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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-27, अगस्त, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। पुस्तकायन ।।

 

 

तथ्यों और संदर्भों की कसौटी


दीपशिखा हर्ष

 

भारतीय समाज में वर्ण एवं जाति व्यवस्था के विकल्प की तलाश में रोशनी की तरह है यह कृति । वर्ण और जातिविहीन समाज व्यवस्था के विकास को समझाने में लेखक की दृष्टि और माध्यम बहुत गहरे और तार्किक जान पड़ते हैं । पुस्तक में गौतम बुद्ध से लेकर डॉ अंबेडकर तक बीते ढाई हजार वर्षों में भारत में वर्ण-जाति व्यवस्था के विकल्प तलाशने के प्रयासों की समीक्षा है ।

 

परंपरागत समाज व्यवस्था का कोई नया विकल्प प्रतिपादित करने की मंशा लेखक की कतई नहीं है, लेकिन वे उसके दुष्परिणामों को और साथ ही संविधान के माध्यम से जिस सामाजिक ढ़ाचे का विकल्प रेखांकित व क्रियान्वित किया गया था, उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट जरूर करना चाहतहैं । भारत में परंपरागत समाज व्यवस्था जिसे वर्ण व्यवस्था के नाम से जाना जाता है, जब से सुदृढ़ीकृत हुई है, तभी से इसका विरोध शुरू हो गया था और निरन्तर जारी भी है । करीब ढ़ाई हजार वर्ष पूर्व महावीर एवं बुद्ध ने इसका प्रतिषेध किया था । मध्यकाल में संतों विशेषरूप से रविदास, कबीर व नानक ने इसका विरोध किया । आधुनिक काल में भी इसके विरूद्ध संघर्ष में फुले और अंबेडकर के नाम विशेष हैं । इन प्रयासों के फलस्वरूप स्वतंत्र भारत में भारतीयों को जब अपना सामाजिक आर्थिक व राजनैतिक प्रारूप चुनने का अधिकार मिला तो उन्होंने संविधान के माध्यम से एक नए सामाजिक-आर्थिक व वर्ग व्यवस्था, मिश्रित अर्थवयवस्था एवं लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था से लैस राजनैतिक प्रारूप को अपनाया । उन कारण विशेष पर भी लेखक ने ध्यान आकृष्ट किया है जिनकी वजह से विगत ढाई-तीन हजार वर्षों के सतत प्रयासों के बावजूद कतिपय अपवादों को छोड़कर वर्णव्यवस्था का कोई स्थायी विकल्प प्रयोग में नहीं लाया जा सका । यथास्थितिवाद के पक्ष पोषक और उनके निहित उद्देश्यों पर भी सवाल खड़े किए हैं पुस्तक ने ।

 

भारत का संविधान हमें स्वयं, समूह, समुदाय, समाज और इससे भी अधिक देश और दुनिया में विस्तारित और विकसित होने का विकल्प और अधिकार प्रदान करता है, लेकिन आज हम सिर्फ ''स्व'' पर ही केन्द्रित होकर विकसित होना चाहते हैं, क्या यह स्थिति एक सशक्त और समृद्ध लोकतंत्र के सपने को साकार कर पायेगी? वर्ण और जाति व्यवस्था के संबंध में भी कुछ ऐसा ही सोचने पर विवश करती है यह पुस्तक पाठकों को । रामगोपाल सिंह बड़ी ही सौम्यता और शालीनता से वर्ण और जाति जैसे ज्वलंत और राजनीति के मूल्यवान घटक के स्थान पर लोकतंत्र की स्थापना की घोषणा करने में सफल रहे हैं अपनी कृति में ।

 

ढाई हजार वर्ष से लेकर अबतक के कालखंड को वर्ण और जाति व्यवस्था के संदर्भों में खंगालना उनकी व्यापक दृष्टि और गहन शोध का परिचायक है । भारतीय सामाजिक संरचना और उसकी विसंगतियों का बहुत बारिकी से लेखक ने विश्लेषण किया है । लेखक जहां कहीं पुस्तक में विषय की पीड़ा से गुजरते हैं, वहीं उनके भीतर का कवि कुछ गुनगुनाने को आतुर हो उठता है । लेखक ने जाति से परे ज्ञान और क्रिया के संतुलित और समन्विरूप को ही विकास का आधार निरूपित किया है । साथ ही उनको यह विश्वास है कि जैसे-जैसे लोकतांत्रिकी, वैचारिकी, लौकिक विधान तथा उद्योग एवं ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था समाज में मजबूत होती जायेगी, वैसे-वैसे वर्ण-जाति व्यवस्था कमजोर होती जायेगी । बहरहाल, वर्ण-जाति व्यवस्था के चलते हिन्दू समाज अनेक उतार-चढ़ाव के दौर से गुजरा । भिन्न-भिन्न कालखंडों में व्यवस्था विशेष को लेकर विरोध और संघर्ष के स्वर भी फूटे । फलस्वरूप सुधार और सुविधाओं के प्रावधान भी हुए । लेकिन यहा यह व्यवस्था किसी एक व्यक्ति से संबंधित नहीं, बल्कि पूरे समुदाय और समाज से संबंध रखती है । स्वाधीनता उपरांत जाति व्यवस्था के विनाश का मार्ग तो प्रशस्त हुआ, लेकिन वह अभी भी अस्तित्व में है । जाति व्यवस्था नष्ट होकर लोकतंत्र ही अंततोगत्वा मजबूत होगा, ऐसे विकल्प की संभावना को तथ्यों और संदर्भों की कसौटी पर तार्किक और विश्लेषणात्मक रूप से प्रस्तुत करने का साहस भी लेखक ने कर दिखाया है ।

 2 दीपशिखा हर्ष

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पुस्तक

विकल्प की तलाश

(बुद्ध से अंबेडेकर तक)

लेखक

डॉ. रामगोपाल सिंह

पृष्ठ

264

 

मूल्य

450 रुपए

प्रकाशक

नेशनल पब्लिशिंग हाऊस, दिल्ली

समीक्षक

दीपशिखा हर्ष

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

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