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धारावाहिक-4
दक्षिण
भारत की हिंदी पत्रकारिता
डॉ. सी. जय शंकर बाबु
यह
युवा और लगनशील साहित्यकार डॉ. सी. जयशंकर बाबू की शोधवृत्ति
का ही परिणाम है कि दक्षिण में हिंदी पत्रकारिता ने जो दिशा तय
की उसका सम्यक मूल्याँकन संभव हो सका । श्री बाबु के इस कठिन
और चुनौती भरे उद्यम से पूर्व में किये गये शोधों, रचे गये
ग्रंथों की मान्यताओं को नया विस्तार मिला है । यह अब तक का
सबसे महत्वपूर्ण और विश्वसनीय शोध कृत्ति इसलिए भी कहा जाना
चाहिए क्योंकि अब से पहले लिखे गये किताबों में जाने-अनजाने कई
हिंदी सेवियों की पत्रकारिता तक पहुँच संभव न हो
सका था । कृति दक्षिण की हिंदी पत्रकारिता के
नये और चौंकाने वाले तथ्यों का प्रामाणिक दस्तावेज है कि
दक्षिण की हिंदी भक्ति कहीं भी उत्तर भारत से कम नहीं ।
दक्षिणवासी होकर भी डॉ. बाबु युगमानस जैसी हिंदी लघु-पत्रिका
के संपादक के रूप में हिंदी और दक्षिण भारतीय भाषाओं के एक
युवा सेतु के रूप में चर्चित हैं । उनका यह शोध कार्य वैश्विक
स्तर पर सभी पाठकों के लिए पहली बार सृजनगाथा में धारावाहिक
प्रकाशित की
जा रही है । पिछले अंक में आपने पढ़ा -
भाग-1,
2
तथा
3 । अब लीजिए चौंथी
क़िश्त - संपादक
1.1.7.
सांस्कृतिक उत्थान में पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका
आमतौर पर पत्र-पत्रिकाएँ जनता को अपने प्रदेश विशेष की
संस्कृति से जोड़कर रखती हैं । अपनी ज़मीन से लगाव और अपनेपन
को बचाए रखने में पत्रकारिता की अहम भूमिका होती है ।
पत्रकारिता जीवन-संस्कृति का पर्याय है । पत्र-पत्रिकाएँ जीवित
संस्कृति के दर्पण होते हैं । मानवीय संस्कृति की रक्षा ही
नहीं उसके संवर्धन और संस्कार में भी पत्रकारिता की विशिष्ट
भूमिका होती है । विश्व के जन-जीवन के जीवंत दृश्य प्रस्तुत
करते हुए आदर्श संस्कृति का उदाहरण प्रस्तुत करती है । वह जनता
को शिक्षित करती है,
किंतु उनके आत्मचिंतन को नष्ट नहीं करती है ।
पत्र-पत्रिकाएँ सांस्कृतिक मूल्यों को जीवित रखते हुए उन्हें
विरासत के रूप में अगली पीढ़ी तक पहुँचाने में भी अहम् भूमिका
निभाती हैं । कुछ विद्वानों ने पत्रकारिता को
'सांस्कृतिक
प्रहरी'
की संज्ञा भी दी हैं । युगों से भारत की उत्कृष्ट संस्कृति
एवं सभ्यता की एक समृद्ध परंपरा रही है । सांस्कृतिक प्रहरी के
रूप में सहज ही भारतीय पत्रकारिता का यह कार्य हो जाता है कि
वह हमारी परंपरा की रक्षा के साथ-साथ मानवीय मूल्यों का विकास
एवं संवर्धन करें । समाज में व्याप्त अंध विश्वासों,
जाति-संप्रदाय,
भाषा भेद,
असमानता,
अन्याय,
शोषण,
आतंक,
भ्रष्टाचार जैसी विसंगतियों एवं विडंबनापूर्ण परिस्थितियों में
उत्कृष्ट मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में कार्य करना पत्रकारिता
के लिए एक चुनौती भी है ।
जैसे कि उल्लेख किया जा चुका है कि पत्र-पत्रिकाएँ एक दर्पण के
समान जन-जीवन को प्रतिबिंबित करती हैं,
जन चेतना को उत्पन्न करती हैं । देश-काल-परिस्थितियों के
अनुसार अनुकूल जीवन के लिए दिशा निर्देशन भी करती हैं ।
पत्र-पत्रिकाएँ संत-महात्माओं की भाँति देश के कोने-कोने तक
पहुँचकर जनता को जागृत करती हैं । पराधीनता के युग में देश की
