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हिंदी ऐतिहासिक उपन्यासों
की उपलब्धियाँ
नरेन्द्र कोहली
इतिहास,
ऐतिहासिक उपन्यास, ऐतिहासिक रोमांस और इतिहासाभासिक कृतियों का
अंतर हम समझते हैं;
किंतु ऐतिहासिक उपन्यास का लक्ष्य क्या है
?
क्या उसका लक्ष्य उपन्यास से कुछ भिन्न हो सकता है
?
मैं समझता हूँ कि ऐतिहासिक उपन्यास की सृजन प्रक्रिया भिन्न हो
सकती है,
भिन्न है भी;
किंतु उसका लक्ष्य न उपन्यास से भिन्न हो सकता है,
न समग्र साहित्य से। सृजन प्रक्रिया की भिन्नता के विषय में
काव्यशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों को विचार करना चाहिए।
आख़िर क्या कारण था कि एक ही काल में,
एक ही नगर में प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद अपने-अपने ढंग से
अलग-अलग प्रकार की रचनाएँ रच रहे थे। नंददुलारे वाजपेयी यह
आरोप लगा रहे थे कि आज जो कुछ आप समाचारपत्र में पढ़ते हैं,
कल उसे ही आप प्रेमचंद की कहानियों में पढ़ सकते हैं। उधर
प्रेमचंद कह रहे थे कि जयशंकर प्रसाद गड़े मुर्दे उखाड़ रहे थे।
वैसे तो किसी भी कालखंड विशेष का चित्रण ऐतिहासिक उपन्यास हो
सकता है। रंगभूमि,
बूंद और समुद्र,
झूठा सच,
और उत्तरकथा भी अपने युग का प्रामाणिक चित्रण करने के कारण,
ऐतिहासिक उपन्यास हो सकते हैं;
किंतु ऐतिहासिक उपन्यास होने के लिए एक अनिवार्य शर्त है -
उसकी कथा का प्रख्यात् होना,
पाठकों का उससे पूर्व-परिचित होना।
दूसरी ओर हम अपनी पुराकथाओं को भी अपना प्राचीन इतिहास ही
मानते हैं;
किंतु विद्वानों का एक वर्ग विदेशी सिद्धांतों के अनुसार उसे
'मिथ' अथवा 'मिथ्या' ही मानना चाहता है। अत: वह उसे अपना
इतिहास नहीं मानता। परिणामत: पौराणिक उपन्यासों की,
ऐतिहासिक उपन्यासों से एक पृथक् श्रेणी बन गई है। पुराकथाओं को
अपना इतिहास मानते हुए भी मैं चाहूँगा कि पौराणिक उपन्यासों का
वर्ग ऐतिहासिक उपन्यसों से पृथक् ही रहे। कारण
?
पौराणिक उपन्यास केवल एक काल विशेष की घटनाएँ ही नहीं हैं,
उनकी अपनी एक मूल्य-व्यवस्था है। वे उपनिषदों के मूल्यों को
चरित्रों के माध्यम से उपन्यास के रूप में प्रस्तुत कर रहे
हैं। जो उपन्यास पौराणिक काल,
घटनाओं और चरित्रों पर आधृत तो हैं,
किंतु उस मूल्य-व्यवस्था का अनुमोदन नहीं करते,
उन्हें पौराणिक उपन्यास कहना उचित नहीं है। उनमें से अधिकांश
तो पौराणिक मूल्य-व्यवस्था से अपरिचित अथवा उनके विरोधी लोगों
द्वारा उन्हें ध्वस्त करने के लिए ही लिखे गए हैं। इसप्रकार
ऐतिहासिक उपन्यासों का क्षेत्र
बहुत विस्तृत है। परिणामत: विभिन्न मान्यताओं,
रुचियों और विचारधाराओं के अनुसार ऐतिहासिक उपन्यास और
ऐतिहासिक उपन्यासकारों की गणना और आकलन होते रहते हैं।
प्रेमचंदपूर्व और प्रेमचंद की ऐतिहासिक और जीवनीपरक कथाएँ समाज
को अपना गौरव और शौर्य स्मरण कराने में सफल हुई थीं। किंतु
उनका जीवन दीर्घकालीन नहीं हुआ। प्रेमचंद रचित 'हरिसिंह नलवा'
आज कितने लोगों को स्मरण है
?
