्षात्कार : रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति

 

त्रिपाठी जी ने प्रश्नों की 'प्रकृति' जानने के लिए पहले पाँच- सात प्रश्न सुनाने के लिए कहा। फिर पूछा, ''ये प्रश्न सुधीश ने तो नहीं बनाए?'' मैंने मना किया और बताया कि उन्होंने एक आउट लाइन दी थी बस। खुश होकर बोले, ''हाँ, शुरू करो, मज़ा आएगा।''

-पहली बार तुलसीदास का सामना आपने कब किया था?

-पूर्वी उत्तर प्रदेश के हमारे गाँव में तुलसीदास को सब लोग पढ़ते ही नहीं अपितु बोलते भी थे। मेरे घर के सामने मज़ाजी बाबा रहते थे जिनकी परचून की दुकान थी। मंगल और शनिवार के दिन वे अपने यहाँ रामचरितमानस का पाठ करते थे। उनका नाम रामप्रसाद था लेकिन सब उनको मज़ाजी बाबा कहते थे। इसमें ढोलक बजाते थे इस्माइल खां। हम सब वहाँ जाते थे। तुलसीदास का रामचरितमानस और गाँव के पश्चिम टोला की बेड़िनें मोहर्रम के महीने में मर्सिया गाती थीं (हसन हुसैन का गीत)। तो ये जो मर्सिया और तुलसीदास ये मेरे रक्त में डूबे हुए हैं। मैं तुलसीदास और मर्सिया दोनों की आवाज़ सुनते पैदा हुआ।

 

-यानी आपको दोनों चीज़ें समान रूप से प्रभावित करती हैं?

-हाँ, बिलकुल। और ये स्थिति मेरी ही नहीं वहाँ की संस्कृति में ही आपको दोनों वस्तुएं समान रूप में जुड़ी हुई मिलती हैं। बल्कि यह स्थिति पूरे अवधा क्षेत्रा में मिलेगी। वहाँ ये संस्कारित हैं। दोनों चीजें समान रूप से जुड़ी हुई मिलती हैं।

 

-तुलसी को अध्ययन के रूप में आपने कब स्वीकार किया? आपको कब लगा कि वो जो मानस पढ़ते थे वह अलग चीज़ थी और यह पढ़ना अलग है?

- अलग नहीं लगा मुझे कभी। ऐसा हुआ कि जब मैं काशी में था और बी.. कर रहा था तो आप जानते ही हैं कि कोर्स में तुलसीदास हर जगह लगे हुए हैं ज़ैसे

बरखा बिगत सरद् रितु आई

लक्ष्मण देखो परम सुहाई

ये कक्षा दो-पाँच में लगा रहता है। बी.. में एस.बी. कालेज में रामचरितमानस का समारोह होता था और जब बनारस आया तो वहाँ एक तुलसी पुस्तकालय था। वहाँ मैंने जगजीवन राम का भाषण सुना। वो ये कहते थे कि राम को इसलिए निकाल दिया गया क्योंकि राम ने जानकी से शादी की। जानकी कई लोगों की सम्मिलित कन्या थीं। बाबू जगजीवन राम ने बहुत ही नए ढंग से रामकथा की व्याख्या की है। मैंने तुलसीदास पर बहुत ही कम ऐसे भाषण सुने हैं। ये काशी की संस्कृति थी कि मैं वहाँ तुलसीदास पर रफी अहमद किदवई और बाबू जगजीवन राम का भाषण सुन सका। आज मेरे कहने का मतलब ये है कि अगर युवा पीढ़ी अपने को राम और रफी अहमद किदवई से अलग कर रही है तो फिर तुलसीदास का मामला समझ में आता है। मुख्य बात ये है कि वे तुलसीदास को पढ़ते ही नहीं हैं।

 

-पूछना चाहूँगा जो अभी आपने कहा है कि सीता एक नहीं कई लोगों की संतान थीं? मतलब?

