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एक शब्द
हाथ
डॉ. गंगाप्रसाद बरसैंया
हाथ कर्म के सशक्त माध्यम है। मानसिक सृजन को हाथों के
द्वारा ही साकार किया जा सकता है। हाथ के बिना क्रिया कठिन है।
जितने लम्बे जितने मजबूत हाथ होंगे व्यक्ति उतने ही बड़े कठिन
है। जितने सकेगा। इसलिये जीवन में किसी को हाथ पर हाथ रखकर
बेकार नहीं बैठना चाहिये बल्कि परस्पर सहयोगियों के हाथों में
हाथ डालकर मजबूती से हाथों-हाथ कठिन से कठिन कार्य करना ही
बुद्धिमानी है। जो आदमी अपने हाथों का भरोसा करता है उसे किसी
ज्योतिषियों को हाथ की लक़ीरें दिखाकर कोरे भाग्य पर भरोसा
करके निठल्ला नहीं बैठना पड़ता। वह अपने पौरुष से हाथ की
लकीरें बदल सकता है, मिटा सकता है। जो लोग हाथ आये अवसर का
भरपूर उपयोग करते हैं, सफलतायें उनके क़दम चूमती हैं और जो
अवसर को हाथ से निकाल देते हैं वे हाथ मलमल कर पछताने के सिवा
कुछ नहीं कर सकते ।
स्थिर चित्त, संकल्पित मन और मजबूत हाथों के लिए संसार में
कुछ भी असंभव नहीं है। बड़ी से बड़ी समस्याओं को हल करना उनके
बायें हाथ का खेल होता है। समय आने पर जो संघर्ष से बचकर हाथ
ऊँचा कर देते हैं उन पर समाज विश्वास नहीं करता । किसी भी
कार्य की सिद्धि के लिये हाथ पैर तो चलाना ही पड़ता है। बिना
प्रयास के सिद्धि संभव नहीं लेकिन जो बिना किसी योजना के हाथ
पैर पटकते, फड़फड़ाते या फैलाते हैं उनका सबका किया-कराया
बेकार हो जाता है। निरुद्देश्य हाथ पैर मारने से कुछ होने वाला
नहीं।
मनुष्य को अपने हाथों की कमाई पर भरोसा करना चाहिये। पराये
हाथों अपने को सौंपकर दूसरों के बल-भरोसे चलने वाले कभी
प्रतिष्ठित नहीं हो सकते। कई लोगों के हाथों में यश होता है,
वे सहज सफलता प्राप्त कर लेते हैं। हाथों को यश कर्मठता से
प्राप्त होता है। जो लोग हाथ धोकर पैसे के पीछे भागते हैं,
उन्हें प्रायः अपयश ही हाथ लगता है। पर जो लोग सुख-वैभव, पैसा
को अधिक महत्व न देकर उसे केवल हाथ का मैल समझते हैं, किसी भी
कार्य से अपने हाथों को गंदा नहीं होने देते, उनको बड़े बड़े
पैसे वाले भी प्रणाम करके विनम्रता से हाथ जोड़ते हैं। हमें
अच्छे लोगों के साथ होना चाहिये। बुरे लोगों के तो दूर से
हाथ-ही-हाथ जोड़ने में भलाई है। यदि ईश्वर ने हमें सम्पन्न
बनाया है तो हमारा कर्त्तव्य है कि हम उस सम्पन्नता का लाभ
दूसरों को देकर सुखी बनायें। जो भी हमारे पास है दोनों हाथों
से उलीचें । दोनों हाथों से लुटायें। खुले हाथ व्यक्ति की
उदारता के साक्षी हैं। बन्द हाथों से बड़प्पन दूर ही रहता है।
पर खुले हाथ का आशय यह भी न लगाना चाहिये कि निरर्थक ख़र्च
करें। यदि ऐसा किया तो बाद में पछताना पड़ेगा और कुछ भी हाथ न
लगेगा। हाथ की आई शून्य वाली बात हो जायेगी । वैसे हमें जहाँ
तक बने सभी के काम में हाथ लगाकर, हाथ बँटाकर सहयोग तो करना ही
चाहिये । हम चोटों के सिर पर हाथ रखकर अपना स्नेह और संरक्षण
दें। बच्चों को हाथों पर रखकर प्यार करें ताकि उन्हें कोई कष्ट
न हो। यदि उन्हें सहारा न देंगे तो अपने हाथ-पैर तुड़वा सकते
हैं। कभी-कभी ऊधमी और बदमाश भी कमज़ोर लोगों के हाथ-पाँव तोड़
देते हैं। उनसे बचने में ही भलाई है। अन्यथा वे कभी भी दो चार
हाथ जमा देंगे।
कभी-कभी ऐसे अवसर आते हैं जब हमें बहुत-सी बातें गुप्त रखनी
पड़ती है और हम प्रयास करते हैं कि दाँये हाथ की बात बाँये हाथ
को भी ज्ञात न हो पाये। यदि भेद खुल गया तो दुष्परिणाम हो सकते
हैं। हमें इस बात का भी ध्यान रखना पड़ता है कि ग़लत हाथों में
न खेलें क्योंकि आज जो हमारा दाँया हाथ बनकर हाथ की छड़ी बना
हुआ है, सहारा दे रहा है, वह स्वार्थवश कल हमारे हाथों से खिसक
भी सकता है। इसलिए हाथों की पकड़ मजबूत होना चाहिये। वैसे हाथ
उठता है, हाथ दबता है और हाथ पड़ता है। हाथ दबने पर आदमी विवश
हो जाता है।
मनमानी अच्छी नहीं होती। जो अपना हाथ जगन्नाथ मानकर मनमानी
करते हैं वे दुखी भी होते हैं। हमें अपने हाथ तो साफ़ रखना ही
चाहिये पर किसी पर हाथ साफ़ कर नुकासन पहुँचाना मनुष्यता नहीं,
चोरी है। इसलिए हाथ की सफ़ाई करने वाले चोर-कलाकारों से सावधान
रहना पड़ता है, अन्यथा हाथ के दाम और चले जायेंगे। कभी-कभी
अंधे के हाथ बटेर लगा जाती है और धोखे से मिली सफलता के लोग
आदी हो जाते हैं। यह ख़तरनाक है। इस पर भरोसा करना व्यर्थ हैं
। इससे व्यक्ति कभी-कभी हाथ से बेहाथ हो जाता है। जीवन में ऐसे
अंधेरों से भी गुज़रना पड़ता है यहाँ अपना हाथ अपने को ही नहीं
सूझता। ऐसे क्षणों में न निराश होने की ज़रूरत है, न हाथों में
सरसों जमाकर बैठने की आवश्यकता। स्थिर मन से चिन्तन करना
चाहिये। हाथ का काम छोड़कर अनिश्चित की ओर भागना चतुराई नहीं
है। हम किसी पर हाथ न उठाये, पर इसका भी प्रयास करें कि किसी
को अपने पर हाथ उठाने का अवसर भी न दें। हम अपनी बुद्धि से
विचार करें, किसी के हाथ की करछुल या खिलौना न बन जाये कि वह
हमारा मनमाना प्रयोग करे। जिनके हाथों में ऐसी कला है उनके हाथ
न कभी खाली रहेंगे, न गलत दिशा में बहकेंगे।
डॉ. गंगाप्रसाद
बरसैया
के 30 आपीआईए
रोड
नं. 1,
कोटा (राज.) -
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