|
मोबाइल मेनिया- जान जोख़िम
में
रविशंकर
श्रीवास्तव
मोबाइल फ़ोनों ने व्यक्ति के जीवन में आमूल-चूल
परिवर्तन ला दिया है – वो भी महज़ पिछले चार-पाँच वर्षों में। हालात ये हो गए हैं कि
मोबाइल खाना, मोबाइल पीना और मोबाइल सोना जैसा हिसाब हो गया
है। बेहद सस्ते, परंतु तमाम फ़ीचर युक्त चीनी मोबाइलों और
मोबाइल सेवा प्रदाताओं के सस्ते असीमित टाक-टाइम और एसएमएस
प्लानों ने कोढ़ में खाज का काम किया है। मगर, क्या हमें पता
भी है कि ये हमारे स्वास्थ्य में कितना कुप्रभाव डाल रहे हैं?
आपने महज़ दो हज़ार रुपए में एक शानदार, चीनी मोबाइल ख़रीदा है
– जिसमें कैमरा भी है, एमपी-3 प्लेयर भी है, एफ़एम ट्यूनर भी
है, टीवी प्रदर्शक भी है, टच स्क्रीन भी है, बिल्ट इन स्पीकर
और गेम्स भी हैं, इंटरनेट-ईमेल सुविधा भी है, और इसमें तमाम न
जाने और भी क्या-क्या सुविधाएँ भी हैं जिनकी आपको जानकारी नहीं
है। आपने अपने इस प्यारे फ़ोन के लिए महज़ चार सौ निन्यान्बे
रुपए में असीमित टाकटाइम वाला प्लान भी ले लिया है और अब हो गए
हैं आप पूरे मोबाइल। अब आपके दिन के अठारह-बीस घंटे इस मोबाइल
के साथ बीतते हैं। जब आप किसी से बात नहीं कर रहे होते हैं तो
या तो आप गाने सुन रहे होते हैं, या फिर आप इसमें कोई गेम खेल
रहे होते हैं या फिर किसी को संदेश लिखने या अग्रेषित करने या
उसके संदेश को पढ़ने में व्यस्त होते हैं। गरज़ यह कि
खाते-पीते-सोते-उठते-बैठते मोबाइल। टॉयलट और स्नानघर में भी
आपका मोबाइल आपका पीछा नहीं छोड़ता और आप वहाँ भी चालू रहते
हैं।
आज की दुनिया में कनेक्टिविटी ज़रूरी है। दूरस्थ गाँव का किसान
भी मंडी के ताज़ा भाव के लिए लगातार कनेक्शन में बना रहना
चाहता है। संक्षिप्त संदेश में आप आज के अपने भविष्य से लेकर
क्रिकेट के ताज़ा आँकड़े और संता-बंता के चुटकुले सबकुछ पा
सकते हैं। मोबाइल मोबाइल न रहकर मनोरंजन प्रदान करने का उपकरण
ज़्यादा बनता जा रहा है, और इसीलिए यह आपके दैनिंदनी जीवन में
और ज़्यादा दखल देता जा रहा है। आधे से ज़्यादा मोबाइल
उपयोक्ता मोबाइल एडिक्शन के शिकार हो जाते हैं और उनमें एक तरह
से मोबाइल मेनिया हो जाता है। हर समय मोबाइल से चिपके रहना व
हर चौथे-छमाहे नये नए ब्रांड का मोबाइल ख़रीदना आख़िर अच्छे
लक्षण तो नहीं ही हैं। हद तो यह है कि महँगे, रत्नजटित मोबाइल
फ़ोन अब फैशन स्टेटमेंट में शामिल होने लगे हैं। गोया मोबाइल
मोबाइल न हुआ आभूषण हो गया। मगर, क्या आपको पता है कि मोबाइलों
से,
मोबाइल के अत्यधिक प्रयोग से आप अपने स्वास्थ्य को ख़तरे में
डाल रहे हैं?