जनता में स्वतंत्रता की इच्छा जगाकर स्वाधीनता के लिए संघर्ष
करने की प्रेरणा और आवश्यक शक्ति भारतीय पत्रकारिता ने दी थी ।
तत्कालीन पत्रकारिता ने स्वाधीन संस्कृति की आवाज बुलंद करके
भारतीय जन चेतना को सफलता दिलायी । औपनिवेशिक शासकों द्वारा
भारतीय नागरिकों को ग़ुलाम बनाकर,
उन्हें अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करते दिनों में राष्ट्रीय
चेतना और जागृति का मूलमंत्र बनकर भारतीय पत्रकारिता ने
राष्ट्रीय संस्कृति की रक्षा की है ।
पत्र-पत्रिकाओं के द्वारा सिर्फ़ सूचनाओं का प्रसार ही नहीं
होता,
बल्कि लोक शिक्षण का कार्य भी होता है । पत्र-पत्रिकाएँ जनता
को शिक्षित और सुसंस्कृत करने के सक्षम साधन हैं । श्री
अंबिका प्रसाद वाजपेयी ने समाचारपत्रों को
'लोक
गुरु'
की संज्ञा देने के पक्ष में लिखा है
– "समाचारपत्र
सिर्फ़ खबरें ही नहीं देता है,
उसका महत्व बताता है और लोगों को शिक्षित करता है । इसलिए उसे
'लोक
गुरु'
कहा गया है । यह कार्य वह दो प्रकार से करता है
–
जन साधारण को उसके कर्तव्य का बोध कराकर और शासक वर्ग को
समय-समय पर चेतावनी देकर अथवा उसकी पीठ ठोककर,
जिस हद तक समाचार-पत्र निर्भीकता और प्रबुद्धता से यह कार्य कर
पाता है,
वह लोक गुरू की भूमिका अदा करता है ।"
स्वाधीनता प्राप्ति के बाद भारतवासियों ने लोकतांत्रिक शासन
प्रणाली के प्रति आस्था दर्शायी है,
तदनुरूप ही भारत में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली कायम है ।
पत्रकारिता को लोकतंत्र के आधार स्तंभ के रूप में मान्यता
प्राप्त है । लोकतंत्र महज राजनीतिक शासनतंत्र का मूलभूत
सिद्धांत नहीं है,
भारतीय संस्कृति एवं जीनवमूल्यों का पर्याय है । लोकतांत्रिक
शासन प्रणाली के परिप्रेक्ष्य में सांस्कृतिक चेतना जगाने में
पत्रकारिता की भूमिका के संदर्भ में डॉ. नारायणदत्त पालीवाल ने
लिखा है - "पत्रकारिता जहाँ सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना के
लिए ऊर्जा-केंद्र का काम करती है,
वहीं किसी समाज और राष्ट्र की नवीन सोच के लिए प्रकाश-पुंज भी
है । बशर्ते कि उसकी दिशा ठीक हो,
उसका आधार स्वस्थ हो और उसका लक्ष्य सही हो ।...लोकतंत्र के
लिए समाचार-पत्रों का बहुत महत्व इसलिए है कि आम नागरिकों में
नई चेतना का संचार करने,
परिस्थितियों के अनुकूल दिशा-बोध कराने तथा नव-जागरण,
नव-निर्माण और सृजनशीलता की ओर अग्रसर कराने में इनकी भूमिका
अहम होती है । भाषा,
साहित्य,
समाज की सेवा के साथ-साथ पत्र-पत्रिकाएँ जनमानस को नए संस्कार
दे सकती हैं । संस्कारों से संस्कृति का विकास होता है । इसी
सांस्कृतिक पुनर्जागरण से हम अपने खोए हुए अतीत के गौरव की
रक्षा करने में सक्षम होंगे । सामाजिक,
आर्थिक और राजनीतिक मज़बूती के साथ सांस्कृतिक चेतना के
उज्ज्वल प्रकाश में जन-साधरण की उन्नति का यही मार्ग है ।"
इस प्रकार पत्र-पत्रिकाएँ वैचारिकता के मूल को सींचकर जन
भावनाओं को परिष्कृत करती हैं तथा जन-जीवन को एक नया मोड़ देती
हैं । विचारों के प्रसार के द्वारा ही सांस्कृतिक पुनर्जीवन की
संकल्पना साकार होती है । पत्रकारिता इस दिशा में उपयोगी साधन
है ।
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