- इसकी कथा है, आप जानते ही हैं जानकी उत्पत्तिा को कि जनक जब खेत में हल चला रहे थे तब उन्हें एक घड़ा मिला था। उसमें से जानकी पैदा हुईं इसीलिए वो भूमिजा थीं। इस देश में तीन देवियां बड़े मिथों में जुड़ी हुई हैं। पार्वती पर्वत कन्या हैं। लक्ष्मी समुद्र कन्या हैं और सीता धारती कन्या हैं। सीता के संदर्भ में कहा ये गया था कि सभी ऋषियों ने मिल कर अपना रक्त उस घड़े में दिया था। इससे जानकी पैदा हुई थीं। ये मिथ है, इसकी बाबू जगजीवन राम ने अलग व्याख्या की थी।

 

- युवा तुलसीदास को पढ़ नहीं रहे हैं, तो इसका क्या अर्थ है?

- मुझे ऐसा लगता है कि कोई कवि जो होता है वो कई चीजों से, कई तरह की सीमाओं में और बंधानों में होता है। जैसे आजकल बड़े जोर से कहा जाता है कि विचारधाारा पकड़ लेती है। देश होता है, काल होता है, इतिहास होता है। इतिहास के साथ-साथ उस व्यक्ति का वर्ण है, जाति है, व्यवस्था है, भाषा है, उसकी आर्थिक स्थिति है, वर्ण-वर्ग है, इन सब चीजों से आदमी सीमित हो जाता है।

मैं आपसे एक बात कहूँ कि कबीर और तुलसी दोनों को आपकी पीढ़ी ने एक-दूसरे का विरोधाी बना रखा है। लेकिन अगर मैं कहूँ कि नारी निंदा के प्रश्न पर दोनों समान हैं तो आप कहेंगे कि नहीं कबीर दलित हैं इसलिए उनकी नारी निंदा तो ठीक है, तो ये नहीं चलेगा। दूसरी बात ये है कि प्रगतिशीलता का मूल्य देखा जाएगा। गरीबी, भुखमरी है, और आज हिन्दी का क्या भारत का शायद ही कोई दूसरा कवि होगा जिसने गरीबी, दरिद्रता और भुखमरी पर इतना लिखा हो जितना तुलसीदास ने लिखा है। इसकी तुलना में कबीर बहुत कम मिलेंगे, यह कोई कबीर की गड़बड़ी और तुलसीदास की अच्छाई नहीं है। तुलसीदास बाभन थे और कबीर जुलाहा थे। अब जुलाहा जाति ऐसी जाति है जो अपने खाने-पीने का इंतजाम कर लेती है। जुलाहे कभी गरीब नहीं होते हालांकि बहुत अमीर भी नहीं होते। बस वे अपने खाने-पीने का इंतजाम कर लेते थे। तो जो आदमी भूख जानता है, वह आदमी भूख का वर्णन करेगा।

 

- तुलसीदास ने जिस भूख को जाना वह अर्जित थी, वे कुछ करते नहीं थे। यह उनकी अपनी व्यवस्था की भूख थी जबकि कबीर काम करते थे।

- आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं। तुलसी परान्नजीवी जाति के ब्राह्मण थे। वे दूसरे का अन्न खाते थे लेकिन जब नहीं मिलता था तो भूखे रहते थे। दरिद्र थे। बचपन अभावों में बीता था। ये तुलसीदास की गरीबी थी, वह कोई अर्जित नहीं थी अगर वो जुलाहा होते तो वो भी अपना कामकाज करके खाते-पीते, ठीक रहते। अब इसी तरीके से कबीर दलित थे, आजकल की भाषा में जिसे दलित कहा जाता है। जुलाहा और वर्ण-व्यवस्था की जो व्यथा है जिसे कबीरदास जानते थे, उसे तुलसीदास जान ही नहीं सकते थे। तुलसीदास तो वर्ण-व्यवस्था में ब्राह्मण थे। चाहे जैसे हों