अधिक प्रयोग के अधिक ख़तरे
मोबाइल फ़ोनों का आकार-प्रकार छोटा बनाया जाता है ताकि
पोर्टेबिलिटी में सुविधा रहे। और अत्यंत आवश्यकता के समय
संक्षिप्त संवादों के ज़रिए काम की बातें की जाएँ व संदेशों का
आदान प्रदान हो। यदि इसे सामान्य फ़ोन या संदेश वाहक की तरह
प्रयोग में लिया जाए तो इसमें निहित ख़तरे तो हैं हीं। यदि आप
इसके छोटे से स्क्रीन का प्रयोग ढेरों संदेश पढ़ने में लगाते
हैं तो आप अपनी आँखों पर ज़रूरत से ज़्यादा दबाव डाल रहे होते
हैं जिसका खामियाजा आपको आगे चलकर पता चलेगा। यदि आप एसएमएस
जंकी हैं और लोगों को तमाम तरह के एसएमएस लिखकर भेज रहे होते
हैं तो आप अपनी उँगलियों पर ज़बरन अत्याचार कर रहे होते हैं।
आमतौर पर मोबाइल उपकरणों में एक अक्षर को लिखने में कोई
तीन-चार बार बटन दबाने होते हैं। हिन्दी में लिखने हेतु यह
संख्या सात-आठ बार भी हो सकती है। तो यदि आप सिर्फ दस शब्द का
एसएमएस संदेश भी भेजते हैं तो आप वहाँ इतनी मेहनत कर चुके होते
हैं कि इतने में कम्प्यूटर पर पूरा-का-पूरा पृष्ठ लिख कर भेज
सकते हैं। यही हाल मोबाइल पर गेम खेलने का है। मोबाइल के बटन
गेम खेलने के हिसाब से बहुत ही असुविधाजनक रूप से स्थित होते
हैं और छोटे होते हैं। और इसी कारण थोड़े से समय में ही आपकी
उँगलियाँ और अँगूठे दर्द करने लगते हैं। यदि आप इन्हें अनदेखा
करते हैं तो आप की उँगलियाँ आरएसआई (रिपिटिटिव स्ट्रेस
इंज्यूरी) के शिकार हो सकते हैं। यदि आप मोबाइल पर संगीत
लगातार सुनते रहते हैं और इयरफ़ोनों के ज़रिए ज़्यादा तेज़
आवाज़ में सुनते हैं तो लंबे समय में आपकी श्रवण क्षमता में
कमी आ सकती है।
विकिरण जनित ख़तरे
बेतार मोबाइल फोनों में संचारण के आदान प्रदान हेतु
इलेक्ट्रो-मेग्नेटिक वेब का प्रयोग होता है। ये उसी क़िस्म के
इलेक्ट्रो-मेग्नेटिक वेब होते हैं जो माइक्रोवेब चूल्हों में
प्रयोग में आते हैं। बस, इनकी फ़्रिक्वेंसी, वेब लेंथ अलग होती
है और मात्रा नगण्य। मगर फिर भी ये आपके उतकों जिनका 70
प्रतिशत हिस्सा पानी का होता है, पर विद्युतीय प्रभाव डालते
हैं और उन्हें गर्म करते हैं। मानव शरीर का उतक डायपोलर होता
है, और यह इलेक्ट्रोमेग्नेटिक विकिरणों से प्रभावित होता है।
आयोनाइजेशन क़िस्म के रेडियेशन जो अलग फ़्रिक्वेंसी के
इलेक्ट्रोमेग्नेटिक वेब होते हैं (वैसे इस तरह के वेब मोबाइलों
में प्रयुक्त नहीं होते) वे मनुष्यों के उतकों व डीएनए
स्ट्रक्चर में बदलाव कर सकने की ताक़त रखते हैं। हालाँकि अभी
तक यह प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध नहीं किया जा सका है कि मोबाइल
फ़ोनों के ज़्यादा इस्तेमाल से कोई ख़ास बीमारी होती ही है,
मगर विविध अध्ययनों में यह पाया गया है कि मोबाइल फ़ोनों के
अधिक इस्तेमाल के कारण कैंसर जैसी बीमारी होने की संभावनाएँ
ढाई गुना ज़्यादा हो जाती हैं।
मोबाइलों से कहीं ज़्यादा ख़तरे मोबाइल संचार के वे टावर पैदा
करते हैं जो घनी आबादी में, रिहाइशी मक़ानों के ऊपर लगाए जाते
हैं। कई पश्चिमी देशों में स्कूलों में व आबादी में मोबाइल
टावर लगाने पर इन्हीं कारणों से प्रतिबंध है, मगर भारत में
मोबाइल टावर धड़ल्ले से घनी आबादी में मनचाही जगह पर लगाए जा
रहे हैं। यही नहीं, संसाधनों का साझा करने के बजाए हर मोबाइल
