|
अनुभव जगत की बुनावट
गिरीश्वर मिश्र
'रहिमन
पानी राखिए’
आदरणीय पंडित विद्यानिवास मिश्र की उन रचनाओं का संकलन है जो
उनकी पूर्व प्रकाशित कृतियों में उपलब्ध नहीं हैं। पंडित जी
जीवन और साहित्य की
व्यस्तताओं में इन्हें स्वयं व्यवस्थित कर पाठकों तक पहुँचाने
के पहले ही हम सब से
विदा ले लिए। सब कुछ अकल्पनीय ढंग से हुआ। जीवन की आपाधापी अंत
तक बनी रही और इस
क्रम में उनकी भौतिक शरीर यात्रा अनंत की यात्रा में तब्दील हो
गई पर उनकी जीवंतता
सदैव उनके साथ बनी रही। उनकी अनेक रचनाएँ अभी तक अप्रकाशित
हैं। उन्हें प्रस्तुत
करने के प्रयास में यह प्रथम कड़ी है।
पंडित जी की रुचि बहुआयामी थी और
उसमें जीवन रस को अपनी समग्रता में,
गहने और थहाने की तीव्र आकांक्षा थी। उनकी
रचनाओं में एक सहृदय,
रसिक यात्रा तत्त्व विश्लेषक संस्कृतिविद की संश्लिष्ट छवि
उभरती है। जीवन के निकट जाना,
उसमें डूबना उतराना और अपने साथ अपने पाठकों और
श्रोताओं को उसका रख चखाना श्रुति की वाचिक पंरपरा का स्मरण
दिलाता है। रस का संचार
और संवाद ही उनका प्रमुख संबोध्य है। उनकी इस छवि की यहाँ
पुष्टि होती
है।
इस संग्रह की रचनाओं को पाँच शीर्षकों में रखा गया है। ये
शीर्षक पंडित
जी की पूर्व प्रकाशित रचनाओं से लिए गए हैं और उन्हें
व्यवस्थित करने का आधार उनमें
निहित भाव और विषय हैं। व्यक्ति व्यंजना में उनके वे निबंध हैं
जो भारतीय संस्कृति
को पहिचनवाते हुए वे अपनी और अपने राम की स्मृति भी ताजी करते
हैं। अतीत,
वर्तमान
और अनागत भविष्य के बीच हमारी अपनी पहचान किस तरह बनती बिगड़ती
है,
उसके सामने क्या
चुनौतियाँ हैं ऐसे प्रश्नों से हमारा सामना होता है। इनमें
हमारे खोने,
पाने,
बनने
और बिगड़ने और संगति-विसंगति इन सबका विश्लेषण सहज भाव से किया
गया
है।
‘चिड़िया
रैन बसेरा’
में पंडित जी के संस्मरण है। गाँव,
घर,
शहर,
देश,
विदेश में विभिन्न स्थितियों में रहते हुए पंडित जी के अनुभव
विशिष्ट देशकाल की छवि
उकेरते हैं। इन संस्मरणों के साथ विचरते हुए हमें एक काल के
सांस्कृतिक इतिहास की
झलक मिलती है। शहरों का अपना व्यक्तित्व होता है जो वहाँ रहना
वालों की तासीर और
वहाँ के माहौल से बनता है। उनमें घुल मिलकर आदमी नई रंगत पाता
है। घर बाहर व्यक्ति
और समय के तालमेल से हमारे अनुभव जगत की बुनावट होती हैं।
मानवीय रिश्तों
की गर्माहट कैसे-कैसे रूप धरती है और हमारा परिवेश उन्हें किस
साँचे में ढाँलता है
इसकी व्याख्या करते हुए जीवन के खट्टे-मीठे सभी रूप पंडित जी
को अपनी ओर खींचते
हैं। इस भाग का अंतिम लेख बड़ा ही मार्मिक है।
‘ओझल
होता साहचर्य’
संगिनी के विछोह
में प्रीति का उद्रेक है। भावों से सराबोर यह लेख निजी पीड़ा
को एक व्यापक मानवीय
फलक पर रख कर उपस्थित करता है। पंडितजी का आत्म मंथन निजता के
स्वर में आज के समय
की,
विशेषतः टूटते बिखरते समाज की विडंबना को रूपायित करता है। इसे
पढ़कर साहचर्य
परस्पर साकांक्ष जुड़ाव और मानवीय चेतना के लिए उसका उद्दाम
आकर्षण और अकेले होते,
सबसे कटते और टूटते आदमी की,
उसकी असहायता की,
संबंधों की विषमता का तीखा अहसास
होता है।
पंडित जी की यात्रा अनवरत चलती थी। शायद अस्मिता की तलाश और
उसे
पहचानने की उत्कट जिजीविषा उन्हें यात्राओं पर ले जाती थी।
यात्राओं से जुड़े अगले
खंड़ में यात्रा वृत्तांत हैं जो हमें लेखक के साथ भावात्मक
यात्रा पर ले जाते हैं।
उनमें घटनाएँ,
मानव स्वभाव परिस्थिति,
प्रकृति आदि में रमते पंडित जी आम
आदमी की साधारण जिंदगी की जद्दोजहद से लेकर अध्यात्म के शिखर
तक ले जाते हैं। अपने
साथ बाँध कर वे एक तरल प्रवाह का अंग बना हमारे अस्तित्व के
अनेक पक्षों का स्पर्श
करते हैं। चौथा खंड साहित्य और समाज की उन विभूतियों के लिए
स्मरणांजलि है जो पंडित
जी के प्रेरक रहे,
सहचर रहे और जिनके संस्पर्श से उनके कार्य क्षेत्र,
निष्ठा और
सरोकारों का रूप बना और निखरा। पंडित जी का स्वर इन सबके प्रति
कृतज्ञता का है।
स्नेह संबंधों में रचे-बसे ये संस्मरण संबंधों की ऊष्मा और
भावों की उच्छल तंरगों
से अनुप्राणित हैं। पंडित जी की संश्लिष्ट बनावट का रहस्य
कदाचित इन्हीं प्रभावों
में निहित है।
संग्रह के अंतिम भाग में आज की सामाजिक सांस्कृतिक परिस्थिति
पर व्यंग्यात्मक रचनाएँ हैं। पंडित जी की पैनी निगाह आज की
विसंगतियों की गहरी
पैमाइश करती है और सोचने के लिए झकझोरती है।
कुल मिलाकर यह संग्रह पंडित जी
के कई रूपों को एक साथ उकेरता है।
2
गिरीश्वर मिश्र
◙◙◙
|