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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-21, फरवरी, 2008

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।। हस्ताक्षर।।

 

 

बच्चन : गीत के पर्याय


डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र

 

डॉ. हरिवंशराय बच्चन जब किशोरवय में कविता लिखने के लिए प्रवृत्त हुए, छायावाद अपने उत्कर्ष पर था। हालांकि उनकी शिक्षा-दीक्षा अँग्रेज़ी भाषा और साहित्य में हुई मगर वह हुई थी काशी-प्रयाग में, जो उन दिनों साहित्यिक तीर्थ तो थे ही, छायावाद के गढ़ भी थे। बच्चन जी को विरासत में छायावाद के ज्योति स्तम्भ प्रसाद, पंत, निराला और महादेवी तथा उनके समकालीन तमाम कवियों से अत्यंत समृद्ध और उर्वर गीत विधा मिली। छायावादी कवियों ने कविता के लिए अनुपयुक्त मानी जानेवाली खड़ी बोली को अपनी संकल्पबद्ध साधना से गीत की सूक्ष्म और सांकेतिक अभिव्यक्ति के अनुरूप बनाया, यहाँ तक कि मैथिलीशरण गुप्त और माखनलाल चतुर्वेदी जैसे कवि भी अपने गीतों के माध्यम से जनमानस में महत्वपूर्ण स्थान पा रहे थे।

 

बच्चन जी का पहला काव्य संग्रह तेरा हार’ 1932 में छपा था। यह संग्रह अपेक्षित लहर उत्पन्न नहीं कर पाया। इस समय कविता के प्रचार-प्रसार में कवि सम्मेलन महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगे थे जिनमें गीतों की प्रधानता थी। दस-दस अंतराओं के लंबे-लंबे गीत होते थे। इनके अलावा कवित्त-सवैया-घनाक्षरी का भी काव्य मंचों पर बोलबाला था। बच्चन जी ने कवित्त-सवैयों के मारक प्रभाव को देखा था और उमर खैयाम की रूबाइयों के अनुवाद ने उन्हें अपनी दिशा तय करने की सामर्थ्य भी प्रदान कर दी थी। चौथे दशक के प्रारंभ में जब महाकाव्यों में कामायनी और उपन्यासों में गोदान जैसी कालजयी रचनाएं आ गयी थीं और पत्रिकाओं से लेकर मंचों तक नए कवियों साहित्यकारों के लिए स्थान पाना कठिन था, उस समय बच्चन ने सवैयों की संक्षिप्तता, उमर खैयाम की मादकता और रोमांटिक कवियों के स्वच्छंद भावों को लेकर मधुशाला’ (1935) की रचना की। मधुशाला की चतुष्पदियों की व्यापक लोकप्रियता ने बच्चन जी को एक गीतकार के रूप में नया ग्लैमर दिया। उन्होंने मधुशाला के क्रम को आगे बढ़ाते हुए मधुबाला(1936)और मधुकलश’ (1937) की रचना की। मेघदूत के श्लोकों की तरह ये मुक्तक और गीत एक भाव की लड़ी में पिरोए गए थे, और वह भाव था उद्दाम प्रेम का, जो हर दौर में युवा पीढ़ी को चुंबक की तरह अपनी आ॓र खींचता है। उस समय हिंदी कवियों में युवा हृदय सम्राट तीन थे- रामधारी सिंह दिनकर, जिनकी हुंकार के समक्ष बादलों का मंद्ररव भी मंद पड़ जाता था। दूसरे थे गोपाल सिंह नेपाली, जो कम पढ़े-लिखे होने के कारण बड़ी सीधी-सादी भाषा में प्रणय गीत गाते थे। उनकी जादुई प्रस्तुति ने बच्चन जी को भी प्रभावित किया था, जिसे वे स्वयं स्वीकार करते थे। तीसरे हृदय सम्राट बच्चन जी स्वयं थे, जिन्होंने कवियों कोपरम्परागत विदाई की जगह पारिश्रमिक देने की प्रथा चलाई। वे अपने समय के अधिनायक थे, जिनकी बातों को टालना संयोजकों के बूते की बात नहीं थी।
 

