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बलिया में
हजारीप्रसाद द्विवेदी जन्मशती समारोह
बालिया।राष्ट्र,
राष्ट्रीयता एवं राष्ट्रभाषा की सेवा में 85 वर्षों से
समर्पित, देश की प्राचीनतम् संस्थाओं में मान्य बलिया हिंदी
प्रचारिणी सभा, टाउन हाल में
‘आचार्य
हजारीप्रसाद द्विवेदी जन्मशती समारोह’
का आयोजन किया गया। समारोह के मुख्य अतिथि थे डॉ. विश्वनाथ
त्रिपाठी तथा डॉ. प्रमोद कुमार सिंह। डॉ. वेद प्रकाश, विशिष्ट
अतिथि के रूप में पधारे थे।
‘द्विवेदी
की इतिहास दृष्टि और उनका साहित्य’
विषय पर बोलते हुए डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि बलिया
क्रान्ति भूमि है। यहाँ का कण-कण मेरे लिए प्रणम्य है। यह मेरे
गुरु आचार्य द्विवेदी की जन्मभूमि है। मेरे लिए यह तीर्थ भूमि
है। बापू भवन सभागार में उपस्थित प्रबुद्ध श्रोताओं की भारी
भीड़ में मुदित श्री त्रिपाठी ने कहा कि यहाँ की जनता के मन
में आचार्य के लिए कितना सम्मान है, मैं महसूस कर रहा हूँ।
यहाँ का हर व्यक्ति मेरे लिए वन्दनीय है। यह इतिहास भूमि है,
रण भूमि है। बलिया हिंदी प्रचारिणी सभा का यह मंच ऐतिहासिक है,
जहाँ भारतेन्दु, राहुल, आचार्य शुक्ल सहित ने जान कितने
विद्वान आए और गौरवान्वित हुए।
उन्होंने कहा कि आचार्य द्विवेदी की इतिहास दृष्टि मानवतावादी
थी। वस्तुतः इतिहास मनुष्य के कर्म से बनता है। अन्नदान की
भावना इतिहास में होती है, काल में नहीं। द्विवेदी जी का पूरा
जीवन विस्थापित का जीवन था। जय यात्रा उनका स्वप्न था।
उन्होंने अपने साहित्य में मिथकों का सार्थक प्रयोग
किया है। उनके मिथक भी यथार्थ हैं। पण्डित जी इतिहास को अनन्त
की ओर खोलते हैं। वे परम्परा के शिखर पुरूष थे। लोकानुभव ने
उन्हें सदा प्रेरित किया था।
डॉ. प्रमोद कुमार सिंह ने आचार्य द्विवेदी की इतिहास दृष्टि को
उद्घाटित करते हुए कहा कि भारतीय इतिहास के कलात्मक स्वरूप को
चित्रित करते समय द्विवेदी जी सरस तथा तथ्य आधारित हो जाते
हैं। वस्तुतः इतिहास सतत् प्रक्रिया है, जिसे उन्होंने वर्तमान
की संकल्पना से जोड़ा है। पूरी बलिया खेत है। संघर्ष की गाथा
है। छप्परों का गाँव है। यहाँ इतिहास की सामग्री बिखरी पड़ी
है, जिसके आधार पर भारत का इतिहास लिखा जा सकता है। हिंदी
प्रचारिणी सभा बलिया का यह मंच चौरासी वर्षों से अलख जगाता चला
आ रहा है। यह आचार्य द्विवेदी की तपस्थली है। बलिया हिंदी
प्रचारिणी सभा के कीर्ति स्तंभ थे। हिंदी भाषा का
प्रचार-प्रसार इसका लक्ष्य रहा है। भाषा द्विवेदी जी की तीसरी
आँखे है। काल की शक्ति टूटने पर इतिहास की शक्ति उसे जोड़ती
है। इतिहास शव साधाना है, किन्तु साहित्य के संस्पर्श मात्र से
वह शिव साधना में परिणत हो जाता है। द्विवेदी जी का साहित्य और
इतिहास मात्र से वह शिव साधना का वास्तविक स्वरूप है।
विशिष्ट अतिथि, युवा समीक्षक डॉ. वेद प्रकाश, रीडर, अलीगढ़
मुस्लिम विश्वविद्यालय ने कहा कि द्विवेदी जी के साहित्य में
अवगाहन गंगा स्नान जैसा लगता है, वे इतिहासकार नहीं थे, किन्तु
उनके साहित्य मे इतिहास का अनुशासन मिल सकता है। जीवन के जितने
अन्तसंबन्धात्मक संदर्भ हो सकते हैं, द्विवेदी जी के जीवन में
हैं। शुद्ध मानवीय दृष्टि इतिहास नहीं होती। द्विवेदी जी का
अपना इतिहास दर्शन है। उनकी अपनी इतिहास चेतना है। द्विवेदी जी
सृजन से केवल हिंदी भाषा को ही नहीं रेखांकित करते, बल्कि
विभिन्न भाषाओं से अन्तसंबंध बताते चलते हैं । द्विवेदी जी यदि
कहीं अकेले बैठे दीख जाते हैं तो लगता है कि उनसे शताब्दियाँ
संवाद कर रही हैं। इतिहासकारों ने जिन बातों का संकेत बहुत बाद
में किया, द्विवेदी जी ने अपने साहित्य में पहले ही रच दिया
था। द्विवेदी जी की तीसरी आँख ही इतिहासबोध है। समारोह के
विद्वान संयोजक डॉ. शत्रुध्न पाण्डेय ने अपने संचालन प्रतिभा
के बल पर सरस वातावरण में अन्त तक सभी को बाँधे रखा। करतल
ध्वनि के बीच अध्यक्ष डॉ. रघुवंश मणि पाठक ने आचार्य हजारी
प्रसाद द्विवेदी के प्रिय शिष्य एवं मुख्य अतिथि डॉ. विश्वनाथ
त्रिपाठी को ‘आचार्य
हजारी प्रसाद द्विवेदी स्मृति सम्मान-2007’
से अलंकृत किया तथा डॉ. प्रमोद कुमार सिंह को
‘डॉ.
भगवतशरण उपाध्याय स्मृति सम्मान-2007’
और विशिष्ट अतिथि डॉ. वेद प्रकाश को
‘आचार्य
परशुराम चतुर्वेदी सम्मान-2007’
और विशिष्ट अतिथि डॉ. वेद प्रकाश को
‘आचार्य
परशुराम चतुर्वेदी सम्मान-2007’
से सम्मानित किया।
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