सेवा प्रदाता अपना अलग टावर खड़ा करता जा रहा है। कल्पना
कीजिए कि किसी मोहल्ले में चार से छः (जो कि कहीं कहीं आम बात
है) मोबाइल टावर लगे हैं और सैकड़ों वाट शक्ति के
इलेक्ट्रोमेग्नेटिक वेब विकिरण वहाँ रहने वालों के शरीर में से
गुज़र रहे हैं। ये विकिरण लंबे समय में शरीर में विविध प्रकार
के विपरीत प्रभाव डालते हैं।
इजराइली वैज्ञानिकों की एक टोली ने
1266
व्यक्तियों के मोबाइल उपयोग के
तुलनात्मक अध्ययन किए। इनमें
402
लोगों में मुख कैंसर के शुरुआती
लक्षण पाए गए, 56
लोगों में इस बीमारी का स्तर गंभीर पाया गया।
सर्वेक्षण और संकलित आँकड़ों के विश्लेषण का नतीज़ा यह रहा कि
पैरोटिड ग्लैंड
ट्यूमर के शिकार ज़्यादातर वे लोग हैं,
जो मोबाइल फ़ोन का बेतहाशा इस्तेमाल
करते रहे हैं। ऐसे लोगों में यह बीमारी होने की संभावना उन
लोगों की तुलना में 50
फीसदी ज़्यादा पाई गई
जिन्होंने कभी मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल नहीं किया।
इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि पैरोटिड ग्लैंड ट्यूमर -
मुँह के उसी हिस्से में हुआ,
जिधर व्यक्ति आमतौर पर मोबाइल फ़ोन रखता है। यह बात भी सामने
आई कि दूरदराज के
इलाकों में जहाँ अच्छा सिग्नल नहीं होने के कारण (ऐसे स्थानों
पर मोबाइल ज़्यादा मात्रा में सिगनल भेजने की कोशिश करता है)
लोग फ़ोन को कान से कसकर
लगाते हैं,
उन्हें ट्यूमर का ख़तरा ज़्यादा होता है।
एक अन्य शोध में यह
सिद्ध
हुआ है कि
मोबाइल
फ़ोन
का विकिरण दिमाग़ पर असर डालता है,
जिसके कारण इंसान का तनाव बढ़ जाता है और उसकी
दिमाग़ी
सक्रियता भी बढ़ जाती है। शोधकर्ताओं ने
18 से
45 साल के 35 पुरुषों
और 36 महिलाओं पर अध्ययन के बाद यह
नतीज़ा निकाला है। जो लोग मोबाइल
फ़ोन के
ज़्यादा
संपर्क में रहते हैं,
उन्हें गहरी नींद कम समय तक ही आ पाती है।
शोध में
यह भी
पाया गया कि 884
मेगा हर्ट्ज के
इलेक्ट्रोमेग्नेटिक वेब
नींद खराब
करते हैं। ये
वही तरंगें हैं,
जो मोबाइल फोनों
से निकलती हैं।
बचाव
मोबाइलों से पीछा, ये तो तय है कि अब छुडाया नहीं जा सकता।
नर्क में भी ये आपका साथ नहीं छोड़ेगा और स्वर्ग में तो ख़ैर
इसकी ख़ास ज़रूरत रहेगी ही, क्योंकि इसके बगैर स्वर्ग की
कल्पना नहीं की जा सकती। अब सवाल ये है कि इससे होने वाली
स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से कैसे बचा जाए?
कुछ सुझाव हैं –
·
मोबाइलों का प्रयोग कम-से-कम, अत्यंत आवश्यक होने पर ही करें।
सीधी व काम की बात करें व वार्तालाप संक्षिप्त रखें। यदि पास
में लैंड लाइन फ़ोन उपलब्ध है, या संचार के दूसरे साधन जैसे कि
इंटरनेट युक्त कम्प्यूटर की सुविधा दोनों ओर उपलब्ध है तो उसकी
सुविधा का प्रयोग करें।
·
मोबाइल को अपने शरीर से दूर रखे रहें। उपयोग में नहीं होने पर
भी यह इलेक्ट्रोमेग्नेटिक वेब छोड़ता रहता है। उपयोग के दौरान
यदि आप (हेडसेट) कर्ण यंत्र व माइक्रोफ़ोन प्रयोग करें तो
उत्तम।
·
अच्छी कंपनी का मोबाइल ख़रीदें
–
जो एफ़ीशिएंट होते हैं, और संचारण हेतु कम मात्रा में
इलेक्ट्रोमेग्नेटिक ऊर्जा छोड़ते हैं और इस वजह से कम नुकसान
पहुँचाते हैं।
रविशंकर श्रीवास्तव
100, सुकृति, राजीव नगर (कस्तूरबा)
रतलाम, म.प्र - 457001
◙◙◙
|