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वर्ष-3, अंक-27, अगस्त 2008

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।। कहानी ।।

 

 

कश्मीरियत की राह में राही को ज्ञानपीठ


कृष्ण कुमार यादव

 

श्मीर को धरती का स्वर्ग कहा जाता है। पर वक़्त ने कश्मीर के साथ ऐसा खेल खेला कि आतंकवाद की आग में मासूम कश्मीरियत जलने लगी। खैर वक़्त ने फिर से करवट बदली और एक बार कश्मीरियत पुन: अपने उसी अंदाज़ में जी उठी। कश्मीर सदैव से विद्वानों और कवियों की भूमि रही है। इनमें अभिनव गुप्त, कल्हण, लल्लेश्वरी, शेख नुरूद्दीन, गणी कश्मीरी, ललितादित्य, मुंशी भवानीदास काचरू, ब्रजनारायण 'चकबस्ते', रतननाथ दर 'सरशार', डॉ. इकबाल, चन्द्रकान्ता, गुलाब अहमद महजूर, मास्टर जी, आजाद, दीनानाथ नादिम इत्यादि का नाम लिया जा सकता है। ऐसे में यदि कश्मीरी धरा के किसी पुत्र को भारतीय साहित्य का सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार न मिला हो तो आश्चर्य भी होता है और क्षोभ भी।

 

हाल ही में भारतीय भाषा में महत्वपूर्ण योगदान के लिये कश्मीरी कवि अब्दुल रहमान राही को वर्ष 2..4-.5 के लिये 4.वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार देने की घोषणा करके सचमुच एक सराहनीय कार्य किया गया है, जिसके कि समृध्द साहित्य के नज़रिये से दूरगामी परिणाम होंगे। स्वयं राही इसे भारतीय संस्कृति में कश्मीरी भाषा व साहित्य के बढ़ते महत्व रूप में देखते हैं। उनके मत में सदियों की गुलामी के कारण कश्मीरी भाषा को अपनी पूरी क्षमता सामने लाने का मौका नहीं मिला, फिर भी एक लम्बे ऐतिहासिक दबाव के बावजूद इसने अपने आप को जिस तरह बचाये रखा वह प्रशंसनीय है। ज्ञानपीठ पुरस्कार द्वारा कश्मीरी भाषा की सृजनात्मक शक्ति और भाषा वैज्ञानिक गरिमा को सराहा गया और इसके सांस्कृतिक महत्व को भी पहचाना गया है।

 

आधुनिक कश्मीर के सबसे चर्चित व प्रतिष्ठित कवि, पत्रकार और आलोचक अब्दुल रहमान राही राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार तब चर्चा में आए जब 1961 में उन्हें 'साहित्य अकादमी' पुरस्कार प्राप्त हुआ। इसके बाद राही को 198. में जम्मू कश्मीर सांस्कृतिक अकादमी अवार्ड, 1989 में भारत सरकार की फेलोशिप और फिर 2... में पद्मश्री से नवाज़ा गया। इसके अलावा राही को 'राष्ट्रीय कबीर सम्मान' भी प्राप्त हुआ। 6 मई 1925 को कश्मीर के एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार में जन्मे राही को माता-पिता का सान्निध्य लम्बे समय तक प्राप्त नहीं हुआ, सो बचपन ननिहाल में गुज़रा। राही ने जम्मू कश्मीर विश्वविद्यालय से फारसी और अँगरेज़ी साहित्य में एम.. की उपाधि प्राप्त की। उम्र के एक मुकाम पर पहुँचकर आजीविका हेतु राही ने लोक निर्माण विभाग में सरकारी मुलाज़िम की नौकरी ज्वाइन कर ली पर इसी बीच जनवादी धारणा भी उन पर हावी होती गयी। यह वह दौर था जब कश्मीर ने जंग के बीच आज़ादी की सुबह देखी थी और सोवियत संघ के कम्युनिज्म की लहर विश्व के कई देशों को अपनी ओर आकर्षित कर रही थी। कश्मीर भी इस धारा से विमुख नहीं रह पाया और इसी के साथ साहित्य में प्रगतिशील लेखन का दौर भी आरम्भ हो गया।

 

कश्मीर के चर्चित कवि गुलाम अहमद महजूर और दीनानाथ नादिम ने इस दौर में कश्मीरी काव्य-धारा को प्रभावित करना आरम्भ कर दिया था। चूँकि साहित्य समाज का प्रतिबिम्ब होता है और उस दौर में शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में कश्मीर में राजशाही के खिलाफ आँधी ज़ोरों पर थी और एक नए कश्मीर का निर्माण हो रहा था सो दीनानाथ नादिम के नेतृत्व में इस दौर में साहित्यिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में जनांदोलन के लिए सांस्कृतिक फ्रंट की स्थापना हुयी जिसे राही ने कालान्तर में तीव्रता दी। अपने जुदा अंदाज के चलते शीघ्र ही राही 'प्रगतिशील लेखक संघ' के महामंत्री बन गए और प्रगतिशील धारा को एक नई ऊँचाई प्रदान की।