उनका बस ऐतिहासिक महत्व ही रह गया है।
वृंदावनलाल वर्मा के अपने वक्तव्यों के अनुसार उनके ऐतिहासिक
उपन्यास लिखने के कुछ सामान्य तथा कुछ विशेष कारण हैं।
उन्होंने स्वीकार किया है कि सर वाल्टर स्कॉट के अँगरेज़ी
उपन्यास पढ़ कर उनके मन में यह बात आई थी कि वे भारत के सम्मान
की प्रतिष्ठा के लिए भारत के इतिहास के गौरवपूर्ण पृष्ठों को
लेकर वैसे ही उपन्यास लिखेंगे। इस सामान्य कारण के साथ-साथ एक
विशेष कारण देते हुए उन्होंने एक घटना की चर्चा की है।
बुंदेलखंड में बसे एक पंजाबी परिवार के यहाँ एक विवाह के अवसर
पर वर्मा जी भी आमंत्रित थे। वहाँ उस पंजाबी परिवार के अनेक
सगे संबंधी और परिचित भी उपस्थित थे। उन लोगों के मध्य होने
वाला वार्तालाप वर्मा जी ने भी सुना,
जिसमें वे लोग बुंदेलखंड की निर्धनता,
पिछड़ेपन तथा अशिक्षा के विषय में अपमानजनक ढंग से चर्चा कर रहे
थे; और इस क्षेत्र तथा वहाँ के निवासियों के प्रति अपनी घृणा
व्यक्त कर रहे थे। वर्मा जी ने स्वीकार किया है कि यह सब
उन्हें अत्यंत अपमानजनक लगा और उन्होंने वहीं संकल्प किया कि
वे बुंदेलखंड के गौरव को प्रतिष्ठित करने के लिए उपन्यास
लिखेंगे।
उन्होंने अपनी क्षमतानुसार अपने अभीप्सित काल के इतिहास की
छानबीन की,
अपने कथ्य के लिए प्रमाण जुटाए;
और थोड़े बहुत ऐतिहासिक रोमांस की सृष्टि भी की। यद्यपि उनका
क्षेत्र केवल बुंदेलखंड तक ही सीमित है;
किंतु हम जानते हैं कि अपनी धरती से प्रेम करने वाला लेखक अपनी
संस्कृति से भी प्रेम करता है। वस्तुत: इतिहास और भूगोल ही तो
संस्कृति का निर्माण करते हैं। उन्होंने 'विराटा की पद्मिनी'
और 'गढ़ कुंडार'
जैसे ऐतिहासिक रोमांस और 'झाँसी की रानी'
जैसा इतिहास-बोझिल उपन्यास भी लिखा;
किंतु 'मृगनयनी'
जैसे संतुलित उपन्यास भी आए। उनका दृष्टिकोण अत्यंत स्पष्ट है।
लेखक अपने समय से मुक्त नहीं होता। वृंदावनललाल वर्मा के पास
अपना कथ्य है। वे अपनी लेखनी से एक युद्ध कर रहे हैं। उनका
लेखन एक संघर्ष है। वे देश का सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुत करने का
प्रयत्न कर रहे हैं;
और अपने समाज का मनोबल भी बढ़ा रहे हैं।
स्वामी विवेकानन्द ने परिव्राजक के रूप में भारत का भ्रमण करते
हुए,
अलवर में अपने शिष्यों से कहा था कि आज तक भारत का इतिहास
विदेशियों ने ही लिखा है। भारत का इतिहास अव्यवस्थित है। उसमें
कालक्रम परिशुद्ध और यथार्थ नहीं है। अँगरेज़ों तथा अन्य
विदेशियों द्वारा लिखा गया इतिहास हमारे मनोबल को तोड़ने के लिए
ही है। वह हमें दुर्बल ही बनाएगा। वे हमें हमारे दोष ही बताते
हैं। जो विदेशी,
हमारे तौर-तरीक़े,
रीति-रिवाज,
हमारे धर्म और दर्शन को बहुत कम समझते हैं,
वे हमारा वास्तविक और पूर्वाग्रहरहित इतिहास कैसे लिख सकते हैं
?
