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ग्रिनजाने साहित्य पुरस्कार के बहाने
सुनील दीपक
उत्तरी
इटली,
फ्राँस की सीमा के पास के शहर
टूरिन में वार्षिक इतालवी ग्रिनज़ाने साहित्य पुरस्कार समारोह
के अवसर पर भारतीय
लेखकों की गोष्ठी आधारित की जा रही थी
।
पुरस्कार समारोह की वजह से पुरस्कार समिती के सदस्य जिनमें
विश्व के कई जाने
माने लेखक शामिल हैं,
उनका भी टूरिन आने का
कार्यक्रम था।
मुझे भी भारतीय लेखकों के बीच
बोलने का निमंत्रण मिला था
।
समारोह के क़रीब आते आते,
ग्रिनज़ाने साहित्य
पुरस्कार के आयोजकों ने पत्रिकाओं और समाचार पत्रों के माध्यम
से जन सामान्य में
समारोह के बारे में जानकारी बढ़ाने के लिए कुछ साक्षात्कार और
लेखों आदि के छपवाने
का प्रयास करना शुरु कर दिया
।
मुझे भी कहा गया
कि मैं मिलान शहर के एक समाचारपत्र को साक्षात्कार दूँ तो मैं
तुरंत तैयार हो
गया।
मुझे लगा कि इस तरह से आज के भारतीय
भाषाओं में होने वाले लेखन और उनके लेखकों के बारे में बात
करने का मौका मिलेगा
।
मेरा साक्षात्कार लेने आयीं,
समाचारपत्र की
पत्रकार क्रिस्तीना।
साक्षात्कार के प्रारम्भ
में बोलीं कि मुझे भारतीय लेखकों के बारे में नहीं जानना
,
मुझे जानना है कि भारतवासी हमारे देश इटली के बारे
में क्या कहते या सोचते हैं?
पहले तो मुझे समझ ही नहीं आया कि इस तरह के प्रश्न का क्या
उत्तर दिया जाये।
फ़िर बोला,
"भारत
की आधी से अधिक जनता को मालूम ही नहीं होगा कि इटली क्या है
,
कहाँ है।
जिनके
पास खाने,
सोने,
रहने का न हो,
गाँव में रहने वाले वो
लोग
जिन्होंने करीब का शहर भी शायद ही
कभी देखा हो,
उन्हें क्या मालूम कि इटली कहाँ है या किस देश का नाम है
?
हाँ जिन लोगों को देश विदेश का फ़र्क मालूम
होगा,
उनमें हो सकता है कि इटली का नाम मालूम
हो,
क्योंकि इटली सोनिया गाँधी का देश है
,
जिनका नाम बहुत लोग जानते हैं और
जो कि हमारे देश की बहू हैं और इस रिश्ते से उटली
हमारे भारतवासियों की ससुराल हुई।"
पहले तो वे समझी नहीं कि ससुराल क्या होती है,
पर जब समझाया तो बहुत प्रसन्न हुईं।
बोलीं,
"अच्छा
बताईये कि भारत में इटली
के कौन से लेखक
,
अभिनेता,
विचारक,
कलाकार
आदि अधिक जाने जाने जाते हैं?"
इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए भी
मुझे
सोचना पढ़ा,
आखिर बोला,
"एक
ज़माने में इतालवी फ़िल्म निर्देशक
विक्टोरियो दे सिका की फ़िल्म "साईकल चोर" का भारतीय
सिनेमा निर्देशकों पर बहुत गहरा असर पड़ा था,
जैसे कि बिमल राय पर,
जिन्होंने इसी
प्रभाव में दो बीघा ज़मीन फिल्म बनायी थी जिसे कान फिल्म
समारोह में पुरस्कार मिला
था
।
पुराने अभिनेता,
अभिनेत्रियाँ जैसे सोफिया लोरेन,
जीना लोलाब्रिजिदा आदि भी जाने जाते थे।
आज के अभिनेता आदि की शायद भारत में बहुत अधिक
जानकारी नहीं,
शायद
किसी किसी को मोनिका बेलूच्ची का नाम शायद मालूम
हो,
बस।
पुराने लेखकों में अल्बेर्तो मोराविया,
इटालो काल्वीनो का नाम जाना जाता था,
आज
कल के लेखकों में से शायद उमबेरतो एको का नाम कुछ जाना जाता है
।
बाकी प्रसिद्ध इतालवी नाम हैं फैशन वालों के जैसे
कि अरमानी,
गुच्ची,
वालेंतीनों,
आदि के।"
अगले दिन सुबह समाचारपत्र में देखा तो बहुत हँसी आयी,
उन्होंने
मेरे
साक्षात्कार का शीर्शक दिया
था
, "इटली
भारत की ससुराल है"
पर लेख में थोड़ी सी गलती हो गयी उनसे,
लिखा था कि सोनिया जी इंदिरा गाँधी की सास हैं
।
खैर समारोह शुरु हुआ।
मंच पर शशि थरुर,
अल्ताफ टायरवाला,
लावाण्या शंकरन और निरपाल सिंह बैठे थे
।
अपनी बात कहने के बाद,
वे लोग दर्शकों
के प्रश्नों के उत्तर दे रहे थे
जब क्रिस्तीना
ने यही प्रश्न उन सबसे पूछा कि आप लोग इटली के किन लेखकों को
जानते हैं
?
किसी को समझ नहीं आया कि किसका नाम लिया जाये,
घूम फ़िर कर तीन नाम निकले
,
मोराविया,
काल्वीनो और एको के,
वही नाम
जो
मैंने उनसे साक्षात्कार के दौरान
कहे थे।
मुझे थोड़ा सा अचरज हुआ।
मैंने वे नाम लिये
थे यह सोच कर कि आम भारतीयों को शायद ही आजकल के प्रसिद्ध
इतालवी लेखक जैसे कि
जानपाओलो पानसा,
जोर्जो बोक्का
,
दाच्या माराईनी जैसे नाम मालूम हों,
पर जाने माने दुनिया घूमने वाले भारतीय
लेखकों को भी आजकल के किसी इतालवी लेखक का नाम नहीं
मालूम होगा
,
यह नहीं सोचा था।
बाद में जब हम लोग ग्रिनज़ाने पुरस्कार समिति के सदस्य और
विश्व के जाने माने साहित्यकारों से मिले तो भी यही
बात समाने आयी।
किसी को मालूम नहीं था कि ताहार
बेन जालून
,
लुईस सेपुलवेदा,
ब्जोर्ग लारस्सन,
पीटर श्रनाईडर,
रोज़ेता लोय जैसे
साहित्यकार कौन हैं
,
किस देशों से हैं,
क्या लिखते हैं।
सोच कर बहुत दुख हुआ।
हम लोग बात करते हैं
कि किसी को भारतीय भाषा में लिखने वालों की कुछ परवाह नहीं,
केवल अग्रेजी में लिखने वालों को हर जगह पूछा जाता
है
।
पर हमें स्वयं
भी मध्य पूर्व,
यूरोप,
अफ्रीका और दक्षिण अमरीकी
महत्वपूर्ण लेखकों के नाम या काम के बारे में कुछ नहीं मालूम
।
शायद दोष इस भूमण्डलीकरण का है जिसमें बिकने वाले
अमरीकी या अँग्रेज़ लेखक
,
नोबेल पुरस्कार या बुक्कर पुरस्कार पाने वालों के नाम ही हम तक
पहुँचते
हैं
।
सुनील दीपक
Bologna,
Italy
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