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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-27, अगस्त, 2008

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।। कविता ।।

 

 

भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा

युवा लेखन पुरस्कार से सम्मानित कवि की रचनाएँ

 

चाय

 

न जाने कहाँ से आती है पत्ती

हर बार अलग स्वाद की।

कैसा-कैसा होता है मेरा पानी!

 

अन्दाज़ता हूँ चीनी

हाथ खींचकर, पहले थोड़ी

फिर और, लगभग न के बराबर

ज़रा-सी।

 

कभी डालता हूँ गुड़ ही

चीनी के बजाय

बदलता हूँ ज़ायका

अदरक, लौंग, तुलसी या इलायची से।

 

मुँह चमकाने के लिए महज़

दूध की

छोड़ता हूँ कोताही।

 

हर नींद के बाद

खौलता हूँ

अपनी ही आँच पर

 

हर थकावट के बाद

हर ऊब के बाद।

    रविकांत

पी-201, नेहरू इन्क्लेव

गोमती नगर, लखनऊ, (उ.प्र.)

 ◙◙◙

 

स्मरणीय

नागार्जुन

शमशेर बहादुर सिंह

पुरस्कृत

रविकांत की 10 कविताएँ

- लिखना ज़रूरी लगा मुझे

- बुरे दिनों में

- जीवन भीम, पलाशी

- संजीव हुसैन

- लंकेश और घोड़े

- यात्रा

- कुल की कथा

- माँ :  दो कविताएँ

- चाय

- कविता

समकालीन कवि

देवांशु पाल

अनिल मिश्र

असद ज़ैदी

आशुतोष दुबे

विश्वरंजन

प्रवासी कलम

धवन भगत, डेनमार्क

- प्रयोग

- रिवाज़

- जीवन है प्रवाह

हरिहर झा, आल्ट्रेलिया

माह का कवि

फ़ज़ल इमाम मल्लिक

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... ख़ामोश हैं बच्चे

... ख़ौफ़ में डूबा शहर

... विंबलडन-2005

...  ओवल पर बांग्लादेश

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