 

राही पर शेख नुरूद्दीन और ललेश्वरी का भी प्रभाव पड़ा। कश्मीर में लल्ला दादी के नाम से मशहूर ललेश्वरी अपने विद्रोह को अध्यात्म और दर्शन के मुहावरे में लपेटकर पेश करने वाली क्रांतिकारी महिला के रूप में जानी जाती हैं। ललेश्वरी ने प्रचलित परम्पराओं व अंधविश्वास एवं कुरीतियों पर जमकर चोट की एवं समाज के बीच रहकर अपनी मान्यताओं को स्थापित किया। राही ने इस दौरान  लिखा- अपने भाग्य पर सवाल न करो/न अमृत की आस/जितने भी लम्हे मिले हैं/खुशी से जियो। इस बीच सरकारी नौकरी त्यागकर राही पूर्णतया साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधयों की ओर प्रवृत्त हुए एवं नेशनल कांफ्रेंस के उर्दू दैनिक पत्र 'खिदमत' के सम्पादकीय विभाग से जुड़ गए। कालान्तर में राही ने प्रगतिशील लेखक संघ की साहित्यिक पत्रिका 'क्वांगपोश' का भी सम्पादन किया और कुछ समय तक दिल्ली से प्रकाशित उर्दू पत्र 'आजकल' के सम्पादक मण्डल में भी रहे।

 

राही ने एक पत्रकार व अध्यापक के रूप में भी काम किया एवं कालान्तर में कश्मीर विश्वविद्यालय में कश्मीरी भाषा व साहित्य विभाग के संस्थापक अध्यक्ष बने। जब राज्य के स्कूलों में कश्मीरी की पढ़ाई बंद करा दी गयी तो राही ने कश्मीरी को पुन: पाठयक्रम में शामिल कराने को अपना ध्येय बना लिया और कामयाबी भी हासिल की। बहुत कम लोगों को पता होगा कि कश्मीरी की प्रमाणिक लिपि नही थी और राही ने पहली बार कश्मीरी स्क्रिपट को कम्पोज किया जो कि आज भी सबसे प्रमाणिक रूप में प्रचलित है। पर तूफां को कौन बांध पाया है, सो राही अंतत: पूर्णतया कविताओं की ओर मुड़ गए ... आख़िर कश्मीर की फ़िज़ां है भी ऐसी।

 

राही कश्मीर की सूफ़ी परम्परा से काफ़ी प्रभावित हैं। उनकी दिली इच्छा है कि इस परम्परा को आगामी पीढ़ियों में भी जिन्दा रखा जाय। वह कहते हैं अब भी जब कश्मीर में नमाज़ पढ़ी जाती है, तब वे पूरे आलम के लिए दुआयें माँगते हैं। तमाम झंझावतों के बावजूद कश्मीरी संस्कृति पर नाज़ करने वाले राही कश्मीरी विस्थापितों को लेकर चिन्तित हैं। इस दौर में वे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को याद करना नहीं भूलते- आज यदि गाँधी जी होते, तो कश्मीर में जो हो रहा है, उन्हें बताते। कश्मीरी बोली के दो बेटे बिछुड़ गये हैं। लौट आइये! मेरे भाइयों, कश्मीर तुम्हारे बिना अधूरा है। कवि के पास शब्दों की बहुत बड़ी सम्पदा होती है।  कहते हैं व्यवस्था बदलने के लिए किसी नारे की जरूरत नहीं बल्कि सोच बदलने की जरूरत है और साहित्य के पास इसकी काबिलियत है। तभी तो रहमान राही कहते हैं कि यदि मैं साहित्यकार न होता तो कोई साज बजाकर अपनी रूह को शान्त करता, सियासत के क्षेत्र में तो नहीं जाता।  

 

मार्क्स से प्रेरित प्रगतिवादी विचारधारा की कविताएँ राही ने ख़ूब रची। पूरी क़ायनात के साथ मनुष्य के संवाद के कवि राही की कविताओं में नाइंसाफ़ी और असमानता के बीच पल रही निरीह जनता के लिए सन्देश हैं। आख़िर एक व्यक्ति जिसका बचपन ब्रिटिश साम्राज्य की क्रूरता देखते हुये बीता था और जब युवावस्था में क़दम रखा तो आज़ादी तो मिली पर बेगानों की तरह। एक तरफ कश्मीर पर कबाइली हमला और दूसरी तरफ विवादों के बीच हिन्दू-मुस्लिम दंगे। देर से ही सही लोकतंत्र का उदय तो कश्मीर में हुआ पर राजनीति के बदलते तेवरों के बीच आतंकवाद और अस्थिरता का साया सदैव कश्मीर मासूमियत को कचोटता रहा। निश्चितत: इन सबका असर राही की रचनावृत्ति पर भी पड़ा। एक दौर वो भी आया, जब उनकी लेखनी से स्वत: फूट पड़ा- नगर का वह राजपथ/ जिस पर हजारों लोग चलते हैं/ मेरे जंगल के अंदर तक चला आया है/ जैसे मेरी आस्थाओं के परिधान में चुपचाप कीड़े रेंगने लगते हों।

