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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-27, अगस्त, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। पुस्तकायन ।।

 

 

एक डिजायनर ने जो सीखा अपनी ज़िंदगी में


डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

 

 ऑस्ट्रियन डिज़ाइनर और ग्राफ़िक आर्टिस्ट श्टेफन सेग्माइस्टर की ख्याति का थोडा-सा अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें डिज़ाइन की दुनिया का गॉड (खुदा) कहा जाता है। उनकी ख्याति उनकी रचनाशीलता के साथ-साथ दानशीलता और विनम्रता के लिए भी उतनी ही है। हाल ही में इन्हीं श्टेफन की एक नई क़िताब आई है थिंग्ज़ आई हेव लर्न-ड इन माई लाइफ सो फार। अपनी प्रस्तुति में विलक्षण होने के साथ ही यह क़िताब इस महान कलाकार के मनोजगत में झाँकने का एक विरल अवसर प्रदान करती है।

 

इस क़िताब की जन्म-कथा भी दिलचस्प है। हुआ यह कि इस विलक्षण और अति व्यस्त डिज़ाइनर ने वर्ष 2000 में अपने काम से एक साल का अवकाश लिया। मक़सद यह तलाश करना था कि वे अपनी अभिव्यक्ति को और सक्षम कैसे बना सकते हैं। मैंने सोचा कि क्यों न फ़िल्म निर्माण में हाथ आजमाया जाए। फिर लगा कि मुझे उसी भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए जिसे मैं जानता हूँ, और वह भाषा है डिज़ाइन की भाषा। इसी अवकाश–काल में श्टेफन नियमित रूप से रोज़ डायरी भी लिखने लगे। कुछ दिनों बाद ही अपनी लिखी प्रविष्टियाँ पढते हुए श्टेफन को लगा कि यह तो कुछ ऐसा है जिसे औरों से भी साझा किया जा सकता है। इसी सोच की परिणति है यह क़िताब। वैसे, श्टेफन ने इस क़िताब के साथ ही इसी शीर्षक से एक विशाल प्रदर्शनी भी आयोजित की है जहाँ उन्होंने अपने कुछ सहयोगियों के साथ इस क़िताब में शामिल सूक्तियों को कलाकृतियों के रूप में प्रदर्शित किया है।

 

श्टेफन की इस क़िताब में ये बीस सूक्तियाँ हैं :

1.औरों की मदद करके मैं ख़ुद की मदद करता हूँ।

2.हिम्मत ने हमेशा मेरा साथ दिया है।

3. यह सोचना मूर्खतापूर्ण है कि भावी जीवन सुखद होगा। मुझे तो वर्तमान में जीना है।

4. सहायता समूह को संगठित करना आश्चर्यजनक रूप से सुगम है।

5. मिथ्याचरण सदा मेरे प्रतिकूल रहा है।

6. मैं जो भी करता हूँ, उसका प्रतिफल मुझे ज़रूर मिलता है।

7. कल्पना करना बेहद मुश्किल है।

8. ड्रग्ज़ शुरू में तो अच्छी लगती हैं लेकिन फिर वे आप पर सवार हो जाती हैं।

9. वक़्त बीतने के साथ मैं हर बात का आदी होता चला गया, और फिर उनकी उपेक्षा करने लगा।

10. धन मुझे सुखी नहीं बनाता।

11. मेरे सपनों का कोई अर्थ नहीं है।

12. डायरी रखने से वैयक्तिक विकास में सहायता मिलती है।

13. अच्छा दीखने का प्रयास मेरी ज़िदगी को सीमित करता है।

14. भौतिक विलासिताओं का उपयोग अल्प मात्रा में ही किया जाना चाहिए।

15. चिंता करने से कोई समस्या हल नहीं होती।

16. शिकायत करना बेवकूफ़ी है। या तो कुछ करो या फिर भूल जाओ।

17. हरेक यही सोचता है कि वह सही है।

18. अगर मुझे व्यावसायिक रूप से किसी नई दिशा की तलाश है तो बेहतर होगा कि पहले मैं ख़ुद ही उसे आजमा कर देखूँ।

19. कम अपेक्षाएँ रखना उम्दा रणनीति है।

20. हर ईमानदार दिलचस्प होता है।

 

इस क़िताब को मैंने विलक्षण इसलिए कहा कि यह पारम्परिक अर्थ में क़िताब है ही नहीं। बेहतर तो यह होगा कि इसे क़िताब न कहकर कलाकृति कहा जाए। एक बक्सा और उसमें रखे कुछ पैम्फलेट। कोई ज़िल्दबन्द क़िताब नहीं जिसे कवर-टू-कवर पढा जाए। इन पैम्फलेट्स में इस क़िताब, इन सूक्तियों और सूक्तियों पर आधारित कलाकृतियों की सृजन गाथा अंकित है। मसलन सूक्ति क्रमांक 9 के बारे में यह बताया गया है कि न्यूयॉर्क में श्टेफन एक खिडकी में बैठे थे, उन्होंने अपने पांव बाहर लटका रखे थे। लोगों ने सोचा कि वे कूदने वाले हैं। पुलिस बुला ली गई और श्टेफन जैसे-तैसे अपनी जान बचाकर भाग निकले। इसी तरह वे चौथी सूक्ति के लिए बताते हैं कि कैसे उन्होंने कुछ बेघरबार लोगों को महीने में दो बार राशन सामग्री सुलभ कराने का अभियान सफलतापूर्वक चलाया।

 

यह कलाकृति, या क़िताब, आप इसे जो भी नाम दें, उन सब बातों पर एक बार फिर से हमारा ध्यान खींचती हैं जो हमें अपने जीवन में महत्वपूर्ण लगती हैं। हो सकता है इनमें से कुछ बातों से हममें से कुछेक की असहमति हो, लेकिन ये बातें अंतत: सोच का एक प्रस्थान बिन्दु तो बनती ही हैं। इतना भी कम नहीं है।

 

डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

ई-2/211, चित्रकूट

जयपुर, राजस्थान - 302021 -

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पुस्तक

Things I have Learned in My Life So Far

लेखक

Stefan Sagmeister, Daniel Nettle, Steven Heller, Nancy Spectar

पृष्ठ

248

 

मूल्य

24 डॉलर

 

समीक्षक

डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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