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दक्षिण
भारत की हिंदी पत्रकारिता
का शेषांश
क्रमश...
1.1.10.
हिंदी पत्रकारिता के उद्भव की पृष्ठभूमि
भारत
में अंग्रेज़ों के गुलामी शासन के विरुद्ध शंख-नाद के रूप में
ही पत्रों का उदय और विकास हुआ था । भारतीय पत्रकारिता की जननी
वंगभूमि ही है । हिंदी पत्रकारिता का जन्म और विकास भी वंगभूमि
में ही हुआ । भारतीय भाषाओं में पत्रों के प्रकाशन होने के साथ
ही भारत में पत्रकारिता की नींव सुदृढ़ बनी थी । इसी बीच हिंदी
पत्रकारिता का भी उदय हुआ । यह उल्लेखनीय बात है कि हिंदी
पत्रकारिता का उद्गम स्थान बंगाली भाषा-भाषी प्रदेश (कलकत्ता)
रहा । भारत में समाचारपत्रों के प्रकाशन का श्रीगणेश
अभिव्यक्ति की आज़ादी की उमंगवाले विदेशी उदारवादियों ने किया
। इसके पूर्व ही पश्चिमी देशों तथा यूरोपीय देशों में
पत्रकारिता की महत्ता को स्वीकारा गया था। हिक्की या बंकिघम के
आरंभिक साहसपूर्ण प्रयासों से भारत में पत्रकारिता की नींव
पड़ी थी । वैसे वहाँ शिलालेखों,
मौखिक आदि रूपों में सूचना संप्रेषण का दौर बहुत पहले शुरू हुआ
था,
पर आधुनिक अर्थों में पत्रकारिता का उदय औपनिवेशिक शासन के
दौरान ही हुआ । अंग्रेज़ी शिक्षा की पृष्ठभूमि पर ही जेम्स
अगस्टस हिकी के आरंभिक प्रयास
'हिकीज़
बंगाल गज़ट'
अथवा
'कलकत्ता
जेनरल अडवर्टैज़र'
के रूप में फलीभूत हुआ था । देशी पत्रकारिता के जनक राजा
राममोहन राय माने जाते हैं । भारतीय विचारधारा और दर्शन के
मर्मज्ञ विद्वान होने के साथ-साथ प्राचीन-नवीन सम्मिश्रण के एक
विशिष्ट व्यक्तित्व के रूप में उभरकर उन्होंने एक स्वस्थ
परंपरा का सूत्रपात किया । उस समय तक के भारतीय परिवेश में
आधुनिक आध्यात्मिकता का स्वर भरनेवाले रामकृष्ण परमहंस,
स्वामी विवेकानंद,
रवींद्रनाथ ठाकुर,
श्री अरविंद आदि मनीषियों से भारतीय सांस्कृतिक आंदोलन के रूप
में जानजागृति और संप्रेषण माध्यम रूपी पत्रकारिता का उदय हुआ
था ।
अंग्रज़ों की स्वार्थपूर्ण शासन के दौर में ही भारतीय
भाषा पत्रकारिता की नींव भी पड़ी थी । जन चेतना का संघर्षपूर्ण
स्वर उभारने के लक्ष्य से ही पत्रकारिता का उदय हुआ ।
पत्रकारिता के उद्भव की स्थितियों एवं कारणों का वर्णन करते
हुए डॉ. लक्ष्मीकांत पांडेय ने लिखा है
– "पत्रकारिता
किसी भाषा एवं साहित्य की ऐसी इंद्रधनुषी विधा है,
जिसमें नाना रंगों का प्रयोग होने पर भी सामरस्य बना रहता है
। पत्रकारिता,
जहाँ एक ओर समाज के प्रत्येक स्पंदन की माप है,
वहीं विकृतियों की प्रस्तोता,
आदर्श एवं सुधार के लिए सहज उपचार । पत्रकारिता जहाँ किसी समाज
की जागृति का पर्याय है,
वहीं उसमें उठ रही ज्वालामुखियों का अविरल प्रवाह उसकी चेतना
का प्रतीक भी है । पत्रकारिता एक ओर वैचारिक चिंतन का विराट
फलक है,
तो दूसरी ओर भावाकुलता एवं मानवीय संवेदना का अनाविल स्रोत ।
पत्रकारिता जनता एवं सत्ता के मध्य यदि सेतु है तो सत्ता के
लिए अग्नि शिखा और जनता के लिए संजीवनी । अतः स्वाभाविक है कि
पत्रकारिता का उदय उन्हीं परिस्थितियों में होता है,
जब सत्ता एवं जनता के मध्य संवाद की स्थिति नहीं रहती या फिर
जब जनता अंधेरे में और सत्ता बहरेपन के अभिनय में लीन रहती है
।"
ईस्ट इंडिया कंपनी की दमननीति के विरुद्ध आवाज के रूप में
स्वाधीनता की प्रबल उमंग ने पत्रकारिता की नींव डाली थी । उसके
फलीभूत होने के साथ स्वदेशी भावना का अंकुर भी उगने लगा ।
कलकत्ता में भारतीय भाषा पत्रकारिता के उदय से इन भावनाओं को
उपयुक्त आधार मिला था । इस परंपरा में कलकत्ता के हिंदी
भाषियों के हृदय में भी पत्रकारिता की उमंगे उगने लगीं । अपनी
भाषा के प्रति अनुराग और जनजागृति लाने के महत्वकांक्षी पं.
