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भारतीय ज्ञानपीठ
द्वारा
युवा लेखन
पुरस्कार से सम्मानित कवि की रचनाएँ
चाय
न जाने कहाँ से आती है पत्ती
हर बार अलग स्वाद की।
कैसा-कैसा होता है मेरा पानी!
अन्दाज़ता हूँ चीनी
हाथ खींचकर,
पहले थोड़ी
फिर और,
लगभग न के बराबर
ज़रा-सी।
कभी डालता हूँ गुड़ ही
चीनी के बजाय
बदलता हूँ ज़ायका
अदरक,
लौंग,
तुलसी या इलायची से।
मुँह चमकाने के लिए महज़
दूध की
छोड़ता हूँ कोताही।
हर नींद के बाद
खौलता हूँ
अपनी ही आँच पर
हर थकावट के बाद
हर ऊब के बाद।
रविकांत
पी-201,
नेहरू इन्क्लेव
गोमती नगर,
लखनऊ, (उ.प्र.)
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