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सृजनगाथा

 

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वर्ष-3, अंक-27, अगस्त 2008

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।। विचार-वीथी ।।

 

 

संयम की सामाजिक प्रांसगिकता


डॉ. महावीर शरन जैन

 

ध्यात्मिक दृष्टि से संयम आत्मा का गुण है। इस कारण आत्मानुशासन संयम है। आत्मा में एकाग्र होना संयम है। संयम एवं दमन में अन्तर है। पुराने शास्त्रों में यद्यपि संयम एवं दमन पर्याय रूप में प्रयुक्त हैं। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से दोनों में अन्तर है।

 

संयम का अर्थ नियन्त्रण एवं दमन का अर्थ दबाना है। जब व्यक्ति चेतन मन में चलने वाले संघर्ष को नियंत्रित नहीं कर पाता, तो वह संघर्ष अचेतन मन में चला जाता है। वहाँ वह दमित अवस्था में परिणत हो जाता है। व्यक्ति का अहंकार जितना प्रबल होता है उसके जीवन में दमित वासनायें उतनी ही प्रबल एवं उग्र होती हैं। एक ओर वासनाओं के दमन से व्यक्तित्व का विकास रुक जाता है तो दूसरी ओर वासनाओं के स्वच्छन्द एवं उन्मुक्त व्यवहार से सामाजिक जीवन की व्यवस्था नष्ट हो जाती है। कुछ मनोवैज्ञानिक मानसिक रोगों के निराकरण के लिए दमित वासना के प्रकाशन को आवश्यक मानते हैं। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि अनेक दमित वासनायें असामाजिक एवं अनैतिक होती हैं। इनका स्वतन्त्र प्रकाशन एवं आचरण सामाजिक-व्यवस्था की दृष्टि से सम्भव नहीं होता। दमित वासनाओं का व्यवहारगत-प्रकाशन कालगत अन्तराल के कारण भी उचित नहीं होता। बाल्यकाल की दमित इच्छाओं को व्यक्ति जीवन के यौवनकाल अथवा प्रौढ़ावस्था में प्राकृतिक रूप से तृप्त नहीं कर सकता। इसके अतिरिक्त इस प्रक्रिया से मानसिक द्वन्द्व बढ़ जाता है। यदि हम दमित कामवासना को अपने आचरण में प्रकाशित होने की छूट प्रदान करते हैं तो ऐसा करने से मानसिक द्वन्द्व का निराकरण नहीं हो पाता, उसका रूपान्तरण होता हैकामवासना के दमन के समय वह शक्ति प्राय: मनुष्य की 'अहंकार-बुद्धि' होती है। कामवासना को अपने आचरण में प्रकाशित होने की छूट देते समय मनुष्य की अहंकार-बुद्धि का दमन हो जाता है। इससे एक प्रकार के दमन का स्थान दूसरा दमन ले लेता है।

 

दमन से मनुष्य की स्मृति का ह्रास होता है, चित्त की एकाग्रता समाप्त होती है, इच्छा शक्ति दुर्बल होती है । जीवन चिंता, भय, क्रोध आदि भावों से संत्रस्त हो जाता है ।

         

जब मनुष्य अचेतन मन की अंधेरी कोठरी में झांकता है तब अचेतन मन में नये अनुभवों का दमन होना बन्द हो जाता है। दमित वासनायें चेतन मन के स्तर पर आ जाती हैं। चेतन और अचेतन मन में समन्वय स्थापित हो जाता है। व्यक्ति चेतन मन के धरातल पर स्व-प्रयत्न से आत्म नियन्त्रण करने में समर्थ हो जाता है। अचेतन मन का कार्य दमन है, चेतन मन का कार्य आत्मनियन्त्रण है। आत्मनियन्त्रण से मनुष्य की मानसिक शक्ति बढ़ती है, उसके चरित्र का निर्माण होता है तथा व्यक्तित्व का विकास होता है। 'आत्म-नियन्त्रण' का अर्थ चेतन मन के भाव का अचेतन में जाकर दमित होना नहीं है। इसका अर्थ चेतन मन के धरातल पर मन के उग्रभावों को दृढ़ता के साथ जानबूझकर नियन्त्रित करना है, वश में करना है।

      

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से चेतन मन के धरातल पर प्रवृत्तियों के आत्म-नियन्त्रण से व्यक्तित्व का विकास होता है। आध्यात्मिक दृष्टि से इन्द्रियों के विषय-विकारों पर प्रतिबन्ध लगाये बिना साधना सम्भव नहीं है। संयमहीन साधना छलनी में पानी इकट्ठा करने के समान है। शास्त्रों में 'संयम: खलु जीवनम्' कहा गया है। संयम को ही जीवन का पर्याय माना गया है।

      