जुगल किशोर शुक्ल के साहसपूर्ण आरंभिक प्रयासों से हिंदी
पत्रकारिता की नींव पड़ी । कलकत्ते के कोलू टोला नामक महल्ले
के
37
नंबर आमड़तल्ला गली से जुगल किशोर शुक्ल ने सन्
1826
ई. में उदंतमार्तंड नामक एर हिंदी साप्ताहिक पत्र निकालने का
आयोजन किया । यहाँ यह भी विवेचनीय बात है कि
'उदंत
मार्तंड'
से पहले भी हिंदी पत्रों के प्रकाशन होने के संदर्भ में कई
तर्क हैं । पर इन तमाम तर्कों के बावजूद प्रथम मौलिक हिंदी
पत्र के रूप में कई इतिहासकारों द्वारा
'उदंत
मार्तंड'
ही मान्य है ।
30
मई,
1826
हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में उल्लेखनीय तिथि है जिस दिन
सर्वथा मौलिक प्रथम हिंदी पत्र के रूप में
'उदंत
मार्तंड'
का उदय हुआ था । इसके संपादक और प्रकाशक भी कानपुर के जुगल
किशोर ही थे । साप्ताहिक
'उदंत
मार्तांड'
के मुख्य पृष्ठ पर शीर्षक के नीच जो संस्कृत की पंक्तियाँ छपी
रहती थीं उनमें प्रकाशकीय पावन लक्ष्य निहित था । पंक्तियाँ
यों थीं
–
"दिवा
कांत कांति विनाध्वांदमंतं
न चाप्नोति तद्वज्जागत्यज्ञ लोकः ।
समाचार सेवामृते ज्ञत्वमाप्तां
न शक्नोति तस्मात्करोनीति यत्नं ।।"
महत्वकांक्षा और ऊँचे आदर्श से पं. जुगल किशोर ने
'उदंत
मार्तंड'
का प्रकाशन आरंभ किया था,
पर सरकारी सहयोग के अभाव में,
ग्राहकों की कमी आदि प्रतिकूल परिस्थितियों में
4
दिसंबर,
1827
को ही लगबग डेढ़ साल की आयु में हिंदी का प्रथम पत्र का अंत
जिस संपादकीय उद्घोष के साथ समाप्त हुआ,
वह आज भी हिंदी पत्रकारिता के संघर्षपूर्ण अस्तित्व के
प्रतीकाक्षरों की पंक्तियों के रूप में उल्लेखनीय हैं–
"आज
दिवस लौं उग चुक्यौ मार्तंड उदंत ।
अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अंत ।।"
पं. जुगल किशोर शुक्ल ने अपनी आंतरिक व्यथा को समेट कर उक्त
पंक्तियों की अभिव्यक्ति दी थी। इसके बाद कई प्रयासों से
धीरे-धीरे हिंदी पत्रों का प्रकाशन-विकास होता रहा । इसी
परंपरा में जून,
1854
में कलकत्ते से ही श्याम सुंदर सेन नामक बंगाली सज्जन के
संपादन में हिंदी का प्रथम दैनिक पत्र प्रकाशित हुआ था । हिंदी
पत्रकारिता की जन्मभूमि होने का गौरव-चिह्न कलकत्ते के
मुकुटमणि के रूप में सदा प्रेरणा की आभा देते हुए हिंदी
पत्रकारिता के इतिहास में उल्लेखनीय है । कलकत्ता से बाहर
हिंदी प्रदेश से निकलनेवाला हिंदी पत्र
'बनारस
अख़बार'
था,
जिसका प्रकाशन
1845
ई. में काशी में आरंभ हुआ था । हिंदी पत्रकारिता पर
1857
के प्रथम स्वाधीनता-संग्राम का भी पर्याप्त प्रभाव पड़ा था ।
आरंभिक हिंदी पत्रकारिता के उन्नायकों के संदर्भ में डॉ. कृष्ण
बिहारी मिश्र के विचार महत्वपूर्ण एवं स्मरणीय हैं
– "स्मरणीय
है कि हिंदी-पत्रकारिता के आदि उन्नायकों का आदर्श बड़ा था,
किंतु साधन-शक्ति सीमित थी । वे नई सभ्यता के संपर्क में आ
चुके थे और अपने देश तथा समाज के लोगों को नवीनता से संपृक्त
करने की आकुल आकांक्षा रखते थे । उन्हें न तो सरकारी संरक्षण
और प्रोत्साहन प्राप्त था और न तो हिंदी-समाज का सक्रिय सहयोग
ही सुलभ था । प्रचार-प्रसार के साधन अविकसित थे । संपादक का
दायित्व ही बहुत बड़ा था क्योंकि प्रकाशन-संबंधी सभी दायित्व
उसी को वहन करना पड़ता था । हिंदी में अभी समाचारपत्रों के लिए