पूजिय विप्र सकल गुणहीना

शूद्र न पूजिय परम प्रबीना

इस भाव के थे। हमारे भक्त कवियों की एक विशेषता है जिस पर धयान दिया जाना चाहिए। भक्त तो सब हैं सूर, तुलसी, मीरा, तो सबकी अपनी-अपनी निजता है। तुम कवि हो जानते हो कि कवि होने की पहली शर्त है कि तुम्हारी पहचान हो और पहचान तब बनती है जब तुम्हारे पास अपनी कोई संपत्ति हो। अब ये भक्ति तो एक आंदोलन है। आंदोलन में ज्यादातर कवि ऐसे होते हैं जो एक सा लिखते हैं। अलग होने का पता भी नहीं चलेगा। जैसे नई कविता में बहुत कवि हैं जो बहुत लिखते हैं लेकिन पहचान ही नहीं है। भक्ति आंदोलन के जो चार-पाँच महान कवि हैं उनमें कबीर, सूर, तुलसी, मीरा हैं, कबीर का व्यंग्य और अक्खड़पन अद्भुत है। आप कल्पना करें तुलसीदास की सत्राहवीं शताब्दी का कवि लिख रहा है कि: 'आग बड़वागि से बड़ी है आग पेट की।' प्रगतिशील आंदोलन पर इससे बड़ा स्लोगन नहीं मिलेगा। रघुवीर सहाय और मुक्तिबोधा ने भुखमरी पर इससे अच्छी पंक्ति नहीं लिखी है। और ये भी लिखा है कि 'जीविका विहीन लोग कहाँ जाई का करी/भूखत मोल बेचत बेटा बेटिकी।' इसको आप कहें कि प्रगतिशील नहीं मानेंगे तो न मानें। आप युवा हैं कुछ भी कह सकते हैं।

 

-सुमित सरकार के निबंधा के मार्फत है ये बात कि कलियुग की अवधारणा जाति के टूटने से विकसित हुई है। यह एक प्रकार से उच्च वर्चस्ववादी, वर्णवादी मानसिकता का विक्षोभ था जिसे तुलसी ने उभारा। आप क्या सोचते हैं?

- बिलकुल ठीक है। ये बात और लोगों ने भी कही है रामशरण शर्मा ने भी ये बात कही है। हजारी प्रसाद द्विवेदी और दूसरे लोगों ने भी कही है। अभी मैंने जो कहाउससे आपने जो भी अंदाज लगाया कि तुलसीदास में महत्तवपूर्ण और गंभीर कमियां हैं और आपका जो पाठक है वह तुलसीदास को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाता।

 

-आपके कहने का मतलब है कि आज का पाठक और अधययन करने वाले, तुलसी से आगे निकल चुके हैं।

- तुलसीदास से आगे निकलने का सवाल नहीं है। तुलसीदास को जस-का-तस स्वीकार करने का सवाल है। या अस्वीकार करने का सवाल है। आगे निकलना मुश्किल होता है। आगे निकलने का मतलब है आप समय से आगे हैं। जो शेक्सपियर था उसने आज के सिध्दांतों को नहीं सुना था। आपने सुना है तो इसका मतलब यह थोड़े होता था कि आप शेक्सपियर से आगे निकल गए। हाँ यह ज़रूर है कि जो प्रगतिशील चेतना आज की होगी वह तुलसीदास पर निर्मम प्रहार करेगी। जैसे वर्णाश्रम व्यवस्था का मामला है वहाँ तुलसीदास की आलोचना होनी चाहिए। यहाँ निर्मम प्रहार की ज़रूरत है। लेकिन फिर वो प्रगतिशील चेतना कबीर के नारी वाले विचारों पर भी लागू होनी चाहिए।

 

-फैशन में तुलसी की चौपाई और दोहा आदि युवा पहनने लगता है। वह यह फैशन के रूप में पहनता है इसे आप किसी और नज़रिए से देखते हैं या यह सब क्या है?