इसीलिए उसमें अनेक भ्रांतियाँ घर कर गई हैं। अब यह हमारे लिए
है कि हम अपना स्वतंत्र मार्ग खोजें। अपने प्राचीन ग्रंथों का
अध्ययन करें,
शोध करें;
और परिशुद्ध,
यथार्थ, सहानुभूतिपूर्ण तथा आत्मा को उद्दीप्त कर देने वाला
इतिहास लिखें।
आचार्य चतुरसेन शास्त्री के भी अपने लेखन के संबंध में कुछ ऐसे
ही वक्तव्य मिल जाते हैं। 'सोमनाथ'
के विषय में उन्होंने लिखा है कि कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के
उपन्यास 'जय सोमनाथ'
को पढ़ कर उनके मन में आकांक्षा जागी कि वे मुंशी के नहले पर
अपना दहला मारें;
और उन्होंने अपने उपन्यास 'सोमनाथ'
की रचना की। 'वयंरक्षाम:'
की भूमिका में उन्होंने स्वीकार किया है कि उन्होंने कुछ नवीन
तथ्यों की खोज की है,
जिन्हें वे पाठक के मुँह पर मार रहे हैं। परिणामत: नहले पर
दहला मारने के उग्र प्रयास में 'सोमनाथ'
अधिक से अधिक चामत्कारिक तथा रोमानी उपन्यास हो गया है;
और अपने ज्ञान के प्रदर्शन तथा अपने खोजे हुए तथ्यों को पाठकों
के सम्मुख रखने की उतावली में,
उपन्यास विधा की आवश्यकताओं की पूर्ण उपेक्षा कर वे
'वयंरक्षाम:'
और 'सोना और ख़ून'
में पृष्ठों के पृष्ठ अनावश्यक तथा अतिरेकपूर्ण विवरणों से
भरते चले गए हैं। किसी विशिष्ट कथ्य अथवा प्रतिपाद्य के अभाव
ने उनकी इस प्रलाप में विशेष सहायता की है। ये कोई ऐसे लक्ष्य
नहीं हैं,
जो किसी कृति को साहित्यिक महत्व दिला सकें अथवा वह राष्ट्र और
समाज की स्मृति में अपने लिए दीर्घकालीन स्थान बना सकें। 'सोना
और ख़ून'
लिखते हुए चतुरसेन शास्त्री,
कदाचित् इतिहास की रौ में ऐसे बह गए कि भूल ही गए कि वे
उपन्यास लिख रहे हैं,
अत: सैकड़ों पृष्ठ इतिहास ही लिखते चले गए। इससे उपन्यास तत्व
की हानि होती है;
क्योंकि उपन्यास मात्र इतिहास नहीं है। 'वैशाली की नगरवधू'
तथा अन्य अनेक ऐतिहासिक उपन्यास लिखने का लक्ष्य एक विशेष
प्रकार के परिवेश का निर्माण करना भी हो सकता है;
किंतु इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि अनेक लोग 'वैशाली की
नगरवधू'
में स्त्री की बाध्यता और पीड़ा देखते हैं। वैसे इतिहास का वह
युग,
एक ऐसा काल था,
जिसमें साहित्यकार को अनेक आकर्षण दिखाई देते हैं। महात्मा
बुद्ध,
आम्रपाली,
सिंह सेनापति तथा अजातशत्रु के आसपास हिंदी साहित्य की अनेक
महत्वपूर्ण कृतियों ने जन्म लिया है। उसमें स्त्री की असहायता
देखी जाए,
या गणतंत्रों के निर्माण और उनके स्वरूप की चर्चा की जाए,
वात्सल्य की कथा कही जाए,
या फिर मार्क्सवादी दर्शन का सादृश्य ढूँढा जाए - सत्य यह है
कि वह परिवेश कई दृष्टियों से असाधारण रूप से रोमानी था।
रांगेय राघव के ऐतिहासिक उपन्यासों की भी एक लंबी सूची है।
यहाँ तक कि उन्होंने उस काल पर भी लंबे उपन्यास लिखे हैं,
जिसका प्रामाणिक इतिहास उपलब्ध नहीं है। अत: उसे प्रागैतिहासिक
काल कहा जाता है। 'मुर्दों का टीला'
में उन्होंने उस युग का काल्पनिक चित्र प्रस्तुत किया है और
अपने अनुमान से एक संस्कृति के विलुप्त हो जाने का कारण बताया
है। किंतु जिस संस्कृति का विस्तार आज हरियाणा ही नहीं गुजरात
तक प्रमाणित हो रहा हो,
उसका एक जलप्लावन में समाप्त हो जाना,
बहुत सहमत नहीं करता। डूबता एक कस्बा है,
नगर डूबता है। कभी-कभी भूकंप से पॉम्पेयी जैसा नगर ध्वस्त हो
जाता है। इस प्रकार एक पूरी संस्कृति जलप्लावन में समाप्त नहीं
हो जाती। या फिर वह कोई खंड-प्रलय ही था। किंतु जहाँ की यह
चर्चा है,
वहाँ से जल विलुप्त होने के प्रमाण तो मिले हैं,
जलप्लावन के नहीं। फिर भी लेखक की ऐतिहासिक कल्पना की उड़ान का
आनन्द तो वैसे उपन्यास देते ही हैं।
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