गीतकार बच्चन की अपार लोकप्रियता ने अनेक गीतकारों को पनपने का माहौल दिया। माखनलाल चतुर्वेदी, नरेन्द्र शर्मा, बालकृष्ण शर्मा नवीन’, रामेश्वर शुक्ल अंचल, बलवीर सिंह रंग’, भगवतीचरण वर्मा, रामकुमार वर्मा, रमानाथ अवस्थी, रामावतार त्यागी, शंभुनाथ सिंह, जानकीवल्लभ शास्त्री, वीरेन्द्र मिश्र, रवीन्द्र भ्रमर, नीरज, शिवमंगल सिंह सुमन जैसे अग्रगण्य नाम हैं, जिन्होंने अपने गीतों से हिन्दी कविता को व्यापक जनाधार दिया। इनमें से अनेक 1967 में काशी हिंदू विश्वविघालय की स्वर्ण जयंती पर आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में आमंत्रित थे। वहां बच्चन जी को रात में 12 बजे के बाद मंच पर लाया गया, क्योंकि श्रोता देर तक मधुशाला को सुनने का मोह त्याग नहीं सकते थे। सम्मेलन में बच्चन जी देर रात तक काव्यपाठ करते रहे और श्रोता मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुनते रहे।
 

बच्चन जी को गीतकार के रूप में प्रतिष्ठित करनेवाले संग्रहों में निशा निमंत्रण’(1938), ‘एकांत संगीत’(1939) आकुल अंतर’ (1943) विशेष हैं।मिलन यामिनी’ (1950) और प्रणय पत्रिका’ (1955) के गीतों में वह प्रभाव नहीं था, जिसके कारण बच्चन गीत के पर्याय बने। हलाहल’, ‘मिलन यामिनी और प्रणय पत्रिका में प्रेम और सौंदर्य से संबंधित विभिन्न मनोभावों का व्याख्यात्मक वर्णन है। बच्चन अत्यंत संवेदनशील और भावप्रवण कवि थे और अपने समस्त मनोभावों और विचारों को गीत के माध्यम से व्यक्त्त करने के लिए प्रतिबद्ध थे। इसलिए एक ही अनुभूति को श्रृंखलाबद्ध रूप में अनेक गीतों में भिन्न-भिन्न रूपों में प्रस्तुत करने के लिए बाध्य थे। कई दशकों तक गीत विधा में रमने के बाद जब वे आत्मकथा के माध्यम से गद्य में उतरे, तो उसमें भी उन्होंने नए कीर्तिमान स्थापित किए। इसी प्रकार बुद्ध और नाचघर में उन्होंने मुक्त छंद में मानसलोक के नए धरातल का उद्घाटन किया। आरती और अंगारे एक प्रकार से कवि की जीवनी है, जो लगभग तीन सौ गीतों में अभिव्यक्ति पाती है।त्रिभंगिमा में उनकी तीन शैलियों की कविताएं संकलित हैं- परंपरागत शैली के गीत, लोकधुनों पर आधारित गीत और मुक्त छंद की कविताएं।
 

बच्चन जी ने हिंदी गीत विधा को इतना साहित्य दिया कि उसके आधार पर हिंदी गीत विदेशों से आयातित वादों, शैलियों और काव्यरूपों की जबर्दस्त आवक के बाबजूद अपना मूल्य बनाए रख सका है। जब बच्चन पैदा हुए थे, तब हिन्दी गीत जहाँ था, आज वह उससे कोसों दूर आगे बढ़ गया है। आज नवगीतों में सूक्ष्म से सूक्ष्म अभिव्यक्तियाँ हो रही हैं। गीत विधा को यह सामर्थ्य बच्चन जी की चिर साधना से ही प्राप्त हो पाई। जन्मशती पर उन्हें शत-शत प्रणाम।

  डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र

मुख्य प्रबंधक(राजभाषा)

जीवन भारती बिल्डिंग,

टॉवर-2, फ़्लोर-9, 124, इंदिरा चौक, नई दिल्ली

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