सभी आध्यात्मिक दर्शन धाराओं में संयम के महत्व का प्रतिपादन हुआ है। 'अहिंसा संजमो तवो' कहकर महावीर ने अहिंसा, संयम और तप को धर्म का मूलाधार माना है। बुद्ध ने संयम के लिए अप्रमाद शब्द का प्रयोग किया है। योगी लोग इन्द्रियों के विषय विकारों को रोककर अपने वश में करते हैं, उनका संयम रूपी अग्नि में हवन करते हैं। गीता में 'आत्मसंयम योगाग्नौ जुह्यति ज्ञानदीपिते' कहा गया है। ज्ञान से दीप्त आत्म संयम रूपी योग-अग्नि में हवन करने का परामर्श दिया गया है। संयमी जीवन की पहली शर्त 'अप्रमाद' है। संसारी मनुष्य विषयों के प्रवाह में ही बहते रहते हैं। इन्द्रियों के सुख को ही मानव जीव का लक्ष्य मानकर चलते हैं। सन्त पुरुषों का लक्ष्य प्रतिस्रोत है। वे मुक्त होना चाहते हैं, स्वतन्त्र होना चाहते हैं, सहज होना चाहते हैं। संयम से इन्द्रियों की परतन्त्रता से छुटकारा मिलता है। संयम आत्मा का सहज स्वभाव है। साधना काल में संयम साधन है, सिद्धिकाल में स्वभाव है। अनुस्रोत संसार है, असंयम है, आत्मा का कषायों से संयोग है। प्रतिस्रोत संसार से बाहर निकलने का उपाय-द्वार है, आत्मा की अनात्मा से दूरी है, इन्द्रियों के सुख से विरत होकर विशुद्ध चैतन्य की ओर उन्मुखता है।

 

मानव जाति का अस्तित्व संयम के बिना सम्भव नहीं है। मनुष्य अपनी पाशविक वृत्तियों के नियन्त्रण के द्वारा ही सामाजिक प्राणी बन पाया है। सामाजिक संरचना एवं व्यवस्था तभी कायम रह सकती है, जब उसके सदस्य नियमों का पालन करें। नियमों का पालन करना ही सामाजिक संयम है। पाश्चात्य राजनीतिज्ञ हॉब्स ने समाज-रचना से पूर्व की स्थिति पर विचार किया है। वे इसी निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि जब तक मनुष्य ने समाज नहीं बनाया था, तब तक उसे धर्म, मर्यादा, नैतिकता तथा संयम का ज्ञान नहीं था। वह मन में उठने वाली वासनाओं की पूर्ति के लिए दल बनाकर जंगलों में घूमता था। एक दल दूसरे दल पर आक्रमण कर, उसकी सम्पत्ति छीनने का प्रयास करता था। जो दल सबहोता था, वह शत्रु दल के सदस्यों को बन्दी बनाकर मार डालता था। कोई दल सुरक्षित नहीं था। सबके जीवन में असुरक्षा की भावना थी। इस जीवन से परेशान होकर सबने मिलकर समाज बनाया और इस प्रकार अपने जीवन में संयम का पालन करना सीखा। समाज की प्रत्येक इकाई अपने को संयम की परिधि में बांधकर जब जीवन व्यतीत करती है तभी समाज में शान्ति व्यवस्था कायम रहती है। जब किसी समाज के सदस्य संयम के बंधनो को तोड़ते हैं तो उस समाज के वातावरण में ज़हर घुल जाता है। स्वच्छन्द एवं कामुक प्रेम का आचरण करने वालों के जीवन में क्या होता है ? प्रेम शारीरिक वासना की तृप्ति का साधन बनकर रह जाता है। मन का मिलन नहीं हो पाता। तथाकथित आधुनिक-समाज के व्यक्तियों के जीवन में इस तथ्य को साक्षात देखा जा सकता है। स्वच्छन्द यौनाचार के कारण उनके जीवन में अतृप्ति, वितृष्णा, कुंठा एवं संत्रास की प्रवृत्तियाँ मुखर हैं। इन्द्रिय-भोगों की तृप्ति असंख्य भोग-सामग्रियों के निर्बाध सेवन एवं संयम-शून्य कामाचार से सम्भव नहीं है। इसका कारण यह है कि मनुष्य की इच्छाओं का कोई अन्त नहीं है। आग में जितना घी डाला जाता है, आग उतनी ही अधिक उद्दीप्त होती है। इस कारण जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संयम अनिवार्य है।

      

क्रोध पर संयम न करने के कारण हमारा जीवन संघर्षों से भर जाता है। काम पर संयम न रखने के कारण हम पशु के धरातल पर उतर आते हैं। संयम-हीन आचरण के कारण ही जीवन में अशांति, व्याकुलता, द्वेष, अमानवीयता, क्रूरता आदि भावों एवं वृत्तियों का संचार होता है । मनुष्य ने वैज्ञानिक साधनों के द्वारा अपनी उत्पादन शक्ति मे असीम वृद्धि की है । प्रत्येक राज्य-शासन के आँकड़े सूचना देते हैं कि वस्तुओं का उत्पादन बढ़ रहा है । इसके बावजूद समाज में अशांति क्यों है । वास्तव में जब तक व्यक्ति का भोग की इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं होगा, तब तक पिपासा शांत नहीं होगी । आधुनिक जीवन के सबसे महत्वपूर्ण मूल्य स्वतंत्रता एवं समानता है । इन दोनों के लिए संयम आवश्यक है । जब व्यक्ति अपने आप पर नियंत्रण करता है, सामाजिक नियमों का पालन करता है, दायित्व बोध की दृष्टि से जीवन व्यतीत करता है तभी उसके अधिकार तथा स्वतंत्रता क़ायम रहते हैं ।

      

इसी प्रकार जब व्यक्ति भौतिक वस्तुओं के परिग्रह का संयम करता है, तभी आर्थिक विषमताओं का अन्तर कम होता है तथा समाज के द्वारा उत्पादित वस्तुएँ प्रत्येक इकाई तक पहुँच पाती हैं। इस दृष्टि से अहिंसा का आधार अपरिग्रह है एवं अपरिग्रह का आधार संयम है। 

 

   प्रोफ़ेसर महावीर शरन जैन

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