- मैं आपसे बहुत साफऋ बात कहूँ कि सिनेमा-सिनेमा या अमेरिका-अमेरिका वाली टी शर्ट पहनने से तो ये ठीक ही है। चाहे कबीर द्वारा, चाहे तुलसीदास द्वारा। कहने को तो ये फैशन है। इसका कोई ख़ास मतलब नहीं होता।

 

-एक प्रश्न ये उठता है कि लेनिन और माक्र्सवाद के संदर्भ में मानस और तुलसीदास को आप कैसे जस्टिफाई करेंगे? उन्हें इस संदर्भ में हम कैसे स्वीकार करेंगे।

- लेनिन इसके बहुत बड़े उदाहरण हैंटॉल्सटॉय को कुछ जो कम्युनिस्ट क्रिटिक थे, उन्होंने यूडल कहना शुरू कर दिया था। उन्होंने लेनिन से कहा कि टॉल्सटॉय जो थे सामंतवादी लेखक थे। लेनिन ने उनको डांटा और कहा कि ठीक है टॉल्सटॉय सामंत थे लेकिन इस सामंत लेखक के पहले रूसी साहित्य में किसान है ही नहीं। ये जो साहित्य है, कलम है, हालांकि मुझे ये नहीं बोलना चाहिए लेकिन सच है कि ये दुधारी चीजें हैं। मैं तुम्हें एक बात बताऊं जैसे रीतिकालीन कवि दरबारी थे। रीतिकालीन कवि जो हैं वो आश्रयदाताओं को प्रसन्न करने के लिए लिखते थे। उनकी उद्दीपन वृत्ति है उसको बढ़ाते थे। लेकिन जो दरबारी कवि थे उनको दरबारी मरवाता भी था। गंग को उनके ही आश्रयदाता राजा ने हाथी से कुचलवाया। तुलसीदास और सूरदास को तो हाथी से किसी ने नहीं कुचलवाया।

 

- तुलसीदास से व्यवस्था को खतरा नहीं था लेकिन कबीर को तो सत्ता ने परेशान किया है।

- मैं कह रहा हूँ कि जो ये रीतिकालीन कवि हैं वह ये कि गंग दरबारी कवि था, राजा की तारीफ करता था, उसको कुचलवाया गया। जहाँगीर ने गंग को हाथी से कुचलवाया।

 

-लेकिन इसका कोई कारण भी होगा? कुचलवाने की वजह क्या थी?

- हाँ, अब पूछा आपने सही प्रश्न। जो दरबारीपन होता है, जहाँ आप रहते हैं, वहाँ के अन्याय भी आप झेलते हैं। लेकिन प्रगतिशीलता को लेकर आंदोलन करने वाले तो कभी ऐसे नहीं मारे जाते। ऐसा क्यों हुआ कि सांप्रदायिक दंगे में गुजरात के कांग्रेसी मारे गए। एम.पी. मारा गया। लेकिन यहाँ धारने पर बैठने वाले इतने लोग थे कोई नहीं मारा गया।

 

तो जो मध्यकालीन व्यक्ति हैं वह मधयकालीनता को झेल रहा है। उससे लड़ रहा है। जो दरबारी कवि है वह दरबार की कमजोरियां ज्यादा जानता है। उनको बचाकर कविता करता है। अगर आप दरबार से दूर हैंऋऋऋ''संतन को कहा सीकरी सो काम'' तो आप बचे हुए हैं। इसलिए जो सामंत हैंअगर वो लेखक हैं तो वह सामंती शोषण को ज्यादा जानता है। यही तर्क जो आप लगा रहे हो कि जो दलित लेखक हैं वह दलित जीवन को ज्यादा जानता है। वह शोषण-प्रक्रिया को नहीं जानता लेकिन उसे शोषण का अनुभव गहरा है। अगर ब्राह्मण ब्राह्मणवादी-व्यवस्था का विरोधा करने लगे तब तो वह राहुल सांकृत्यायन हो जाएगा क्योंकि वह जानता है कि ब्राह्मणों की बेईमानी क्या है। इसके साहित्य मे