  

राही पहले उर्दू में लिखते थे पर 1953 के बाद कश्मीरियत का नज़दीक से अहसास होने पर मातृभाषा कश्मीरी में लिखना आरम्भ कर दिया। चूँकि वह फारसी के भी अच्छे विद्वान हैं, इसलिए फारसी की तमाम अच्छी प्रवृत्तियों को भी कश्मीरी में साथ लाए। फारसी, उर्दू और कश्मीरी भाषाओं एवं परम्पराओं के बेजोड़ विद्वान राही ने करीब 22 कृतियाँ रचीं। उनकी प्रारम्भिक कविताओं का संग्रह 'सनुवैन्य साज' नाम से आया। इस बीच राही ने अपनी कविता को प्रगतिशील आन्दोलन के दायरे से बाहर निकाल आधुनिक काव्य-धारा की ओर उन्मुख किया। नतीज, ज़िंदगी को नए रंगों में देखने की चाहत एवं यथार्थ व कल्पना के द्वंद को कलात्मक अभिव्यक्ति प्रदान करती उनकी 32 प्रतिनिधि कविताओं का संकलन 'नौवरोज-ए-सबा' नाम से आया। इस संग्रह ने राही को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान प्रदान की- समय न जाने कितनी नई सुबहें/कितनी नई शामें दिखाएगा। राही का निबंध संग्रह 'कहवात' साहित्यिक आलोचना की प्रमुख कृति मानी जाती है। राही की अन्य प्रमुख रचनाएं हैं- सुभुक सोदा, स्याह रूदा जरेमंज, कलमी राही, कहवट, शारशिनासी, फैसला। राही की कविताओं पर अल्लामा इकबाल, फैज अहमद फ़ै और अली सरदार जाफरी का असर भी देखा जा सकता है।

 

अब्दुल रहमान राही ने जीवन के 82 वर्षों में बहुत कुछ देखा और महसूस किया है। वे वातावरण में सिर्फ़ एक मूकदर्शक की भांति नहीं खड़े रहे वरन् उसकी क्रिया-प्रतिक्रियाओं में भी शामिल  हुए। उन्होंने अँगरेज़ों के दौर का कश्मीर देखा तो आज़ादी के बाद ख़ून-ख़राबा का मंजर भी। धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर को दिल की गहराइयों से महसूस किया तो आतंकवाद का साया भी मँडराते देखा। तभी तो उनके अंदर से हूक सी निकली- सब विश्वास उजड़े/चरागाहों की झुलसी घास है/सारी चेतना फुफकारती क्रुध्द सांप जैसी/सब देव मेरे ही मन की परछाइयाँ हैं/सब दैत्य मेरा ही कोई विकृत रूप। उम्र के एक दौर में वे अविश्वास और कटुता से भरे कश्मीर के बीच खोखले नारों और वायदों से आजिज भी आ गए और लिखा कि- कभी मैं भी तारों को जन्म देना चाहता था/ अब तो सोचने पर अपना नाम भी याद नहीं आता।  

 

वक़्त के साथ कश्मीर पर मंडराती धुंध छँटती गयी और बर्फ़ में क़ैद रिश्तों की परतें शीतल धाराओं के साथ फिर से कश्मीरियत का सुहाना गीत गुनगुनाने लगीं। फ़िजां में एक बार फिर से वही रूमानियत आने लगी और इसी के साथ राही के शब्दों की गूँज भी दूर तलक जाने लगी। साम्प्रदायिकता और इंसानियत के वजूद को नेस्तनाबूद करती हुई संकीर्ण बद्हवास कट्टरता के ख़िलाफ़ राही की कविताओं में पुरानी परम्परायें एवं कश्मीर की साहित्यिक व रूहानी वसीयत प्रतिबिम्बित होने लगी। ऐसे में देर से ही सही पर पहली बार किसी कश्मीरी कवि को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिये जाने की घोषणा न केवल कश्मीर व कश्मीरी भाषा के लिए वरन समूचे राष्ट्र के लिए गौरव का विषय है। आशा की जानी चाहिए कि कश्मीर की धरती एक बार फिर से साहित्य और संस्कृति की सर्वोच्चता को प्राप्त करेगी, तभी राही के शब्द भी सार्थक होंगे-मेरे शब्दों का कल कोई अर्थ हो न हो/ कल ही तय करेगा/तुम्हारे जलते घावों को ठंडक पहुँचाए/ वे शीतल जलधाराएँ मैं लाता ही रहूँगा।

   कृष्ण कुमार यादव

वरिष्ठ डाक अधीक्षक,

कानपुर मण्डल, कानपुर (उ.प्र.) -208001

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

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