स्वागत भूमि नहीं तैयार हुई थी । इसलिए इन्हें हर क़दम पर
प्रतिकूलता से जूझना पड़ता था और प्रगति के प्रत्येक अगले चरण
पर अवरोध का मुक़ाबला करना पड़ता था । तथापि इनकी निष्ठा बड़ी
बलवती थी । साधनों की न्यूनता से इनकी निष्ठा सदैव अप्रभावित
रही । आर्थिक कठिनाइयों के कारण हिंदी के आदि पत्रकार पं. जुगल
किशोर शुक्ल ने
'उदंत
मार्तंड'
का प्रकाशन बंद कर दिया था किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि आर्थिक
कठिनाइयों ने उनकी निष्ठा को ही खंडित कर दिया था । यदि उनकी
निष्ठा टूट गई होती तो कदाचित् पुनः पत्र-प्रकाशन का साहस न
करते । हम जानते हैं कि पं. जुगल किशोर शुक्ल ने
1850
में पुनः
'सामदंत
मार्तंड'
नाम का एक पत्र प्रकाशित किया था । इस प्रकार हम देखते हैं कि
प्रतिकूल परिस्थिति से लड़ने का उनमें अदम्य उत्साह था । उस
युग के पत्रकारों की यह एक सामान्य विशेषता थी । युगीन-चेतना
के प्रति ये पत्र सचेत थे और हिंदी-समाज तथा युगीन अभिज्ञता के
बीच सेतु का काम कर रहे थे ।"
हिंदी पत्रकारिता के उद्भव और तत्पश्चात् के दिनों,
परिस्थितियों का विवेचन करने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि
हिंदी पत्रकारिता के लिए आरंभिक दिन उत्साहवर्धक न रहने के
बावजूद निष्ठावान पत्राकारों की श्रेष्ठ महत्वकांक्षा ने आगे
की पीढ़ी में दृढ़-चेतना जगाई । परिणामतः हिंदी पत्रकारिता का
विकास आरंभिक दिनों में भले ही मंद गति से हुआ और आगे के दिनों
में तीव्रगति से विकास भी सुनिश्चित हुआ । आज हिंदी पत्रकारिता
शिखर स्थिति में रहने के दावे पर आपत्ति होने पर भी यह
निर्विवाद बात है कि अद्यतन वैज्ञानिक उपलब्धियों के सहारे
उत्थान की सीढ़ियों पर वह ज़रूर अग्रसर है। कई हिंदी
पत्र-पत्रिकाएँ आज उपग्रहीय समाचार व्यवस्था से जुड़ी हैं और
कई हिंदी पत्रों के इंटर्नेट संस्करण भी आज उपलब्ध हैं । जहाँ
हिंदी समाचारपत्रों के वेब पोर्टलों के माध्यम से अद्यतन
समाचार पाठकों को सुलभ होते रहते हैं,
वहीं दूरदर्शन के विभिन्न चैनलों के माध्यम से सनसनीखेज खबरें
परोसी जाती हैं । आज हिंदी में भी कई ब्लॉग विकसित हुए हैं,
जिनमें से कुछ ब्लॉग समाचार माध्यमों के रूप में भी अपनी
भूमिका अदा करते हुए नागरिक पत्रकारिता के विकास की स्थिति को
दर्शान के साथ-साथ निश्चय ही यह साबित कर रहे हैं कि समाचार
प्रसारण की व्यवस्था की गति में अभूतपूर्व ढंग से विकास हुआ है
। अमरीका के किसी भी कोने में घटने वाली घटना वेबसाइटों में
दर्शन देना ही नहीं,
भारत के भी कई छोटे शहरों या गाँवों में घटनेवाली घटनाओं की
खबरें भी हमें टी.वी. चैनलों के माध्यम से मिनटों में मिलना
इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है । हिंदी पत्रकारिता,
हिंदी वेबसाइट या हिंदी चैनल भी ऐसी ही गति से आगे बढ़ रही हैं
। निष्कर्षतः यही कहा जा सकता है कि हिंदी पत्रकारिता अपने
उद्भव काल से ही गतिशील चेतना की स्वामी बनकर प्रगति-पथ पर आगे
बढ़ती रही है ।
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डॉ. सी. जय
शंकर बाबु
संपादक,
'युग
मानस',
18/795/एफ़/8-ए,
तिलक नगर,
गुंतकल (आ.प्र.)-515
801
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